Rani Padmini जो Rani Padmavati के नाम से जानी जाती है Full Details

नमस्ते दोस्तों आज हम Rani Padmini जो Rani Padmavati के नाम से जानी जाती है Full Details के बारे में बात करने वाले हैं, तो दोस्तों हम आपके लिए Rani Padmavati की कहानियाँ पोस्ट लाए हैं, चले   Rani Padmavati Full Details in Hindi जानते हैं आपको बहुत सारी नॉलेज देगी, हमारी HindiYouth.com वेबसाइट का एक ही मकसद है कि हिंदुस्तान के युवाओं को सही जानकारी मिल सके.

Rani Padmini ( Rani Padmavati ) Full Details in Hindi

Rani Padmini ( Rani Padmavati ) Full Details in Hindi
Rani Padmini ( Rani Padmavati ) Full Details in Hindi

Rani Padmavati कौन है

Rani Padmini, चित्तौड़ की रानी थी। Padmini को  Padmavati के नाम से भी जाना जाता है,यह एक महान 13 वीं -14 वीं सदी की भारतीय रानी (रानी) है।

रानी पद्मिनि के साहस और बलिदान की गौरवगाथा इतिहास में अमर है। सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी Padmini चित्तौड़ के राजा रतनसिंह के साथ ब्याही गई थी।

Rani Padmini बहुत खूबसूरत थी और उनकी खूबसूरती पर एक दिन दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर पड़ गई। अलाउद्दीन किसी भी कीमत पर Rani Padmini को हासिल करना चाहता था, इसलिए उसने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। Rani Padmini ने आग में कूदकर जान दे दी, लेकिन अपनी आन-बान पर आँच नहीं आने दी।

ईस्वी सन् १३०३ में चित्तौड़ के लूटने वाला अलाउद्दीन खिलजी था जो राजसी सुंदरी Rani Padmini को पाने के लिए लालयित था। श्रुति यह है कि उसने दर्पण में रानी की प्रतिबिंब देखा था और उसके सम्मोहित करने वाले सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गया था। लेकिन कुलीन रानी ने लज्जा को बचाने के लिए जौहर करना बेहतर समझा।

इनकी कथा कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी भाषा में पद्मावत ग्रंथ रूप में लिखी है।

लेकिन Rani Padmini के अस्तित्व को लेकर इतिहास में कोई दस्तावेज मौजूद नही है। लेकिन चित्तोड़ में हमें Rani Padmavati की छाप दिखाई देती है।

पद्मिनी ने अपना जीवन अपने पिता गंधर्वसेन और माता चम्पावती के के साथ सिंहाला में व्यतीत किया था। Padmini के पास एक बोलने वाला तोता “हीरामणि” भी था। उनके पिता ने  Padmavati के विवाह के लिये स्वयंवर भी आयोजित किया था जिसमे आस-पास के सभी हिन्दू-राजपूत राजाओ को आमंत्रित किया गया था। एक छोटे से राज्य के राजा मलखान सिंह भी उनसे विवाह करने के लिये पधारे थे।

चित्तोड़ के राजा रावल रतन सिंह रानी नागमती के होते हुए भी स्वयंवर में आये थे। और उन्होंने मलखान सिंह को पराजित कर Padmini से विवाह भी कर लिया था। क्योकि राजा रावल रतन सिंह स्वयंवर के विजेता थे। स्वयंवर के बाद वे अपनी सुंदर Rani Padmini के साथ चित्तोड़ लौट आये थे।

12 वी और 13 वी शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के आक्रमणकारीयो की ताकत धीरे-धीरे बढ़ रही थी। इसके चलते सुल्तान ने दोबारा मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने सुंदर Rani Padmavati को पाने के इरादे से चित्तोड़ पर भी आक्रमण कर दिया था। यह पूरी कहानी इतिहासकार अलाउद्दीन के लिखान पर आधारित है जिन्होंने इतिहास में राजपूतो पर हुए आक्रमणों को अपने लेखो से प्रदर्शित किया था।

उन दिनों चित्तोड़ राजपूत राजा रावल रतन सिंह के शासन में था, जो एक बहादुर और साहसी योद्धा भी थे। एक प्रिय पति होने के साथ ही वे एक बेहतर शासक भी थे, इसके साथ ही रावल सिंह को कला में भी काफी रूचि थी। उनके दरबार में काफी बुद्धिमान लोग थे, उनमे से एक संगीतकार राघव चेतन भी था।

ज्यादातर लोगो को इस बात की जानकारी आज भी नही है की राघव चेतन एक जादूगर भी थे। वे अपनी इस कला का उपयोग शत्रुओ को चकमा या अचंभित करने के लिये आपातकालीन समय में ही करते थे।

लेकिन राघव सिंह के कारनामे सभी के सामने आने के बाद राजा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाले जाने का भी आदेश दिया था। और उनके चेहरे को काला कर उन्हें गधे पर बिठाकर राज्य में घुमाने का आदेश भी दिया था। इस घटना के बाद वे राजा के सबसे कट्टर दुश्मनों में शामिल हो गए थे।

इसके बाद राघव चेतन ने दिल्ली की तरफ जाने की ठानी और वहाँ जाकर वे दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को चित्तोड़ पर आक्रमण करने के लिये मनाने की कोशिश करते रहते।

दिल्ली आने के बाद राघव चेतन दिल्ली के पास ही वाले जंगल में रहने लगे थे, जहाँ सुल्तान अक्सर शिकार करने के लिये आया करते थे। एक दिन सुल्तान के शिकार की आवाज सुनते ही राघव ने अपनी बांसुरी बजाना शुरू कर दी। जब राघव चेतन की धुन सुल्तान की सेना और उन्हें सुनाई दी तो वे सभी आश्चर्यचकित हो गए थे की इस घने जंगल में कौन इतनी मधुर ध्वनि से बाँसुरी बजा रहा होगा।

सुल्तान ने अपने सैनिको को बाँसुरी बजाने वाले इंसान को ढूंडने का आदेश दिया और जब राघव चेतन स्वयं उनके सामने आये तब सुल्तान ने उनसे अपने साथ दिल्ली के दरबार में आने को कहा। तभी राघव चेतन ने सुल्तान से कहाँ की वह एक साधारण संगीतकार ही है और ऐसे ही और भी बहुत से गुण है उसमे। और जब राघव चेतन ने अलाउद्दीन को Rani Padmavati की सुन्दरता के बारे में बताया तो अलाउद्दीन मन ही मन Rani Padmavati को चाहने लगे थे।

इसके तुरंत बाद वे अपने राज्य में गये और अपनी सेना को चित्तोड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया, ताकि वे बेहद खुबसूरत Rani Padmavati – Rani Padmini को हासिल कर सके और अपने हरम में ला सके।

चित्तोड़ पहुचते ही अलाउद्दीन खिलजी के हाथ निराशा लगी क्योकि उन्होंने पाया की चित्तोड़ को चारो तरफ से सुरक्षित तरीके से सुरक्षा प्रदान की गयी है। लेकिन वे Rani Padmavati की सुन्दरता को देखने का और ज्यादा इंतज़ार नही करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने राजा रतन सिंह के लिये यह सन्देश भेजा की वे Rani Padmavati को बहन मानते है और उनसे मिलना चाहते है।

इसे सुनने के बाद निराश रतन सिंह को साम्राज्य को तीव्र प्रकोप से बचाने का एक मौका दिखाई दिया। इसीलिये उन्होंने अपनी पत्नी को अलाउद्दीन से मिलने की आज्ञा भी दे दी थी।

Rani Padmavati – Rani Padmini ने भी अलाउद्दीन को उनके प्रतिबिम्ब को आईने में देखने की मंजूरी दे दी थी। अलाउद्दीन ने भी निर्णय लिया की वे Rani Padmavati को किसी भी हाल में हासिल कर ही लेंगे। अपने कैंप ने वापिस आते समय अलाउद्दीन कुछ समय तक राजा रतन सिंह के साथ ही थे। सही मौका देखते ही अलाउद्दीन ने राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया और बदले में Rani Padmavati को देने के लिये कहा।

सोनगरा के चौहान राजपूत जनरल गोरा और बादल ने सुल्तान को उन्ही के खेल में पराजित करने की ठानी और कहा की अगली सुबह उन्हें Rani Padmavati दे दी जायेंगी। उसी दिन 150 पालकी (जिसे पूरी तरह से सजाकर, ढककर उस समय में चार इंसानों द्वारा एक स्थान से स्थान पर ले जाया जाता था। (उस समय इसका उपयोग शाही महिलाये एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाने के लिए करती थी) मंगवाई और उन्हें किले से अलाउद्दीन के कैंप तक ले जाया गया और पालकीयो को वही रोका गया जहाँ राजा रतन सिंह को बंदी बनाकर रखा गया था।

जब राजा ने देखा की पालकियाँ चित्तोड़ से आयी है तो राजा को लगा की उसमे रानी भी आयी होगी और ऐसा सोचकर ही वे शर्मिंदा हो गये थे। लेकिन जब उन्होंने देखा की पालकी से बाहर रानी नही बल्कि उनकी महिला कामगार निकली है और सभी पालकियाँ सैनिको से भरी हुई है तो वे पूरी तरह से अचंभित थे।

सैनिको ने पालकी से बाहर निकालकर तुरंत अलाउद्दीन के कैंप पर आक्रमण कर दिया और सफलता से राजा रतन सिंह को छुड़ा लिया। जिसमे दोनों राजपूत जनरल ने बलपूर्वक और साहस दिखाकर अलाउद्दीन की सेना का सामना किया था और रतन सिंह को उन्होंने सुरक्षित रूप से महल में पंहुचा दिया था। जहाँ Rani Padmavati उनका इंतजार कर रही थी।

इस बात को सुनते ही सुल्तान आग-बबूला हो चूका था और उसने तुरंत चित्तोड़ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। सुल्तान की आर्मी ने चित्तोड़ की सुरक्षा दिवार को तोड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन ऐसा करने में वे सफल नही हो सके। तभी अलाउद्दीन ने किले को चारो तरफ से घेरना शुरू कर दिया। ऐसा पाते ही राजा रतन सिंह ने सभी राजपूतो को आदेश दे दिया की सभी द्वार खोलकर अलाउद्दीन की सेना का सामना करे।

आदेश सुनते ही Rani Padmavati ने देखा की उनकी सेना का सामना विशाल सेना से हो रहा है और तभी उन्होंने चित्तोड़ की सभी महिलाओ के साथ जौहर करने का निर्णय लिया, उनके अनुसार दुश्मनों के हाथ लगने से बेहतर जौहर करना ही था।

जौहर एक इसी प्रक्रिया है जिनमे शाही महिलाये अपने दुश्मन के साथ रहने की बजाये स्वयं को एक विशाल अग्निकुंड में न्योछावर कर देती है।

इस तरह खुद का जौहर कर उन्होंने आत्महत्या कर दी थी। जिसमे एक विशाल अग्निकुंड में चित्तोड़ की सभी महिलाये ख़ुशी से कूद गयी थी। यह खबर पाते ही चित्तोड़ के सैनिको ने पाया की अब उनके पास जीने का कोई मकसद नही है और तभी उन्होंने सका करने का निर्णय लिया। जिसमे सभी सैनिक केसरी पोशाक और पगड़ी के पहनावे में सामने आये और उन्होंने अलाउद्दीन की सेना का मरते दम तक सामना करने का निर्णय लिया था। इस विनाशकारी विजय के बाद अलाउद्दीन की सेना केवल राख और जले हुए शरीर को देखने के लिये किले में आ सकी।

आज भी चित्तोड़ की महिलाओ के जौहर करने की बात को लोग गर्व से याद करते है। जिन्होंने दुश्मनों के साथ रहने की बजाये स्वयं को आग में न्योछावर करने की ठानी थी। राणी Padmini – Rani Padmini के बलिदान को इतिहास में सुवर्ण अक्षरों से लिखा गया है।

क्या Rani Padmini कभी मौजूद थे? शायद चित्तौड़गढ़ में इसका जवाब खो गया है। या हो सकता है कि यह मलिक मुहम्मद जयसी की कल्पना का एक सबूत था। अब के रूप में, चलो देखते हैं कि संजय लीला भंसाली  Padmavati के अपने संस्करण को बताती है।

Rani Padmavati का स्वयंवर

महाराज गंधर्वसेन नें अपनी पुत्री  Padmavati के विवाह के लिए उनका स्वयंवर रचाया था जिस में भाग लेने के लिए भारत के अगल अलग हिन्दू राज्यों के राजा-महाराजा आए थे। गंधर्वसेन के राज दरबार में लगी राजा-महाराजाओं की भीड़ में एक छोटे से राज्य का पराक्रमी राजा मल्खान सिंह भी आया था। उसी स्वयंवर में विवाहित राजा रावल रत्न सिंह भी मौजूद थे।

उन्होनें मल्खान सिंह को स्वयंवर में परास्त कर के Rani Padmini पर अपना अधिकार सिद्ध किया और उनसे धाम-धूम से विवाह रचा लिया। इस तरह राजा रावल रत्न सिंह अपनी दूसरी पत्नी Rani Padmavati को स्वयंवर में जीत कर अपनी राजधानी चित्तौड़ वापस लौट गये।

चित्तौड़ राज्य

प्रजा प्रेमी और न्याय पालक राजा रावल रत्न सिंह चित्तौड़ राज्य को बड़े कुशल तरीके से चला रहे थे। उनके शासन में वहाँ की प्रजा हर तरह से सुखी समपन्न थीं। राजा रावल रत्न सिंह रण कौशल और राजनीति में निपुण थे। उनका भव्य दरबार एक से बढ़कर एक महावीर योद्धाओं से भरा हुआ था। चित्तौड़ की सैन्य शक्ति और युद्ध कला दूर-दूर तक मशहूर थी।

चित्तौड़ का प्रवीण संगीतकार राघव चेतन

चित्तौड़ राज्य में राघव चेतन नाम का संगीतकार बहुत प्रसिद्ध था। महाराज रावल रत्न सिंह उन्हे बहुत मानते थे इसीलिये राज दरबार में राघव चेतन को विशेष स्थान दिया गया था। चित्तौड़ प्रजा और वहाँ के महाराज को उन दिनों यह बात मालूम नहीं थी की राघव चेतन संगीत कला के अतिरिक्त जादू-टोना भी जनता था। ऐसा कहा जाता है की राघव चेतन अपनी इस आसुरी प्रतिभा का उपयोग शत्रु को परास्त करने और अपने कार्य सिद्ध करने में करता था।

एक दिन राघव चेतन जब अपना कोई तांत्रिक कार्य कर रहा था तब उसे रंगे हाथों पकड़ लिया गया और राजदरबार में राजा रावल रत्न सिंह के समक्ष पेश कर दिया गया। सभी साक्ष्य और फरियादी पक्ष की दलील सुन कर महाराज नें चेतन राघव को दोषी पाया और तुरंत उसका मुंह काला करा कर गधे पर बैठा कर देश निकाला दे दिया।

अलाउद्दीन खिलजी से मिला राघव चेतन

अपने अपमान और राज्य से निर्वासित किये जाने पर राघव चेतन बदला लेने पर आमादा हो गया। अब उसके जीवन का एक ही लक्ष्य रहे गया था और वह था चित्तौड़ के महाराज रावल रत्न सिंह का सम्पूर्ण विनाश। अपने इसी उद्देश के साथ वह दिल्ली राज्य चला गया। वहां जाने का उसका मकसद दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी को उकसा कर चित्तौड़ पर आक्रमण करवा कर अपना प्रतिशोध पूरा करने का था।

12वीं और 13वीं सदी में दिल्ली की गद्दी पर अलाउद्दीन खिलजी का राज था। उन दिनों दिल्ली के बादशाह से मिलना इतना आसान कार्य नहीं था। इसीलिए राघव चेतन दिल्ली के पास स्थित एक जंगल में अपना डेरा डाल कर रहने लगता है क्योंकि वह जानता था कि दिल्ली का बादशाह अलाउद्दीन खिलजी शिकार का शौक़ीन है और वहाँ पर उसकी भेंट ज़रूर अलाउद्दीन खिलजी से हो जाएगी। कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद आखिर उसे सब्र का फल मिल जाता है।

एक दिन अलाउद्दीन खिलजी अपने खास सुरक्षा कर्मी लड़ाकू दस्ते के साथ घने जंगल में शिकार खेलने पहुँचता है। मौका पा कर ठीक उसी वक्त राघव चेतन अपनी बांसुरी बजाना शुरू करता है। कुछ ही देर में बांसुरी के सुर बादशाह अलाउद्दीन खिलजी और उसके दस्ते के सिपाहियों के कानों में पड़ते हैं। अलाउद्दीन खिलजी फ़ौरन राघव चेतन को अपने पास बुला लेता है राज दरबार में आ कर अपना हुनर प्रदर्शित करने का प्रस्ताव देता है। तभी चालाक राघव चेतन अलाउद्दीन खिलजी से कहता है-

” आप मुझ जैसे साधारण कलकार को अपनें राज्य दरबार की शोभा बना कर क्या पाएंगे, अगर हासिल ही करना है तो अन्य समपन्न राज्यों की ओर नज़र दौड़ाइये जहां एक से बढ़ कर एक बेशकीमती नगीने मौजूद हैं और उन्हे जीतना और हासिल करना भी सहज है। “

अलाउद्दीन खिलजी तुरंत राघव चेतन को पहेलिया बुझानें की बजाए साफ-साफ अपनी बात बताने को कहता हैं। तब राघव चेतन चित्तौड़ राज्य की सैन्य शक्ति, चित्तौड़ गढ़ की सुरक्षा और वहाँ की सम्पदा से जुड़ा एक-एक राज़ खोल देता है और राजा रावल रत्न सिंह की धर्म पत्नी Rani Padmavati के अद्भुत सौन्दर्य का बखान भी कर देता है। यह सब बातें जान कर अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण कर के वहाँ की सम्पदा लूटने, वहाँ कब्ज़ा करने और परम तेजस्वी रूप रूप की अंबार Rani Padmavati को हासिल करने का मन बना लेता है।

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अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण की योजना

राघव चेतन की बातें सुन कर अलाउद्दीन खिलजी नें कुछ ही दिनों में चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण करने का मन बना लिया और अपनी एक विशाल सेना चित्तौड़ राज्य की और रवाना कर दी। अलाउद्दीन खिलजी की सेना चित्तौड़ तक पहुँच तो गयी पर चित्तौड़ के किले की अभेद्य सुरक्षा देख कर अलाउद्दीन खिलजी की पूरी सेना स्तब्ध हो गयी। उन्होने वहीं किले के आस पास अपने पड़ाव डाल लिए और चित्तौड़ राज्य के किले की सुरक्षा भेदने का उपाय ढूँढने लगे।

अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को भेजा कपट संदेश

जब से राजा रावल रत्न सिंह नें रूप सुंदरी Rani Padmavati को स्वयमर में जीता था तभी से  Padmavati अपनी सुंदरता के लिये दूर-दूर तक चर्चा का विषय बनी हुई थी। इस बात का फायदा उठाते हुए कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें चित्तौड़ किले के अंदर राजा रावल रत्न सिंह के पास एक संदेश भिजवाया कि वह Rani Padmavati की सुंदरता का बखान सुन कर उनके दीदार के लिये दिल्ली से यहाँ तक आये हैं और अब एक बार रूप सुंदरी Rani Padmavati को दूर से देखने का अवसर चाहते हैं।

अलाउद्दीन खिलजी नें यहाँ तक कहा की वह Rani Padmavati को अपनी बहन समान मानते हैं और वह सिर्फ उसे दूर से एक नज़र देखने की ही तमन्ना रखते हैं।

चित्तौड़ के महाराज रावल रत्न सिंह का अलाउद्दीन खिलजी को जवाब

अलाउद्दीन खिलजी की इस अजीब मांग को राजपूत मर्यादा के विरुद्ध बता कर राजा रावल रत्न सिंह नें ठुकरा दिया। पर फिर भी अलाउद्दीन खिलजी नें Rani Padmavati को बहन समान बताया था इसलिये उस समय एक रास्ता निकाला गया।

पर्दे के पीछे Rani Padmavati सीढ़ियों के पास से गुज़रेंगी और सामने एक विशाल काय शीशा रखा जाएगा जिसमें Rani Padmavati का प्रतिबिंम अलाउद्दीन खिलजी देख सकते हैं। इस तरह राजपूतना मर्यादा भी भंग ना होगी और अलाउद्दीन खिलजी की बात भी रह जायेगी।

अलाउद्दीन खिलजी नें दिया धोखा

शर्त अनुसार चित्तौड़ के महाराज ने अलाउद्दीन खिलजी को आईने में Rani Padmavati का प्रतिबिंब दिखला दिया और फिर अलाउद्दीन खिलजी को खिला-पिला कर पूरी महेमान नवाज़ी के साथ चित्तौड़ किले के सातों दरवाज़े पार करा कर उनकी सेना के पास छोड़ने खुद गये। इसी अवसर का लाभ ले कर कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को बंदी बना लिया और किले के बाहर अपनी छावनी में कैद कर दिया।

इसके बाद संदेश भिजवा दिया गया कि –

“अगर महाराज रावल रत्न सिंह को जीवित देखना है तो Rani Padmavati को फौरन अलाउद्दीन खिलजी की खिदमद में किले के बाहर भेज दिया जाये। “

Rani Padmavati, चौहान राजपूत सेनापति गौरा और बादल की युक्ति

चित्तौड़ राज्य के महाराज को अलाउद्दीन खिलजी की गिरफ्त से सकुशल मुक्त कराने के लिये Rani Padmavati, गौरा और बादल नें मिल कर एक योजना बनाई। इस योजना के तहत किले के बाहर मौजूद अलाउद्दीन खिलजी तक यह पैगाम भेजना था की Rani Padmavati समर्पण करने के लिये तैयार है और पालकी में बैठ कर किले के बाहर आने को राज़ी है।

और फिर पालकी में Rani Padmavati और उनकी सैकड़ों दासीयों की जगह नारी भेष में लड़ाके योद्धा भेज कर बाहर मौजूद दिल्ली की सेना पर आक्रमण कर दिया जाए और इसी अफरातफरी में राजा रावल रत्न सिंह को अलाउद्दीन खिलजी की कैद से मुक्त करा लिया जाये।

Rani Padmavati के इंतज़ार में बावरा हुआ अलाउद्दीन खिलजी

कहा जाता है की वासना और लालच इन्सान की बुद्धि हर लेती है। अलाउद्दीन खिलजी के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब चित्तौड़ किले के दरवाज़े एक के बाद एक खुले तब अंदर से एक की जगह सैकड़ों पालकियाँ बाहर आने लगी। जब यह पूछा गया की इतनी सारी पालकियाँ क्यूँ साथ हैं तब अलाउद्दीन खिलजी को यह उत्तर दिया गया की यह सब Rani Padmavati की खास दासीयों का काफिला है जो हमेशा उनके साथ जाता है।

अलाउद्दीन खिलजी Rani Padmavati पर इतना मोहित था की उसने इस बात की पड़ताल करना भी ज़रूरी नहीं समझा की सभी पालकियों को रुकवा कर यह देखे कि उनमें वाकई में दासियाँ ही है। और इस तरह चित्तौड़ का एक पूरा लड़ाकू दस्ता नारी भेष में किले के बाहर आ पहुंचा। कुछ ही देर में अलाउद्दीन खिलजी नें Rani Padmavati की पालकी अलग करवा दी और परदा हटा कर उनका दीदार करना चाहा।

तो उसमें से राजपूत सेनापति गौरा निकले और उन्होने आक्रमण कर दिया। उसी वक्त चित्तौड़ सिपाहीयों नें भी हमला कर दिया और वहाँ मची अफरातफरी में बादल नें राजा रावल रत्न सिंह को बंधन मुक्त करा लिया और उन्हे अलाउद्दीन खिलजी के अस्तबल से चुराये हुए घोड़े पर बैठा कर सुरक्षित चित्तौड़ किले के अंदर पहुंचा दिया। इस लड़ाई मे राजपूत सेनापति गौरा और पालकी के संग बाहर आये सभी योद्धा शहीद हो गये।

अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

अपनी युक्ति नाकाम हो जाने की वजह से बादशाह अलाउद्दीन खिलजी झल्ला उठा उसनें उसी वक्त चित्तौड़ किले पर आक्रमण कर दिया पर वे उस अभेद्य किले में दाखिल नहीं हो सके। तब उन्होने किले में खाद्य और अन्य ज़रूरी चीजों के खत्म होने तक इंतज़ार करने का फैसला लिया। कुछ दिनों में किले के अंदर खाद्य आपूर्ति समाप्त हो गयी और वहाँ के निवासी किले की सुरक्षा से बाहर आ कर लड़ मरने को मजबूर हो गये।

अंत में रावल रत्न सिंह नें द्वार खोल कर आर- पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया और किले के दरवाज़े खोल दिये। किले की घेराबंदी कर के राह देख रहे मौका परस्त अलाउद्दीन खिलजी ने और उसकी सेना नें दरवाज़ा खुलते ही तुरंत आक्रमण कर दिया।

इस भीषण युद्ध में पराक्रमी राजा रावल रत्न सिंह वीर गति हो प्राप्त हुए और उनकी पूरी सेना भी हार गयी। अलाउद्दीन खिलजी नें एक-एक कर के सभी राजपूत योद्धाओं को मार दिया और किले के अंदर घुसने की तैयारी कर ली।

चित्तौड़ की महाRani Padmavati और नगर की सभी महिलाओं नें लिया जौहर करने का फैसला

युद्ध में राजा रावल रत्न सिंह के मारे जाने और चित्तौड़ सेना के समाप्त हो जाने की सूचना पाने के बाद Rani Padmavati जान चुकी थी कि अब अलाउद्दीन खिलजी की सेना किले में दाखिल होते ही चित्तौड़ के आम नागरिक पुरुषों और बच्चों को मौत के घाट उतार देगी और औरतों को गुलाम बना कर उन पर अत्याचार करेगी। इसलिये राजपूतना रीति अनुसार वहाँ की सभी महिलाओं नें जौहर करने का फैसला लिया।

जौहर की रीति निभाने के लिए नगर के बीच एक बड़ा सा अग्नि कुंड बनाया गया और Rani Padmini और 16,000 वीरांगनाओं ने अपने परिवार वालों से अंतिम बार मुलाकात की. फिर वे वीरांगनाएं जलती चिता में कूद पड़ी.

Rani Padmini और 16,000 वीरांगनाओं के जौहर ने चित्तौड़ की मिट्टी को हमेशा के लिए पावन बना दिया.

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इसके बाद 30,000 वीर सैनिक अलाउद्दीन की सेना पर टूट पड़े. भयंकर लड़ाई हुई, अंत में खिलजी चित्तौड़ के किले में प्रवेश करने में सफल हुआ. लेकिन किले के भीतर उसे कोई नहीं मिला. स्त्रियाँ जौहर कर चुकी थी और पुरुष शहीद हो चुके थे.

Rani Padmini के जौहर की जीत हुई थी, और यह जौहर हमेशा भारतवासियों को इस बात की याद दिलाती रहेगी कि भारत की स्त्रियों के लिए उनका सम्मान सर्वोपरी है.

इतिहास में राजा रावल रत्न सिंह, रानी और  Padmavati, सेना पति गौरा और बादल का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है और चित्तौड़ की सेना वहाँ के आम नागरिक भी सम्मान के साथ याद किये जाते हैं जिनहोने अपनी जन्म भूमि की रक्षा के खातिर अपने प्राणों का बलिदान दिया।

कम ज्ञात तथ्य

पद्मवती उर्फ Padmini के बारे में कई प्रतियोगिताएं हैं। एक तरफ, राजपूत समुदाय का कहना है उसके साथ संबंधित हर चीज पवित्र हे। और दुसरी तरफ इतिहासकार अक्सर कहते हैं कि उनका जीवन कवि की कल्पना के अलावा कुछ भी नहीं था।

बहस के तौर पर क्या  Padmavati कभी अस्तित्व में थी या वह मलिक मोहम्मद जयसी की कल्पना थी – जिसने 1303 में दिल्ली सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ की घेराबंदी के बारे में एक महाकाव्य कविता पद्मवत को लिखा – हम उसके बारे में कुछ कम ज्ञात ीजों पर एक नज़र डालें

1.  Padmavati एक श्रीलंकाई थी

पद्मवत कविता, शिमला-द्विप्पा के राज्य का एक काल्पनिक वर्णन से शुरू होती है, जहां पद्मनी नाम की राजकुमारी रहती थी।

सिंहला (सिंहला) – दीपिया प्राचीन काल के सीलोन में गिरती हैं और वर्तमान दिन श्रीलंका।  Padmavati, जयसी के मुताबिक, एक “परिपूर्ण महिला” थी, जिसकी सुंदरता इतनी थी कि देवी भी ईर्ष्या करेंगे।

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जयसी लिखते हैं कि  Padmavati के पास हिरा-मणि नाम का एक तोता था जो राजकुमारी के सबसे करीबी विश्वासियों में से एक था।

न केवल जयसी के पद्मवत, लेकिन कई महाकाव्य या प्यार कविताओं, मिल्टन के स्वर्ग खोया और हेटेम ताई की अरब कविता सहित, मुख्य पात्रों की भाषा बोलने वाले जानवरों या पक्षियों को दिखाया है। हिरा-मणि ने पद्मवती के सौंदर्य को चित्तौड़ राजा, रतन सिंह को सुनाया।

3. राजा रतन सींग सिम्हल -द्विपा में गए और Padmini को जीता

पद्मावत विस्तार से समजाते हे की किस तरह राना रतन सिंह , जो तोते के बताने से पहले कदाचीत सिंहला द्विपा के होने के बारे में जानते भी नहीं थे वो Rani Padmavati के स्वयंवर में भाग लेने के लिए गए।

वहा उन्होंने कई राजकुमारों और राजाओ को हराया, जिन्होंने कई प्रतियोगिता में भाग लिया था और  Padmavati का हाथ जीता था ।

4. राघव चैतन्य, जादूगर जिन्होंने खिलजी को उकसाया

राघव चैतन्य ने राणा रतन की अदालत में राज पुरोहित के रूप में काम किया। लेकिन वह वास्तविक में एक जादूगर था, जिसने काले जादू पर एक महान पकड़ रखी थी। रतन सिंह ने उसकी हकीकत जानने के बाद ,राघव को अपमानित करने के बाद उसे भगा दिया।

अपने अपमान का बदला लेने के लिए, राघव दिल्ली पहुंच गए और अलौद्दीन खिलजी को Rani Padmini के सौंदर्य के बारे में बताया। शुरू में खलजी ने उसके ऊपर ध्यान नहीं किया क्यों की उसके पास पहले से ही स्त्री गृह में बहोत महिलाएं थी। लेकिन Padmini के काव्यात्मक वर्णन में खलजी को Padmini सबसे खूबसूरत लगी और इस बात ने उसको सोचने पर मजबूर कर दिया। जयासी के अनुसार, बाद में चित्तोर पर हमला करने के बारे में उसने सोचा था।

5. खिलजी पर हमला करने के पीछे  Padmavati ही एकमात्र कारण नहीं था

1990 का एक वृत्तचित्र धारावाहिक, भारत, एक खोज में पांच रत्नो की विस्तार से बात की हे। इस प्रकरण में खिलजी ने  Padmavati को पाने के लिए चित्तोड़ पर घेराबंदी की उस बात पर कम भार दिया हे।

ये पांच रत्न थे: एक स्वान जो कविताएं गा सकता था, एक मणि अमृत से भरा था, एक पत्थर जिसे कुछ भी सोने में बदल सकता था, एक शारदुल नाम का शिकारी था, जो राजा के कहने पर किसी भी जानवर को मार सकता था और एक बड़ा लेकिन शाही पक्षी जो छोटे प्राणी और पक्षी को आसानी से मर सकता था।

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Conclusion:

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