Prithviraj Chauhan History, Wife, Death, Story, Kahani, movie And Serial Hindi

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बाल्य जीवन

1166 गुजरात

1192 अजमेर

मांडवकर और मेवात विजय

आज हम जिस वीर अग्निपुरुष के जीवन के बारे मे जानने जा रहे है, उसका का जन्म प्रसिद्ध चौहान वंश में, विक्रमिये सम्बत्त 148 वैशाख दिन गुरुवार 24 अक्टूबर को दिल्ली अनागपल तोमर की कनिष्ठ कन्या कमलावती के गर्भ से हुआ था। Prithviraj Chauhan के पिता सोमेश्वर जी चौहान की राजधानी अजमेर नगरी थी जो की उस समय अपने वैभव और कृति से सोमेश्वर राज चौहान की छत्रछाया में सुसज्जित थी। उस समय सोमेश्वर चौहान की वीरता की कहानी दूर दूर तक फैली हुई थी, उनकी वीरता की गाथा को सुनकर दिल्ली के महाराज अनंगपाल ने उनके और कम्ध्यज्ज्य के बीच हो रहे युद्ध में उन्हें युद्ध में आने का आमंत्रण दिया, कन्नोज के राजा विजयपाल ने भी इस युद्ध में अनंगपाल का साथ दिया, तीनो ने एक साथ युद्ध लडकर विजय हासिल की।

इससे दिल्ली के महाराज अन्नाग्पाल इतने खुश हुए की अपनी छोटी बेटी कमलावती का विवाह अजमेर के महाराजा सोमेस्वर से तय कर दिए। विजयपाल उनके बड़ी बेटी के पति थे। ये तीनो राज्य अब अपने वैभव के साथ अब फलने फूलने लगी थी। अब जब कभी अजमेर पर विपदा आती तो कन्नोज के राजा विजयपाल महाराज सोमेश्वर का साथ देते। एक बार यवन के सेना ने अजमेर पर हमला कर दिया और विजयपाल ने इस संकट के घडी में उनका साथ दिया और दुर्भाग्य वश महाराज विजयपाल की मौत हो गयी। इसके फलस्वरूप उनके बेटे जयचंद्र को कन्नोज का राजा बना दिया गया। 

चौहान वंश कब से स्थापित हुआ इसका कोई ठीक ठीक प्रमाण तो नहीं मिलता है पर रासो के अनुसार चौहान वंस की उत्पत्ति एक यज्ञ कुंड से हुई जो की दानवों के विनाश के लिए हुई थी। चौहान वंश के 173 वे वंश में बीसलदेव हुए थे उनके राज में ज्यादा कुछ नहीं हुई थी उनके बाद सारंगदेव आये जिन्होंने अजमेर का प्रसिद्ध आना सागर बनवाए,जय सिंह इन्हें के पुत्र थे जो की Prithviraj Chauhan के दादा जी थे। उस समय केवल चन्द्रबरदाई के जैसे महान कवी ही राज दरबार की शोभा बढ़ाते थे और युद्ध के मैदान में अपना कौशल दिखाते थे। वे अपनी कविताओं के माध्यम से वहां के राजा और प्रजा दोनों का मन जिधर चाहते थे उधर ही फेर देते थे। 

Prithviraj Chauhan बच्चपन से ही न केवल तीर कमान बल्कि भाला , तलवार और शब्द भेदी बाण विद्या में निपुण हो गए थे। श्री राम गुरु जी ने बचपन से ही युद्ध कौशल और रणनीति देखकर ये भविष्यवाणी भी कर दी थी की Prithviraj Chauhan का नाम भविष्य में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जायेगा। Prithviraj Chauhan के बाल्य जीवन के बारे में रासो में ज्यादा कुछ नहीं मिलता है।।

उस समय राजकुमारों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरुकुल भेजा जाता था और वहीं पर उन्हें युद्ध निति और राज पाठ के बारे में शिखाया जाता था। पृथ्वी के गुरु का नाम श्रीराम था। आरंम्भ से ही Prithviraj Chauhan ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया था इन्होने अपने गुरु श्रीराम से बहुत सारी शिक्षा प्राप्त की थी। Prithviraj Chauhan जब गुरुकुल में थे तब भीमदेव ने अजमेर पर हमला कर दिया लेकिन उसे सोमेश्वर जी के हाथों मुंह की खानी पड़ी महाराज सोमेश्वर इस बार भी विजयी रहे। 

इनके बचपन के दोस्त थे निठुर्रय,जैतसिंह, कविचंद्र, दहिराम्भराय, हरसिंह पंज्जुराय,सरंगराय, कन्हाराय, सखुली, संजम राय इत्यादी के साथ पृथ्वी हमेशा शूरता के ही खेल खेला करते थे। उनमे से उनमे से कुछ आमुक टिलहे को अमुक गढ़ मानकर वे उनकी रक्षा करते थे और उनमे से कुछ उनको लूटते थे, अक्सर वे ऐसा ही खेला करते थे।

इसके बाद वे शिकार खेलने जाते थे। इसी प्रकार से Prithviraj Chauhan की शिक्षा हुई थी। पृथ्वी के पिता सोमेश्वर राज चौहान जैसे वीर थे वैसे ही वे राजनीती वीसारत भी थे हालाँकि उनकी राज्य केवल अजमेर तक थी पर उन्होंने अपनी राज्य सीमा इतनी तक बढ़ा ली थी ककी उनकी सीमा गुजरात सी जा मिली थी। गुजरात के राजा भीमदेव सोलंकी को उनका राज्य विस्तार अच्छा न लगता था इसलिए वो उनसे अन्दर ही अन्दर इर्ष्या करता था जिसमे पृथ्वी की वीरता की कहानी ने इसमें घी का काम किया।

Prithviraj Chauhan कभी कभी शिकार खेलते खेलते गुजरात की सीमा तक जा पहुँचते थे, भीमदेव ने तो अपने जासूसों को उन्हें पकड़ कर मार डालने की आज्ञा भी दे रखी थी पर वे सदा ही उनसे बचते चले आये। जब Prithviraj Chauhan की आयु 13 साल की हुई तो उन्हें राजनीती की शिक्षा देने के लिए उन्हें युवराज का पद दे दिया गया। अपने युवराज काल में ही Prithviraj Chauhan ने अपने अद्भभुत प्रतिभा का परिचय दे दिया था। कहा जाता है की Prithviraj Chauhan ने केवल 13 की उम्र में जंगल के एक शेर को बिना किसी हथियार के ही मार डाला था। अब पृथ्वी अपने राज महल में ही राजनीती के शिक्षा लेने लगे थे, भीमदेव हार जाने के बावजूद सोमेश्वर और अजमेर नगरी पर अपना राज चाहता था, इसके लिए उसने कई चले भी चली।

उसने अजमेर के तरफ दोस्ती का हाथ बढाया, पृथ्वी के मना करने पर भी सोमेश्वर जी ने उन्हें बताया की ये राजनीती है आप अपने महाराज पर भरोसा रखें, अब भीमदेव राजमहल तक आ गया और पीछे से एक गुप्त भेदिया भी ले आया उसके जाने के बाद वो भेदिया अजमेर का राजश्री मुहर चुरा कर ले गया, भीमदेव उस राजश्री मुहर का इस्तेमाल वहां का कर बढ़ा कर वहां के प्रजा को अपने राजा के विरुद्ध करना चाहता था। पर जैसे ही पृथ्वी को ये बात पता चली उसने अपने वीर राजपूत दोस्तों पुंडीर,संजम राय, चंदबरदाई, अर्जुन आदि के साथ गुजरात की ओर चल दिए वहां पर उन्होंने अपना वीरता और बुद्धिमानी का बखूबी प्रदर्शन कर वो राजश्री मुहर अजमेर वापस लाये। 

उस समय भारत अपने सुख समृद्धि के शीर्ष पर था विदेशियों की नज़र शुरुवात से ही इस देश में थी, वे व्यापारी, साधू, फकीर आदि के रूप में वहां जाकर लोगो को धोखा और राज्य के गुप्त भेद को जानने का प्रयत्न करते रहते थे, एक बार आजमेर में रोशन अली नाम का फकीर प्रजा को धोखा दे रहा था जब पृथ्वी को इस बात का पता चला तब उन्होंने अपने सामंत चामुडराय को उसके पास भेज कर समझाना चाहा पर जब वो नहीं माना तब Prithviraj Chauhan ने उसकी उँगलियाँ कटवा कर देश से निकलवा दिया। रोशन अली ने सरदार मीर के पास जाकर पृथ्वी की बहुत निंदा की पर उत्तेजित होने पर भी वो उनमे आक्रमण न कर पाया क्योंकि उन्हें अपनी औकात के बारे में अच्छी तरह से पता थी।

अब वो सौदा गर के भेष में अजमेर आया साथ में अरब के सरदार भी आया, Prithviraj Chauhan ने उनसे एक अच्छा सा घोडा देखकर खरीद लिया, कहा जाता है की उस दिन अजमेर में भूकंप आई थी, जिसके कारण तारागढ़ का प्रसिद्ध दुर्ग भूमि में धंस गया था। मीर ने इस बात का फायदा उठाना चाहा और नगर में कुछ सैनिकों के साथ लूटपात मचा दी परन्तु Prithviraj Chauhan और उनके वीर राजपूत ने उनका इस तरह से सामना किया की वे अपना सब कुछ छोड़ कर अपने प्राण बचाकर वहां से भागा। 

एक बार गुजरात के राजा भिमदेव सोलंकी ने अजमेर के प्रजा का विश्वास उनके राजा से हटाने और इस बात का फायदा उठा वो अजमेर में हमला करने के फ़िराक में था, इसके लिए उसने अजमेर के प्रसिद्ध कोटेश्वर मंदिर के सोने का शिवलिंग चुराने का प्रयत्न किया पर पृथ्वी राज चौहान ने अपनी वीरता से उस शिवलिंग को बचाया और उसके आदमियों को ऐसा जवाब दिया की भीमदेव को मुंह के बल गिरना पड़ा अब उसका गुस्सा सातवें आसमान में जा पहुंचा था। Prithviraj Chauhan की बाल्य जीवन समाप्त होते ही उनके इस तरह के कई वीर गाथाओं के कारण उनका नाम चारों दिशाओं में गूंजने लगा था।

मांडवकर और मेवात विजय

 नाहरराय ने पृथ्वी को दिल्ली में तेरह वर्ष की उम्र में देखा था और उनके इस गुण से प्रभावित होकर अपनी कन्या का विवाह Prithviraj Chauhan के सोलह वर्ष की उम्र में कर देने का वचन सोमेश्वर चौहान को दे दिया, जब पृथ्वी 16 वर्ष के हुए और विवाह का समय आया तब नहारराय का विचार परिवर्तित हो गया और अपनी कन्या का विबाह पृथ्वी से करना अनुचित समझा. जो दूत विवाह की बात पक्की करने गया था, जब वो लौटकर सोमेश्वर राज चौहान को ये ससरी बात बताया तब सोमेश्वर और सरे सामंत ने इसे अपमान समझा. सोमेश्वर राज ने अपने पुत्र Prithviraj Chauhan को मांडवर पर आक्रमण करने की आजा दे दी.

पथ्वीराज ने अपनी सेना लेकर मांडवकर की ओर दौड़ पड़े. नाहररे ने मीणाजाती के सरदार पर्वत राय को अपना सेनापति बना कर एक बहुत बड़ी सेना जमा कर ली और युद्ध शुरु हो गया. बहुत की भयानक युद्ध हुआ परन्तु विजयलक्ष्मी पृथ्वी के गले में हार पहना गयी, पर्वतराय मारा गया और नाहरराय राज्य सीमा से स्थित गिरिनार के पर्वत में जा छुपा. अब उन्हें आपनी गलती का एहसास हुआ और अपने दिए हुए वचन पर कायम न रहने के प्रायश्चित स्वरुप उन्हें इतने सारे निर्दोषों का रक्त बहा कर करना पड़ा. अंत में उसने Prithviraj Chauhan से क्षमा मांग कर अपनी बेटी जमवती का विवाह उन से कर दिया. Prithviraj Chauhan जमावती से विवाह कर अजमेर ले आये. 

सोमेश्वर राज चौहान ने Prithviraj Chauhan और जमावती के विवाह के बाद अपना ध्यान फिर से राज्य विस्तार की ओर लगाया. उष समय अजमेर में शांति विराज कर रही थी, प्रजा में किसी तरह का आसंतोष न था. सोमेश्वर राज चौहान शांति के विरोधी न थे जब बातों से बिलकल भी काम नहीं निकलता था तभी केवल वो शस्त्र का प्रयोग करते थे. उस समय मेवात के राजा मुद्गलराय सोमेश्वर के अधीन थे पर फिर भी वे उनको कर नहीं देते थे इस पर सोमेश्वरराज ने उश्के पास अपना दूत भेजवा कर समझाना चाहा पर वो नहीं माने.

अंत में लाचार हो कर उन्हें अक्रामण करना पड़ा परन्तु वे मेवात के सीमा पर जा कर रुक गए वे ये सोचने लगे की बिना कारण ही इतने सारे मनुष्यों का संहार हो जायेगा यदि बातों से ही काम निकल जाता तोह अच्छा होता इसलिए सीमा पर उन्होंने फिर से अपना एक दूत भेज कर उन्हें समझाना चाहा पर मुद्गलराय ने एक न मानी. सोमेश्वर बहुत ही उलझन में पड़ गए की उनसे कर लेना उचित होगा या इतने मनुष्यों की जान बचाना.

वे कुछ विचार नहीं कर पाए अंत में उन्होंने इसकी सूचना Prithviraj Chauhan को अजमेर में दे दी. Prithviraj Chauhan ने मन ही मन ये सोचा की पिताजी ये कर क्या रहे है कभी सीधी ऊँगली से भी भला घी । निकला है, अब Prithviraj Chauhan रातों रात मेवात की सीमा में जा पहुंचे उस समय सोमेश्वरराज चौहान सो रहे थे, इधर Prithviraj Chauhan ने दुश्मन की संख्या का पता लगा कर उनमे आक्रमण कर दिया और मुद्गल राय को पकड़ कर सोमेश्वर राज की सामने पेश किया उन्होंने उसे कैदखाने में डाल दिया. इस तरह से मेवात पर सोमेश्वर राज का अधिकार हो गया

इंदिरावती

अजमेर के राजकुवर Prithviraj Chauhan और चितोड़ के राजकुवर समर सिंह के बीच बहुत ही घनिष्ट मित्रता थी. अपने बढ़ते वैभव के कारण उज्जैन के महाराज ने अपनी पुत्री का विवाह Prithviraj Chauhan से करवाना चाहा, उन दिनों Prithviraj Chauhan उज्जैन के पास ही शिकार खेल रहे थे.

कुल पुरिहितों ने Prithviraj Chauhan का टिका चढ़ा कर विवाह का बात को पक्का कर लिया इसी बीच उन्हें ये सूचना मिली की गुजरात के राजा भीमदेव ने चितोड़ पर आक्रमण कर दिया है, इसलिए अपने संबंधो के कारण एवं मित्रता का कर्त्तव्य समझ कर समरसिंह की सहायता के लिए चितोड़ अग्रसर हुए. राह में ही Prithviraj Chauhan की भेंट समरसिंह के डोत से हो गयी उसने Prithviraj Chauhan को बताया की दस कोश की दूरी पर ही भीमदेव की सेना पड़ाव डाले हुए है और शीघ्र ही दोनों दलों में मुटभेड हो जाएगी. उसने यह भी कहा की समरसिंह के आज्ञा अनुसार वो आपको ही इसकी समाचार देने के लिए आ रहा था. 

अभी भीमदेव ने आक्रमण किया भी न था की Prithviraj Chauhan ने अपने सेना लिए समरसिंह के पास जा पहुंचे. उन्होंने एकाएक बिना विश्राम किये गुजरात की सेना में आक्रमण कर दिया, अब लाचार होकर भीमदेव को अपनी सेना का मुह फेरना पड़ा. समरसिंह और Prithviraj Chauhan की संयुक्त सेना ने भीमदेव पर भीषण आक्रमण कर दिया पर भीमदेव की सेना अपनी स्थान से न हटी. समरसिंह और Prithviraj Chauhan ने बहुत वीरता दिखाई.

युद्ध होते होते शाम हो गयी पर कुछ भी निर्णय न हो पाया. दुसरे दिन भी युद्ध आरंभ हो गया. आज भीमदेव ने नदी पार कर स्वयं चितोड़ की सेना पर आक्रमण किया, परन्तु वीर समरसिंह ने इस वेग से उसके आक्रमण को रोका की गुजरात की सेना के छक्के छूट गए. पीछे से Prithviraj Chauhan की सेना ने भी आते हुए गुजरात की सेना में मार काट मचा दी. आज दिन भर के युद्ध में भीमदेव के दस सेनानायक मारे गए. इतने पर भी गुजरात की सेना अपने स्थान में डटी रही पर Prithviraj Chauhan और समरसिंह एवं उनके वीर सामंतों ने ऐसी वीरता दिखाई की गुजरात की सेना को पीछे हटना पड़ा, गुजरात की सेना पराजित हुई, और भीमदेव वापस गुजरात चली गयी, परन्तु Prithviraj Chauhan कुछ और दिन चितोड़ में ही रुक गए. 

भोलाराय भीमदेव केवल भाग जाने का बहाना ही किया था, वह रणभूमि से हटकर कहीं छिपा रहा और एक दिन जब Prithviraj Chauhan अपने शिविर में सो रहे थे तब अर्धरात्रि के समय आक्रमण कर दिया. इस आकस्मिक आक्रमण से वे उठ खड़े हुए और जिस अवस्था में थे उसी अवस्था में युद्ध करने लगे. आज रात का युद्ध में जैतसी का छोटा भाई, लखी सिंह, वीर बगरी, रुप धन आदि सरदार मारे गए, परन्तु विजयलक्ष्मी Prithviraj Chauhan को ही जीत का हार पहना गयी और भीमदेव के तरफ से मेरपहाड़ नामक नामी सरदार समेत पांच हज़ार सैनिक इस युद्ध में मारा गया. अब भीमदेव को वास्तव में हार मानना पड़ा और गुजरात वापस जाना पड़ा.

Prithviraj Chauhan स्वयं समरसिंह की सहायता के लिए चितोड़ में रुके हुए थे और इधर इंदिरावती से विवाह का दिन भी आ गया, Prithviraj Chauhan ने अपनी तलवार पन्न्जुराय को देकर इंदिरावती से विवाह कर लाने के लिए भेज दिया क्योंकि उस समय यह रिवाज थी की यदि किसी कारणवश वर स्वयं बारात में नहीं आ सकता था तो कोई वर का साथी वर का कटार लेकर विवाह रचाने जा सकता था. जब पंज्जुराय ने Prithviraj Chauhan के स्थान पर विवाह के लिए गया तो उज्जैन के राजा ने कहा कि मुझे ऐसे मनुष्य से विवाह नहीं करनी है जो स्वयं विवाह में न आ कर युद्ध में चला जाए, चंदरबरदाई ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की पर उज्जैन के महाराज ने एक न मानी, परन्तु उन दोनों के कुछ झमेला करने पर उज्जैन के महाराज ने उन्हें पांच दिन का समय दिया. इंदिरावती ने भी सारी बातें सुनी उसने ये प्रतिज्ञा कर ली की वो शादी करेगी तो केवल Prithviraj Chauhan से ही.

परन्तु जब पांच दिन की अवधि जब निकल गयी तब उज्जैन के राजा क्रोधित होकर Prithviraj Chauhan के सामंतों को निकल जाने का आदेश दे दिया, Prithviraj Chauhan के सामंत क्रोधित हो उठे और युद्ध की तयारी करने लगे, तुरंत ही युद्ध होने लगा Prithviraj Chauhan के वीर सामंत ने उज्जैन के राजा को पकड़ कर अपने वश में कर लिया. उज्जैन के राजा की आंखे खुल गयी और उसने बड़ी धूम धाम से अपनी पुत्री का विवाह Prithviraj Chauhan के भेजे हुए साथी से कर दिया, और इस प्रकार ये झमेला शांत हुआ. वो उसे लेकर अजमेर आ गए. थोड़े ही समय में Prithviraj Chauhan ने रणथम्भ के राजा की कन्या हंसावती से भी विवाह कर लिया.

भीमदेव और सोमेश्वर वध

उनके इस वीर गाथाओं के कारण ना जाने कितने प्रसन्न हुए और न जाने कितने ही दुखी. दुखी होने वालों में से एक था भीम देव सोलंकी. भीमदेव का एक भाई था सारंगदेव और सारंगदेव का आठ पुत्र थे. जब सबसे बड़ा बेटा पिता की गद्दी पर बैठा तो उसने कई तरह से अपनी प्रजा को कष्ट पहुचने लगे इसे देखकर भीमदेव बहुत अप्रसन्न हुए, इसका परिणाम ये हुआ की प्रताप सिंह अपने सातों भाइयों को अपने साथ मिला कर भीमदेव का खुलमखुल्ला भीम देव का विरोधी बन गया और राज्य में लूट मर मचाने लगा, अंत में भीमदेव ने इन्हें रोकने के लिए अपनी सेना से काम लेना शुरू किया अब दोनों पक्ष एक दुसरे को हानि पहुचाने का काम करने लगे .

एक बार भीमदेव की सेना एक नदी के किनारे पड़ाव डाली हुई थी भीमदेव का फीलवान उनके हठी को लेकर नदी में स्नान करवाने ले गया था प्रताप सिंह के भाइयों ने फीलवान और उश्के हाथियों को वही मार डाला इससे भीमदेव ने उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया अपनी इस दुर्व्यवहार के कारण वे लोग और इस राज्य में रुकना ठीक नहीं समझे और सातों भाई Prithviraj Chauhan के दरबार में चले गए. शरणगत के प्रतिपालन से एक राजपूत कभी मुंह नहीं मोड़ सकते इसलिए वे उन्हें दरबार में ही रख लिए. Prithviraj Chauhan ने उन्हें वहां रख तो लिया पर उनका वहां निर्वाह नहीं हो पाया, केवल मुछ पर ताव देने पर कान्हा ने उन सात भाइयों का सर काट दिया. कान्हा के इस व्यवहार से Prithviraj Chauhan बहुत दुखित हुए पर वो इतने साहसी और वीर योद्धा को खो नहीं सकते थे.

इस कारण से कान्हा सात दिन तक दरबार में नहीं आये लेकिन Prithviraj Chauhan ने उन्हें दरबार में बुला कर कान्हा के आंख में पट्टी बाँध दी ताकि वो किसी और को मुछ पर ताव देते हुए न देख सके ये पट्टी केवल नहाने समय, सोने समय और युद्ध के समय खुलती थी. जब भीमदेव के पास प्रताप सिंह के सातों भाइयों की मौत का खबर मिला तब ये इर्ष्या की आग और भी धधक उठी अब उश्के पास प्रिथ्विराज को निचा दिखाने का एक अवसर मिल गया था, भीमदेव ने अजमेर पर हमला करने की सोची पर वर्षा ऋतू के शुरू हो जाने के कारण वो ऐसा कर न सका. 

गुजरात का राजा भीमदेव बहुत ही प्रकर्मी था. उसने अपनी पत्नी के सहेलियों चन्द्रावती से आबू के राजा इच्छन कुमारी की चर्चा सुनी थी अब वो उससे शादी करने को ठान लिया उसने राजा सलख को उशकी पुत्री से विवाह करने के लिए पत्र लिख दिया पर पत्र इतने गर्वित शब्दों में लिखा गया था की राजा सलाख ने इसे अपना अपमान समझा और बड़े ही नम्र अक्षरों में लिखा की वो उनकी पुत्री का विवाह Prithviraj Chauhan से तय कर चुके है .

आपको इस विषय में जिद नहीं करनी चाहिए. बातों ही बातों में बात इतनी ज्यादा बढ़ गयी की भीमदेव बहुत क्रिधित हो गया वो राजा सलख को डरा धमका कर चला गया उस्क्व जाते ही राजा सलख ने सोमेश्वर को सारी बातें बता दी और ये भी लिखवा कर भेजवा दिया की शादी जल्द से जल्द हो जानी चाहिए. उस समय Prithviraj Chauhan दिल्ली में अपने नाना जी के पास थे, इधर भीमदेव ने Prithviraj Chauhan को पत्र लिख कर समझाना चाहा की वो उनके और इच्छन कुमारी के रास्ते से हट जाए, इधर उसने ये पत्र Prithviraj Chauhan को लिखा और एक तरफ उशने अपने अधिन राजाओं के साथ मिलकर आबू पर आक्रमण कर दिया.

राजा सलख पहले से ही सावधान था उन दोनों राज्यों में बहुत देर तक युद्ध हुआ, परन्तु सारे सरदारों के साथ राजा सलख मारा गया. और इस तरह से आबू पर भीमदेव का अधिकार हुआ. भीमदेव Prithviraj Chauhan के बढ़ते प्रक्रम से बहुत ही दुखी था वो Prithviraj Chauhan पर आक्रमण करने की सोच रहा था जब ये बात पृथ्वी के कानो तक पहुंची तब उन्होंने । अपने सब सामंतों को एकत्र किया और युद्धनिति बनाने लगे, इसी समय लोहाना पांच हज़ार सैनिक लेकर अजमेर आ पहुंचे चामुन्द्राय, जयतव राय देवराय बग्ग्री सभी ने अपनी युद्ध की सहमत्ति दिखाई.

Prithviraj Chauhan ने अपने सेना को दो भागों में बनता एक का सेनापतो कैमाश को नियुक्त किया और दूसरा की बागडोर खुद के हाथों में रखी. अब वे युद्ध की लिए निकल पड़े. पृथ्वी की सेना ने भीमदेव के सेना पर इस वेग से आक्रमण किया की भीमदेव के सेना की पाँव उखड गए उन्हें आबू चोर कर भागना पड़ा और इस तरह से आबू पर Prithviraj Chauhan का अधिकार हो गया. चंदरबरदाई के अनुसार यह युद्ध विक्रम सम्बत 164 में आधी रात के समय हुई थी इसमें दोनो ओर से 16000 सेना मारी गयी थी 13000 भीमदेव की और 3000 Prithviraj Chauhan की. 

भीमदेव बार बार Prithviraj Chauhan से अपमानित होने के कारण उत्तेजित हो रहा था, जब उससे रहा न गया तो अपने सभी अधीन राजाओं और सामंतों के साथ मिलकर अजमेर पर धावा बोल दिया जब ये समाचार सोमेश्वर जी के कानो तक जा पहुंचा तब उनसे रहा न गया और एक वीर पुरुष के भांति उन्होंने भी युद्ध का आमंत्रण दिया. इस युद्ध में जयचंद्र ने अजमेर का साथ नहीं दिया क्योंकि पृथ्वी के बढ़ते पराक्रम को देखकर दिल्ली के महाराज अनागपाल ने सोमेश्वर जी के सामने यह प्रस्ताव रखा था की पृथ्वी को दिल्ली का महाराज बना दिया जाए, इससे कन्नोज के राजा बहुत अप्रसन्न हुए थे क्योंकि बड़े नाती होने के कारण दिल्ल्ली पर पहले उनका अधिकार था, पर उन्होंने पृथ्वी को चुना था.

उस समय Prithviraj Chauhan अजमेर में नही थे इसलिए सोमेश्वर राज चौहान अपनी वीर राजपुतों के साथ भीमदेव का मुकाबला करने चल दिए, उन्होंने उसे रोकना चाहा, बहुत भयानक युद्ध हुआ पर अंत में तीन सौ सैनिकों के साथ सोमेश्वर राज चौहान भी मारे गए. जब ये समाचार Prithviraj Chauhan के पास पहुंचा तो वो क्रोध से अधीर हो गए और उसी समय उन्होंने ये प्रतिज्ञा ली की जब तक वे भीमदेव से इसका बदला नहीं लेंगे तब तक वे किसी तरह का राजसुख को हाथ नहीं लगायेंगे, वो न ही पगड़ी बांधेगे न ही घी खायेंगे.

उन्होंने गुजरात पर आक्रमण करने का अनुमति दे दिया पर सामंतों ने उन्हें समझाया की पहले अजमेर का राज्याभिषेक हो जाना चाहिए, पृथ्वी ने उनकी बात मान ली, भीमदेव दांत पीस कर ही रह गया क्योंकि उसके इतने कोशिश करने पर भी वो अजमेर को हासिल न कर पाया. पृथ्वी का राज तिलक इधर हो गया. सोमेश्व्वर राज की मृत्यु के बाद से ही पृथ्वी बहुत ही अधीर हो रहे थे उनके दिल में कांटे सा चुभने लगा. कुछ दिन सोच विचार करने के बाद उन्होंने भीमदेव पर आक्रमण करने का फैसला किया. Prithviraj Chauhan ने आपने सेना लेकर गुजरात के सीमा पर आ पहुंचा, भीमदेव के दूतों ने उन्हें खबर दिया की पृथ्वी अपने 64000 सेना लेकर गुजरात पर आक्रमण करने आया है. यह समाचार सुनकर उसने तुरंत ही एक लाख सेना एकत्र कर Prithviraj Chauhan से युद्ध करने निकल पड़ा .

Prithviraj Chauhan की सेना कुछ दूर रह गयी थी उन्होंने चंदरबरदाई को एक लाल पगड़ी और एक चोली देकर भीम देव के पास भेज दिया और ये कहलवा दिया की अगर वो चोली पहन कर युद्ध मैदान में आकर Prithviraj Chauhan के सामने घुटने टेके तोह ही उश्के प्राण बाख सकते है अन्यथा वो ये लाल पगड़ी बांध कर युद्ध मैदान में आ जाये ताकि उसके सहायको सहित उसके पिता के नाम उश्का रक्त नदी में बहा कर तर्पण किया जायेगा. चंदबरदाई ने चलते समय एक खेला खेला उसने अपने गले में एक जाल,हाथ में एक कुदाल,दुसरे हाथ में दीपक, और एक सीढ़ी लेकर भीमदेव के इलाके पट्टनपुर पहुंचा, इसे देखकर हजारों की भीड़ उसके साथ हो ली, वह अब राज दरबार पहुंचा, भीमदेव चंदरबरदाई को पहचानता था उसे देखते ही उसने पूछा कहो चाँद ये कैसा स्वांग रचे हो,

चन्द ने कहा पृथ्वी कहता है की अगर तुम उसके दर से आकश में छिप जोगे तो वो तुम्हे इस सीढ़ी से दूंढ़ कर मर डालेगा, अगर तुम उसके डर से समुन्द्र की गहराई में छिप जोगे तो वो तुम्हे इस जाल से पकर लेगा, आगर जमीन में छुप जावोगे तो ये कुदाल से खोद कर निक्कालेगा अगर तं उसके डर से कहीं अँधेरे में छिप जावोगे तोह ये दिए से खोज निकलेगा, अगर तुम्हे अपनी प्राण प्यारी है तो ये चोली पहन कर युद्ध में आ जाओ या फिर ये लाल पगड़ी बाँध कर युद्ध मैदान में आ जाओ. भीमदेव ये सुनकर बहुत क्रोधित हुआ और चाँद को वहीं मार देना चाहा पर अपने राजपूत क्रोधित हुआ और चाँद को वहीं मार देना चाहा पर अपने राजपूत गुण के कारण किसी कवी पर हाथ उठाना सही नहीं समझा. उसने युद्ध की आज्ञा दे दी इधर Prithviraj Chauhan तैयार थे ही. आज के युद्ध में निठुराय को सेनापति बनाया गया, और कान्हा के आंख की पट्टी भी खोल दी गयी.

उसके आँख की पट्टी खुलते ही वह अपने शत्रु पर टूट पड़ा और इस वेग से आक्रमण किया की दुश्मन के पाव उखरने लगे उसका सामना करने के लिए मकवाना का पत्र आगे बढा,, और कान्हा के हाथों मारा गया. मकवाना के पुत्र के मरते ही भीमदेव की सेना थोडा दब गयी पर युद्ध बंद नहीं हुई, इसी समय सारंगराय ने जोर से आक्रमण किया और चौहान सेना का दन्त खट्टा करने लगा ये देख कर Prithviraj Chauhan स्वयं घोड़े में बैठ कर यद्ध करने लगे उनके यद्ध मैदान में आते ही चौहान सेना में फिर से वही जोश आ गयी और भीमदेव के सेना को पीछे धकेलने लगी, संध्या का समय होने लगा और बहत सारे वीर दोनों दलों के मारे जाने लगे.

इसी समय भीम देव का सामना पृथ्वी राज से हो गया, दोनों दलों की सेना की तलवार की गूंज से सारा माहौल थर्रा उठा. भीमदेव को Prithviraj Chauhan ने एकाएक ऐसा वार किया की उसका सर दूर जाकर गिर गया. भीमदेव की मरते ही चारो ओर Prithviraj Chauhan की जयजयकार होने लगी. सारी गुर्जर सेना पट्टनपूरी की ओर भागने लगी, इस युद्ध में Prithviraj Chauhan की ओर से 1500 घुड़सवार, पांच सौ हाथी, और पांच हज़ार सिपाही काम आये.

मुहम्मद गौरी का आगमन

Prithviraj Chauhan की उम्र अब सोलह वर्ष की हो चुकी थी इस समय वे नागौर के पास अट्टपुर में शिकार खेल खेल रहे थे. इसीसमय मीर हुसैन नाम का एक गजनवी मुसलमान जो चंदरबरदाई के अनुसार मुहम्मद गौरी का चचेरा भाई था, चित्ररेखा नाम की एक वैश्या को साथ लेकर अपने साथ लेकर आ पहुंचा बात ये थी की चित्रलेखा वैश्या होने के साथ साथ बहुत ही गुणवती थी. वह सुन्दर होने के साथ साथ विणा बाजाने, गान विद्या आदि में भी बहुत निपुण थी. शहाबुद्दीन चित्रलेखा को बहुत चाहता था. शाहबुद्दीन उतना गुनी नहीं था पर मीर हुसैन गुनी होने के साथ साथ बहुत ही सुन्दर भी था,

जब शाहबुद्दीन को उसके और चित्रलेखा के प्रेमप्रसंग के बारे में पता चला तो उसने उन्हें डरा-धमकाना चाहा. इसलिए मीर हुसैन, चित्रलेखा के साथ Prithviraj Chauhan की अजमेर नगरी आ पहुंचा. Prithviraj Chauhan ने जब विदेशी को अपने नगर में देखा तो उसने अपने सामंतों से। विचार विमर्श करना उचित समझा, और अंत में Prithviraj Chauhan ने ये फैसला किया की क्षत्रिये धर्म के अनुसार शरणागत में आये हुए को ठुकराया नहीं जाता, और उन्होंने उसे आश्रय दे दिया, अतः Prithviraj Chauhan ने उसे अपने सभा के दाहिने ओर स्थान दिया और उसे बहुत ही सम्मान भी दिया. 

चन्द्रबरदाई के अनुसार Prithviraj Chauhan से गौरी के बैर का कारण यही था, लेकिन अन्य इतिहासकारों की माने तो गौरी भारत केवल लूट मार करने के लिए आया था उन्होंने किसी भी वैश्या के बारे में कोई जिक्र नहीं किया है. अगर चन्द्रबरदाई का कारण शै है तो ये बात माननी पड़ेगी की एक वैश्या के कारण घोर अनर्थ हो गया. शहाबुद्दीन ने अपने भाई के पीछे एक गुप्त भेदिया भी चोर रखा था ताकि वो ये जान सके की भारतवासी उसके साथ कैसा बर्ताव करते है,

उसके गुप्तचर ने देखा की Prithviraj Chauhan उसे बहुत इज्जत के साथ रखा हुआ है, और ये सारा हाल मुहम्मद गौरी को जाकर सुना दिया, ये सुनते ही उसने अपने सरदारों के साथ विचार करने लगा, ये सुनकर उसने अपने एक सरदार ततार खां को अजमेर भेज दिया, और कहलवा दिया की अगर तुम चित्रलेखा को लौटा देते हो तो तुम देश में आकर रह सकते हो, ततार खां ने मीर हुसैन को बहुत समझाना चाहा पर वो एक नहीं माना,

अंत में वो हार मानकर Prithviraj Chauhan को मुहम्मद गौरी का वो पत्र दे दिया जिसमे लिखा था की “तुम मीर हुसैन को अपने राज्य से निकाल दो वरना मैं तुम पर आक्रमण कर दूंगा, इतना सुनते ही Prithviraj Chauhan के साथ साथ सारे सामंत क्रोधित हो उठे और एक स्वर में कह उठे “शरणागत को त्यागना क्षात्र धर्म के विपरीत है, मुहम्मद गौरी जो चाहे कर ले हम मीर हुसैन को नहीं निकल सकते है “. आखिर का उस ततार खां को लचर होकर वहां से जाना पड़ा. 

वह गजनी पहुँच कर सारा हाल गौरी को सुनाया, इतना सुनते ही गौरी ने अपने सभी सरदारों को बुला भेजा और Prithviraj Chauhan से अपने अपमान का बदला कैसे लिया जाए इस पर विचार विमर्श होने लगा. ततार खां ने भारत पर आक्रमण करने की राय दी पर इस पर खुरासान ने ये राय दी की हम भारत को जानते नहीं है इसलिए इस समय अकर्मण करना उचित नहीं होगा क्योंकि शत्रु को जाने बगैर युद्ध करने में कोई बुद्धिमानी नहीं है, इतना सुनते ही उसके दूत भी बोल उठे की हाँ ये बात सत्य है क्योंकि पृथ्वीराज, उसके सामंत और उसके सैनिक कोई साधारण पुरुष नहीं है, गौरी कुछ देर तक शांत बैठा रहा फिर अपने दूत से बोला तुम तो भारत गए हो न तुम मुझे भारत के बारे में बताओ, दूत ने उसे भारत के बारे में बटन शुरु किया की संसार में भारत जैसा कोई दूसरा देश नहीं है,

यहाँ सुन्दरता का भंडार है,यहाँ की भूमि उर्वरता से भरी पड़ी है, यहाँ में कई महल है जिसकी सुन्दरता का वर्णन मैं बोल के नहीं कर सकता है, यह देश जन, संपत्ति और वैभव से भरी पड़ी है, इसपर गौरी ने कहा की तब तो ये देश धर्म प्रचार के लिए बहुत ही सही है,इतना कह कर वो चुप हो गया, इसके बाद उस दूत ने कहा कि मैं लगभग आधा भारत घूम चूका हूँ मैंने कोई भी तीर्थ स्थल नहीं छोड़ा है, पर वहां एक बात मुझे देखने को मिली है की वहां पर हिन्दू समाज कई भागों में बंटा हुआ है ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र आदि मैं सबसे मिला पर वो सब अपने काम में अद्भुत है,अगर मैं दूसरी शब्द में कहूं तो भारत एक जन्नत है,

इसपर गौरी ने कहा की तो फिर उस जन्नत से लौट क्यों आये? इसपर उस दूत ने कहा की मैं तो बस यहाँ पर आपको रास्ता दिखाने के लिए आया हूँ बिना मुश्लिम धर्म के प्रचार किये उस देश की उन्नति नहीं हो सकती है. पर ये बात है की हिन्दुओं की सकती असीमित है उन्हें पराजय नहीं किया जा सकता, वहां की प्रजा तो अपने राजा के प्रति इतनी भक्त है की उसके एक आदेश से वो जहर तक पी लेते है अतः आप हिंदू को कमजोर न समझे इतना कहकर वो दूत शांत हो गया. 

गौरी ने कहा की मानता हूँ की ये सब ठीक है पर हिन्दुओं में । जितनी वीरता है उतनी ही उनमे फूट भी भरी पड़ी है, इसलिए मैं इन बैटन पर विचार नहीं कर सकता, विचार करने की बात तो ये है की कासिम ने केवल बीस वर्ष की उम्र में ही हिन्दुओं पर विजय प्राप्त की थी. महमूद ने भारत पर अठारह बार आक्रमण किया तब हिन्दुवों की ताकत कहाँ चली गयी थी,उनके पास ताकत अवश्य थी पर कुसंगत और कुविचार उनमे उस समय भी भरी पड़ी थी,

कासिम में जब देवलपूरी पर आक्रमण किया था तब हिन्दुओं ने कहा था की जब तक उनके मंदिर पर ध्वजा लहराती होगी तबतक उन्हें कोई नहीं हरा पायेगा,कासिम ने सबसे पहले उस ध्वजा को ही काट दिया और तब हिन्दुओं ने ये सोच लिया की अब उनकी हर निश्चित है और बिना परिश्रम के ही कासिम ने उनपर विजय प्राप्त कर ली थी, इतिहास से ये साबित होता है की हिन्दोवों को हराया जा सकता है और और भारत में मुसलमान धरम प्रचार संभव है. इसके बाद गौरी ने अपने सभी सरदारों की सहमती ली और इस्लाम धर्म के प्रचार हेतु भारत पर आक्रमण करने का फैसला लिया गया.

सारुंड का युद्ध

दुसरे ही दिन गजनी में युद्ध की तयारियां शुरू होने लगी और मुहम्मद गौरी अपनी सेना को सुस्सज्जित कर के Prithviraj Chauhan की ओर युद्ध करने चल दिया. भारत में समय समय पर कई मुसलमान ने आक्रमण कर इसे लूटा है, उन्होंने भारत के कई भू- भाग में कब्जा कर लिया पर वो उनकी रक्षा नहीं कर पाए, और हिन्दुओं ने उनपर फिर से अपना अधिकार कर लिया. मुहम्मद गौरी ने भी भारत के कई उत्तर के भू-भाग में अपना अधिकार जमाया और प्रभुत्व स्थापित किया. 

उसने 1174 में मुल्तनानगर,178 में अनाहाडा, और 182 तक सारे सिन्धु देश (वर्तमान में पाकिस्तान) अपना अधिकार जमा लिया था.इसके बाद उसने 1184 में लाहौर और सियाकोट, पर भी अपना अधिकार जमाया था. इसके बाद उसका सामना Prithviraj Chauhan से हुआ था. 

जब Prithviraj Chauhan को ये मालूम हुआ की मुहम्मद गौरी उनपर आक्रमण करने के लिए प्रस्तुत हो रहे है तो उन्होंने अपने सभी सामंतों, कैमाश,चन्द्र, पुएंदिर, संजम राय, कान्हा को इकठा किया और अपनी सेना के साथ मुहम्मद गौरी को जवाब देने के लिए साउंड की ओर अग्रसर हुए.

मीर हुसैन को जब ये बात मालूम हुई तो उसने भी एक हजार सैनिक बल को जमा किया और Prithviraj Chauhan के सामने प्रस्तुत होकर कहा की महाराज मेरे कारण से ही आपके इस राज्य में ये विपदा आई है मैं कैसे पीछे रह सकता है, आपने मेरी असमय में मदद की थी अब मुझे अपना कर्तव्य पूरा करने दीजिये, Prithviraj Chauhan उनके बातों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुए, और दोनों की सम्मिलित सेना आगे बढ़ने लगी. उन्होंने सारंड नामक एक जगह में अपना पड़ाव डाल दिया. गौरी के दूतों ने भी ये समाचार उसे सुनाया और तेज़ी से सारंड की ओर अग्रसर हुई और वहां पहुंच गयी. 

Prithviraj Chauhan को जैसे ही ये खबर मिली उनकी सेना तैयार हो गयी और हर हर महादेव शब्द करती हुई आगे बढ़ी, फौज के आगे बढ़ने का समाचार सुनकर मुहम्मद गौरी ने अपनी सेना को पांच भागो में विभक्त कर Prithviraj Chauhan की सेना पर आक्रमण कर दिया, Prithviraj Chauhan ने यादवराय,महंसी,बड़ाराम गुजर, आदि को मीर हुसैन की मदद करने का आदेश दिया, और सबसे पहले मीर हुसैन का सामना गौरी के सेनापति ततार खां से हो गया.

मीर हुसैन के 1500 सैनिक और ततार खां के 7000 सैनिकों ने युद्ध में हिस्सा लिया, बहुत ही घोर युद्ध हुआ, इस युद्ध में ततार खां अपने 5000 सैनिकों के साथ मारा गया और मीर हुसैन भी 300 मुसलमान और 200 हिन्दुओं के साथ मारा गया, ततार खां के मरते ही उसकी सेना भागने लगी. ततार खां को पराजित होते देख खुरासान खां की सेवा आगे बढ़ी और उसका सामना Prithviraj Chauhan के सामंत चामुंडराय से हो गयी,

चामुंड राय ने भी खुरासन खां को मार गिराया और उसके मरते ही उसकी सेना बादशाह गौरी की सेना से जा मिली, अब Prithviraj Chauhan की सेना ने बड़े ही वेग से आगे बढ़ी, Prithviraj Chauhan ने वीरता पुर्वक लड़ाई करते हुए उन मुसलमानों की तरफ बढ़ते चले गए, और अपनी तलवार से मुसलमानों को गाजर मुली की तरह काटते गए, हिन्दू सेना की वीरता देखकर उनकी दांत खट्टे होने लगे और वो भागने लगे, Prithviraj Chauhan की सेना उनका पीछा करने लगे, जब मुहम्मद गौरी ने अपनी सेना को पीछे भागते देखा तो वो एक जगह खड़ा होकर फिर से लड़ने की इच्छा से सैनिक एकत्र करने लगा, पर Prithviraj Chauhan के सेवा को रोक पाना उसके बस में न थी,

जल्द ही Prithviraj Chauhan की सेना ने उसे चारो तरफ से घेर लिया, मुहम्मद गौरी ने Prithviraj Chauhan के सामने अपना सर झुकाना ही उचित समझा, और Prithviraj Chauhan ने “एक झुकी गर्दन पर तलवार चलाने को क्षत्रिये धर्म के विपरीत समझ कर उसे बंदी बना लिया गया. इस युद्ध में मुहम्मद गौरी के बीस हज़ार सैनिक और कितने ही सरदार मारे गए और Prithviraj Chauhan की तरफ से 1300 सैनिक और 5 सरदार मारे गए. Prithviraj Chauhan ने गौरी को पांच दिनों तक दरबार में रखा और मीर हुसैन के पुत्र को उसे सौंप दिया, उन्होंने गौरी को बहुत सा धन, और फिर कभी न आक्रमण करने की प्रतिज्ञा करा कर उसे जाने दिया. 

चित्ररेखा मीर हुसैन की मृत्यु का समाचार सुनकर उसके शव के साथ जीवित ही कब्र में गड गयी. और इस तरह से सारुंड का युद्ध समाप्त हुआ.

मुहम्मद गौरी का फिर से आक्रमण

मुहम्मद गौरी का फिर से आक्रमण । परन्तु शाहबुद्दीन ने इसे अपना अपमान समझा और Prithviraj Chauhan से अपना बदला लेने का ठान लिया. एक बार Prithviraj Chauhan लट्टवन में शिकार खेलने गए थे, जब गौरी को इसबात का पता चला तो उसने उसी समय उनपर आक्रमण कर दिया, पर उसे उस बार भी हार का सामना करना पड़ा, उस समय गौरी किसी तरह भागने में सफल हो गया था. 

कुछ समय के बाद अब Prithviraj Chauhan नागौर मैं थे, उन्हें ये ससमाचार मिला की मुहम्मद गौरी फिर से आक्रमण करने की फिराक में है, इतना सुनते ही पृथ्वीराजने अपनी सेना एकत्र करना शुरू कर दिया, इस वक़्त Prithviraj Chauhan के पास केवल 8000 सैनिक थी इसलिए उन्होंने दिल्ली अपने नाना अनंगपाल जी से कहलवा कर 4000 सैनिकों को और मंगवा लिया अपनी सारी सेना को तैयार करने के बाद Prithviraj Chauhan साउंड की ओर चल दिए और दुश्मन के आने का इंतज़ार करने लगे.

इस समय भारत के इतिहास का काफी भीषण समय था क्योंकि विदेशी भारत पर बार बार आक्रमण कर रहे थे और केवल Prithviraj Chauhan ही उनका अकेला ही मुकाबला कर रहे थे, इतिहासकार के अनुसार कश्मीर के मुसलमान और पंजाब के कुछ भागो के हिन्दू भी Prithviraj Chauhan के विरुद्ध मुहम्मद गौरी का साथ दे रहे थे, एक बात तो बिलकुल ही निश्चित है की एक मात्र Prithviraj Chauhan के कारण ही कई वर्षों तक विदेशी भारत की ओर आंख उठा कर भी नहीं देख पाए.

मुहम्मद गौरी की सेना Prithviraj Chauhan की ओर आगे बढती चली आ रही थी, जिसकी खबर Prithviraj Chauhan को पहले से थी, Prithviraj Chauhan ने अपना भेदिया भेज कर जानकारी मंगवानी चाही, भेदिया ने उन्हें जानकारी दी की मुहम्मद गौरी तीन लाख सेना के साथ आक्रमण करने के लिए आ रहा है, उनके सेना में गखर, काबुली,कश्मीरी,हक्शी, आदि तरह के सेना है. यद्यपि Prithviraj Chauhan पर गौरी ने एक बड़ी सेना के साथ हमला किया था और Prithviraj Chauhan के पास केवल पंद्रह हज़ार ही सेना थी, इसलिए इस बार Prithviraj Chauhan को गौरी के बहुत बड़ी सेना का सामना करना पड़ा था, 

इस बार का युद्ध बहुत ही भयानक था, यह युद्ध भी सारंड के समीप ही हुआ था. जब मुहम्मद गौरी को ये पता चला की Prithviraj Chauhan के पास थोड़ी सी ही सेना है तो वह बहुत खुश हुआ, और सबसे पहले खुरासानी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दे दी, इस आक्रमण को बचने के लिए लोहाना अजानुबाहू अग्रसर हुई, लोहाना की वीरता से मुसलमान सेना की छक्के छुट गयी.Prithviraj Chauhan की मदद करने हेतु कान्हा भी नागौर से आ पहंचा, Prithviraj Chauhan की वीरता और युद्ध कुशलता को देखकर दुश्मन अपने होश खोने लगे,

कान्हा वे भी बड़ी वीरता दिखाई, मुसलमान सेना पृथ्वीराज,कान्हा,चन्द्र,पुय्न्दीर, की वीरता देखकर सहम गयी और कराह उठी,जो हो इस थोड़ी सी सेना ने ऐसा विचित्र काम कर दिखाया जो की असंभव सा लगता है. छोटे से हिन्दु सेना से मुसलमान सेना हताशत हो रहे थे, हिन्दू सेना यवनी सेना को छिन्न-भिन्न करते हुए मुहम्मद गौरी की ओर अग्रसर हुई, ये देखकर गौरी घोडा छोड़ हठी पर सवार हो गया और यावनी सेना चारो ओर से उशे घेर कर उशकी रक्षा करने लगे. 

सभी राजपूत वीर अपनी प्राणों के ममता को छोड़ कर युद्ध कर रहे थे उन्हें केवल यवनी सेना के खून की प्यास थी. मुहम्मद गौरी को हाथी में सवार देख कर जैतसी की सेवा गौरी की तरफ अग्रसर हुई, वह युद्ध करते करते एक ऐसे जगह में जा पहुंचा जहाँ से निकल पाना असंभव था, वो चारो ओर से घिर चूका था, इस समय Prithviraj Chauhan की दृष्टी जैतसी पर पड़ गयी और उन्होंने अपना घोडा जैतसी की तरफ भगाया, उन्होंने चारों ओर से घेरे हुए यवनी सेना को अकेले ही परलोक भेज दिया, जैतसी ने भी बड़ी बहादुरी दिखायी.

यवनी सेना पीछे भागने को मजबूर हो गयी,गौरी फिर से हाथी छोड़ घोडा में बैठ युद्ध करने लगा पर कोई काम न आया. छोटे से हिन्दू सेना के सामने उतनी बड़ी मुसलमान सेना पीठ दिखाने को मजबूर हुई, गौरी भी उनके साथ भागा, परन्तु Prithviraj Chauhan के मना करने पर भी जैतसी ने गौरी का पीछा कर उसे पकड़ लिया और Prithviraj Chauhan के चरणों में लाकर पटक दिया.

गौरी को फिर से बंदी बना लिया गया. Prithviraj Chauhan ने इन सभी झमेलों से निश्चिंत होकर इच्छन कुमारी से विवाह किया और इस आनंद के मौके पर गौरी को धन देकर छोड़ दिया. परन्तु स्त्रियौ के सम्बन्ध में Prithviraj Chauhan की अभिलासा जैसे जैसे पोरी होती जाती वैसे वैसे और बढ़ती जा रही थी. एक वर्ष के बाद ही Prithviraj Chauhan इच्छन कुमारी से ट्रिप हो गए और दूसरी की आवश्यकता आ पड़ी. इसी बीच उनकी नज़र कैमाश की बहन पर जा पड़ी, और शादी करने की इच्छा जताई, कैमाश के पिता ने उनकी बातें मान ली और अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह करवा दिया साथ ही कई आदमियों की जान की रक्षा की.

दिल्ली प्राप्ति

दिल्ली में शाषण तोमर वंश के राजा महाराज अनागपल के हाथों पर था, दिल्ली में प्रथम अनागपल ने तोमर वंश की स्थापना सन 733 में की और उस समय से लेकर लगभग बीस राजाओं ने दिल्ली पर शाषण किया. Prithviraj Chauhan के नाना दिल्ली में अंतिम तोमर वंश के शाषक थे. राजा अनंगपाल के समय की कुछ खास घटना की जानकारी नहीं मिलती है, उनके राज्य की स्थापना की भविष्यवाणी पहले ही की जा चुकी थी,

आज जिस जगह पर दिल्ली बसी हुई है पहले यहाँ से दो मील दूर में दिल्ली बसी हुई थी जो की सबसे पहले महाराज युधिस्ठिर ने दिल्ली बासयी थी और समय समय इसका स्थान हर राजाओं द्वारा बदलता चला गया,चंदरबरदाई ने दिल्ली के बारे में लिखा है की जब प्रथम अनंगपाल ने दिल्ली बसाने लगे थे तब उनके कुल के पुरोहितों ने एक खूब लम्बी कील जमीन में गाड़ दी और महाराज से कहा की जबतक ये कील इस जमीन में गडी रहेगी तबतक दिल्ली में तोमर वंश का शासन रहेगा क्योंकि ये कील शेषनाग के माथे से जा लगी है.

महाराज अनंगपाल को इस बात पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने वो कील निकलवा कर देखना चाहा जब वो कील निकला गया तब उस कील में सही में खून लगा था, अनंगपाल को इस बात पर बहुत दुःख हुआ की वो बहुत बड़ी बेवकूफी कर गए, फिर उन्होंने दुबारा पुरोहितों को बुला कर वो कील जमीन में गढ़वानी चाही पर ऐसा नहीं हो पाया, पुरोहितों ने काहा की महाराज मैंने आपका राज्य अचल करवा चाहा था पर भगवान् की ही इच्छा नहीं थी अब तोमर वंस के बाद चौहान वंश और फिर दिल्ली में मुसलमानों का शाषन हो जायेगा.अब हम Prithviraj Chauhan के जीवन चरित्र की ओर झुकते है. 

पहले ही बता चुके है की दिल्ली के शाषक महाराज अनंगपाल की दो पुत्री थी, उन्होंने अपनी कनिष्ठ कन्या कमलावती का विवाह अजमेर के महाराज सोमेश्वर से की थी. परन्तु कुछ इतिहासकारों का मत है की Prithviraj Chauhan के दादा बीसलदेव ने दिल्ली में आक्रमण कर अनंगपाल को हराया था और इसलिए अनागपल ने दिल्ली और अजमेर के बीच के रिश्तों को मजबूत करने के लिए अपनी कनिष्ट पुत्री कमलावती का विवाह सोमेश्वर राज चौहान से करा दिया था.

Prithviraj Chauhan बचपन से ही कभी अजमेर में रहते थे और कभी दिल्ली में, महाराज अवंगपाल Prithviraj Chauhan के गुणों पर मोहित रहते थे, उनका कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्हें अपने राज्य के लिए एक योग्य राजा की जरूरत थी, उन्होंने मन ही मन Prithviraj Chauhan को ही दिल्ली का महाराज मान लिया था, क्योंकि उन्हें मालूम था की ये भविष्य में एक होनहार मनुष्य होगा.

और इसलिए जब वो विर्धावास्था को प्राप्त किये तब उन्होंने बदरिकाश्रम जाकर तपस्या करने के विचार से और दिल्ली का भार उचित हाथों में शौंप कर निश्चिंत होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने एक दूत अजमेर भेजकर Prithviraj Chauhan को दिल्ली का सम्राट बनाने का नेवता भेजा, इसे सुनकर महाराज सोमेश्वर और Prithviraj Chauhan बहुत ही खुश हुए परन्तु जयचंद्र जो की अनागपल का बड़ा नाती था उसका दिल्ली में पहले अधिकार था, इस कारण से दो राज्यों के बीच झगडा हो जाने का बहुत बड़ा खतरा भी था, इसलिए इस विषय पर विशेष विचार की आवश्यकता पड़ी.

Prithviraj Chauhan ने अपने सभी सामंतों को एकत्र कर महाराज अनागपल का पत्र को पढ़ा गया, और खुद Prithviraj Chauhan और सभी सामंतों ने अपना यही मत दिया की महाराज अनागपल के इस मत को ठुकराना नहीं चाहिए और इसे अपना कर्तव्य समझ कर Prithviraj Chauhan ने दिल्ली का सिंहासन को स्वीकार कर लिया, एक ओर महाराज अनागपल जहाँ बहुत खुश हुए वहीं दूसरी ओर जयचंद्र द्वेष की भावना में जलने लगा. “जैसी होत होत्वयता, वैसी उपजे बुद्धि के अनुसार न तो Prithviraj Chauhan और न ही उनके सामंतों ने इस बात पर गौर किया इस कारण से पुरे भारतवर्ष में कितनी बड़ी विपदा आ जाएगी, और अगर हम महाराज जयचंद्र की Prithviraj Chauhan से द्वेष भावना को भारत का अर्ध्यतन का एक भाग कहे तो ये गलत नहीं होगा.

कुछ दिन के बाद ही प्रीथ्विराज चौहान ने अपने कुछ शूरवीर सामंतों को साथ लेकर दिल्ली पहुँच गए, दिल्ली को Prithviraj Chauhan के महाराज बनने के अवसर पर दुल्हन की तरह सजाया गया, उनके पहुँचते ही दिल्ली में उत्सव का माहोल बन गया और सम्बंत 168 मार्गशीर्ष शुक्ल 5 गुरुवार को Prithviraj Chauhan दिल्ली के राज सिंघासन में बिठाये गए, दुसरे ही अजमेर और दिल्ली के संयुक्त सेना ने बड़े ही धूमधाम से Prithviraj Chauhan की सवारी निकली, चरों ओर “जय जय Prithviraj Chauhan Chauhan” की ध्वनि से सारा माहोल गूंज उठा.

सांयकाल के समय दरबार लगा, Prithviraj Chauhan राजगद्दी में विराजमान हुए, दिल्ली के प्रधान प्रधान अधिकारीयों ने दरबार में आकर जुहार की और अपनी नजरे दी. उसके दुसरे ही दिन महाराज अनंगपाल ने अपनी धर्म पत्नी के साथ बदरिकाश्रम चले गए, और Prithviraj Chauhan निति तथा न्यायपुर्वक दिल्ली का राज्य-शाषण करने लगे.

माधव भाट

अनंगपाल ने तो दिल्ली को Prithviraj Chauhan के हाथों में सौंप कर बदरिकाश्रम चले गए पर वो साथ ही भारत के कई राजाओं, जयचंद्र और मुहम्मद गौरी के मन द्वेष में भावना भी जला गए. दिल्ली प्राप्ति ने अन्य राजाओं के मन में सुलगती आग में घी का काम किया. जयचंद्र एक बलवान राजा था जिस समय उसे यह समाचार मिला की अनंगपाल ने दिल्ली का सिंहासन Prithviraj Chauhan को दे दिया है वह क्रोध से अधीर हो उठा, परन्तु अभी कुछ करने का सही अवसर नहीं है यह सोच कर वह चुप रह गया.

हलाकि उसने उसी समय कुछ नहीं किया पर ये आग भीतर ही भीतर सुलगती रही और इसीका बहुत ही भयानक फल ये हुआ की भारत को 900 वर्षों तक मुसलमानों के जंजीर में बंधना पड़ा.  मुहम्मद गौरी हमेशा ही Prithviraj Chauhan से अपने अपमान की बदला लेने में लगा रहता था, वह Prithviraj Chauhan से युद्ध कर के युद्ध का अंजाम देख चूका था , और ये सोचने के लिए मजबूर हो रहा था की जब Prithviraj Chauhan के पास केवल अजमेर थी तब हमें इतनी बड़ी हर दे गया अब तो उसके पास दिल्ली राज्य भी आ गया अब तो उसे हराना और भी मुस्किल हो गया है.

अब मुहम्मद गौरी नि कुछ चालाकी से काम लेना शुरू किया, इसके लिए उसने एक माधव भाट नाम के मनुष्य का सहारा लिया. माधव भाट बहुत ही बुद्धिमान,चतुर और कई भाषाओं का जानकर था, गौरी ने उसे Prithviraj Chauhan का भेद जानने के लिए भारत भेजा. भारत पहुँच कर माधवभाट ने अपनी बुद्धिमता का परिचय दिया और थोड़े ही समय में उसने Prithviraj Chauhan के दरबार में कितने ही सामंतों के बीच प्रियपात्र बन बैठा.

Prithviraj Chauhan के दरबार में एक धर्मायण नाम का कार्यस्थ था, इसे ही माधव भाट ने अपनी कौशल से फंसा लिया और इसी के माध्यम से Prithviraj Chauhan के बहुत सारी बातें मालूम कर ली. इसी के माध्यम से वो Prithviraj Chauhan के समीप पहुँच सका और उनका कृपापात्र बन बैठा. राजा की कृपा दृष्टी देखकर अन्य मनुष्य भी उसे आदर की भावना से देखने लगे थोड़े ही समय में उसने Prithviraj Chauhan के नैतिक, व्यवहारिक, चालों की पूर्ण समीक्षा एवं अन्य सामंतों और राज्य कर्मचारियों की पूरी पूरी जानकारी एकत्र कर वो Prithviraj Chauhan से विदा लिया और गजनी आ गया. किसी ने उसे नहीं पहचाना की वो कौन था या फिर उसका उद्देश्य क्या था.

वापस गजनी जाकर माधव भाट ने गौरी को Prithviraj Chauhan एवं उनके सभी वीरों की पूरी जानकारी दे दी, Prithviraj Chauhan की वैभव को देखकर वो जल गया. और अपने लुब्ध दृष्टी के कारण अपने बड़े बड़े सरदारों को एकत्र कर दरबार लगाया, दरबार में सभी सरदारों के सामने माधव ने Prithviraj Chauhan की सारी बातें कही, तर्क वितर्क करने के बाद गौरी के सामने ये बात रखा गया की ये एक हिन्दू है और इसकी बात का भरोसा नहीं करना चाहिए, संभव ही ये उनके साथ मिल कर हमें धोखा दे रहा हो इसलिए हमें किसी और आदमी को Prithviraj Chauhan का भेद लेने भेजना चाहिए, गौरी ने उनकी बात मान ली और मुहम्मद खां फ़क़ीर के भेष में दिल्ली जा पहुँच Prithviraj Chauhan के भेद जानने लगा, धर्मायन ने उसे भी सब बता दिए, और वापस आकर उसने भी वही बातें कही जो की मधाव भाट ने कही थी.

अब गौरी अपने सरदारों के साथ विचार विमर्श करने लगा, सरदारों ने Prithviraj Chauhan के शोर्य की प्रसंसा अवश्य ही की लेकिन साथ ही साथ ये भी कहा की धर्मयां के कारण हम अवश्य ही जीतेंगे. कुछ ही दिन में मुहम्मद गौरी आक्रमण के लिए फिर से चल पड़ा. गजनी से चलकर तीनदिनों में वह नरोल के पास अपना पड़ाव डाला और वहां पर उसके अन्य सामंत और सरदार भी आकर उससे मिल गए अब गौरी एक बहुत बड़ी सेना लेकर Prithviraj Chauhan से युद्ध करने चल दिया, चंदरबरदाई के अनुसार उस समय गौरी के पास दो लाख सेना थी. 

जब गौरी सिंध पार कर चूका था तब Prithviraj Chauhan को गौरी के आक्रमण के खबर मिली, उन्होंने तुरंत ही अपने प्रधानमंत्री कैमाश से पूछा की क्या करना चाहिए तो कैमाश ने सलाह दी की दुश्मन को अपने राज्य में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए बल्कि हमें आगे बढ़कर की दुश्मन को उसके किये का दंड देना चाहिए, Prithviraj Chauhan और उनके अन्य सामंतों को कैमाश की ये बात अच्छी लगी.

अब Prithviraj Chauhan ने अपनी सत्तर हज़ार सेना लेकर पानीपत नाम के एक जगह पर युद्ध के लिए जा पहुंचे, मुहम्मद गौरी की सेना भी बढ़ी चली आ रही थी तुरंत ही दोनों दलों का सामना हो गया, बहुत ही भीषण युद्ध होने लगा, घोंसो की धुनकार तथा मारू बाजे की झंकार और वीरों के हुंकार से सेना का उत्साह बराबर बढ़ता जा रहा था, दोनों ओर के वीर योद्धा अपने स्वामियों की जयजयकार करते हुए अपने प्राणों को न्योछावर करने आगे बढ़ते गए.

Prithviraj Chauhan और उनके वीर सामंतों ने ऐसे वीरता दिखाई की यवनी के पांव उखड गए, मुहम्मद गौरी ने अपनी सेना में फिर से साहस दिलाई और फिर से युद्धक्षेत्र में ला कर खड़ा कर दियाक, पर इसका कोई फल नहीं हुआ वीर Prithviraj Chauhan और कान्हा जिस ओर मुड़ते यवनी सेना उधर ही साफ़ हो जाती कोई मुसलमान इनकी ओर आने का हिम्मत नहीं करता, Prithviraj Chauhan कितने ही सेना को अकेले ही मार गिराया, जल्द ही चामुंडराय ने मुहम्मद गौरी को बंदी बना लिया और Prithviraj Chauhan की जयजयकार से सारा वातावरण गूंज उठा, चन्द्रबरदाई के अनुसार ये युद्ध सन 1168 वैशाख सुदी 10 को हुआ था.

इस युद्ध में Prithviraj Chauhan की ओर से भीम, भरावाह,श्यामदास,जस्थवल,केसरी सिंह,रणवीर सोलंकी,सागरह खिची,महत राय,हरिप्रमार,वीरध्वज,भीमसिंह बघेल,लखन सिंह, आदि सामंतों के साथ 10000 सैनिक भी मारे गए, जबकि गौरी की ओर से शेर खां,सुल्तान खां,मीर अहमद,मारुमीर,मीर्जहाँ,मीर जुम्मन,गज़नी खां,हसन खां, के साथ दस मुख्य सैनिक और 18000 सैनिक मरे गए थे. 

मुहम्मद गौरी को Prithviraj Chauhan ने एक महीने तक कैदखाना में रखा, और मुहम्मद गौरी के Prithviraj Chauhan के क़दमों में गिर कर अपने जीवन की भीख मांगने पर Prithviraj Chauhan ने उसे कुछ धन देकर छोड़ दिया.

पृथा कुमारी

पृथा कुमारी सोमेश्वर राज चौहान के Prithviraj Chauhan के अतिरिक्त पृथा नाम की एक कन्या थी. जब पृथा कुमारी विवाह के योग्य हुई तब उसका विवाह चितोड़ के अधिपति वीरबल रावल समरसिंह के साथ निश्चित हुआ. वास्तव में समर सिंह एक विचित्र प्रतिभा पूर्ण पुरुष थे, चितोड़ के मनानिये सिंहासन में बैठने के बाद भी वे सदा तपस्वी के भेष में रहते थे.

महाकवि चन्द्र ने अपने रासो नामक ग्रन्थ में स्थान स्थान पर उनकी प्रशंसा की है उनके विषय में लिखा है की वे साहसी, धीरस्वाभाव और युद्ध कुशल होने के साथ साथ धर्पिये, सत्याप्रिये, और सदा शुद्ध चरित्र के थे. वे मिष्ट भाषी,और कभी किसी से कठोर व्यवहार नहीं करते थे, समर सिंह के इन्ही गुणों के कारण गोहिलोत और चौहान जाती के समस्त सैनिक और सामंत उनसे अत्यंत श्रद्धा भक्ति का भाव रखते थे. चन्द्रबरदाई ने अपने मुख से ही ये बात स्वीकार किया है की इस महाकाव्य में जो भी शाषण निति है उसका अधिक अंश महाराज समर सिंह के उपदेशों पर आधारित है.

जिस समय पृथा कुमारी के विवाह के लिए दूत के साथ साथ ही कान्हा चौहान, तथा पुरोहित गुरुराम भी वहां पहुंचे थे, उस समय समर सिंह एक व्यार्घ चर्म पर विराज कर रहे थे, उनका शांत स्वाभाव तथा वीर पुर्ण तेजोमय देखकर गुरुराम ने प्रित का विवाह स्थिर किया और समर सिंह ने भी विवाह को सादर स्वीकार कर गुरुराम को बहुत कुछ देना चाहा, पर गुरुराम ने कुछ भी नहीं लिया, समर सिंह और पृथा ने जो विवाह के बंधन में बंधा वो तो बंधा ही इधर चौहान जाती से उनका स्नेह और ही बढ़ गया, समर सिंह के निति बल, आचार बल,

चरित्र बल और समर बल ने चौहान की शक्ति को और ही बढ़ा दिया इसे देखकर शत्रुओं की छाती दहल उठी और तब से Prithviraj Chauhan और समर सिंह दोनों हर विशाल युद्ध में एक साथ नजर आने लगे, दोनों वीरों ने एक साथ मिलकर शत्रुओं का संहार करने लगे. और Prithviraj Chauhan को एक और बड़ा सा सहारा मिल गया था.

खजाने की खोज

रासो में लिखा है की Prithviraj Chauhan को एक बहुत बड़ा खजाना हाथ लगा था जिसे निकलने में समर सिंह ने Prithviraj Chauhan की मदद की थी. एक बार Prithviraj Chauhan दिल्ली से अजमेर जा रहे थे तब उन्हें खट्ट वन में एक सुन्दर सा तालाब दिखा उस तालाब में एक सुन्दर सी मूर्ति थी उस मूर्ति के माथे में लिखा था सिर कटे धन संग्रेहे, सिर सज्जे धन जाए” यह लिखावट देखकर Prithviraj Chauhan को बहुत आश्चर्य हुआ, उन्होंने अपने चतुर मंत्री कैमाश से इसका मतलब पूछा, कैमास बहुत ही बुद्धिमान पुरुष था, उसे पता था की सायद यहाँ खजाना है.

और इसे निकालने में वक़्त लगेगा जिससे की कहीं गौरी फिर से कहीं अकर्मण न कर दे, उसने उसी समय इसका मतलब समझाते हुए कहा की यहाँ पर एक खजाना छुपा है अगर आप इसे निकलवाना चाहे तो रावल समरसिंह को बुलावा भेज दे, कैमाश के कहे अनुसार समरसिंह को बुलाने के लिए पुएंदीर एवं अन्य सामंतों ने अनेक प्रकार के उपहार लेकर चितोड़ गए और इधर अपने घर का भेदी धर्मयन ने अपने विश्वासी दूत से मुहम्मद गौरी को ये सन्देश भेजवा दिया की Prithviraj Chauhan अभी धन निकलने में लगे है इसलिए आप अभी अपना अपमान का बदला ले सकते है.

इधर पुएंदीर की प्राथना के अनुसार रावल समर सिंह अपनी सेना के साथ आ पहुंचे, और ठीक इसी समय गौरी ने अपने मुख्या मुख्या सरदारों के साथ आ पहुंचा, परन्तु कैमाश की बुद्धिमता के अनुसार पहले ही प्रबंध हो चूका था, Prithviraj Chauhan ने आगे बढ़कर गौरी का सामना किया, क्योंकि वे पहले गौरी को परस्त कर फिर धन निकालना चाहते थे, यह युद्ध नागोर के पास ही हुआ था इधर समर सिंह भी पृथ्वी की मदद करने के लिए पहुँच गए, दोनों योधाओं ने जमकर युद्ध किया और मुहम्मद गौरी को फिर से बंदी बना लिया गया.

यह समाचार जब गजनी पहुंचा तब वहां से गौरी को मांगने के लिए दूत आया और इसके बहुत कुछ प्राथना करने पर Prithviraj Chauhan ने श्रीन्गाहर नामक एक बहुत बढ़िया हाथी और बहुत सा धन देकर गौरी को छोड़ दिया और एक बार फिर अपना वीरता का परिचय दिया. 

इसके बाद ही धन निकालने का कार्य फिर से शुरू हुआ,इस बार Prithviraj Chauhan को बहुत बड़ा खजाना हाथ लग गया, इसका आधा अंश Prithviraj Chauhan ने समर सिंह को देना चाहा पर उन्होंने खुद कुछ भी न लेकर , अपने पास में से कुछ और मिलाकर सैनिकों में बंटवा दिया.

शाशिवृता

खजाना निकालने का काम अभी समाप्त होते ही समर सिंह चितोड़ और Prithviraj Chauhan दिल्ली पधारे. इसके कुछ दिन के बाद ही Prithviraj Chauhan को ये खबर मिली की देवगिरी के राजा भानराय यादव की पुत्री शाशिविता अनुपम सुंदरी है. भानराय अपनी कन्या का विवाह जयचंद के भतीजे वीरचंद से करवाना चाहता था, इसलिए उसने एक ब्राह्मण के द्वारा एक टिका भेज दिया था, ब्राह्मण टिका लेकर कन्नोज चला गया.

परन्तु इधर शशिवृता Prithviraj Chauhan की प्रशंसा सुनकर मन ही मन मुग्ध हो रही थी. ये सब समाचार Prithviraj Chauhan को मालूम थे. जब विवाह का दिन निकट आया तो वीरचंद कन्नोज से अपनी सेना एवं सामंतों के साथ विवाह के लिए चल पड़ा. तब Prithviraj Chauhan भी अपनी दस हज़ार सेना और बड़े बड़े सामंतों को लेकर अपनी प्रेम पिपासा को शांत करने के लिये अग्रसर हुए. इस बार बहुत भयानक युद्ध की सम्भावना थी.

जब शाशिवृता के मन का हाल उनके माता पिता को पता चला तो उन्होंने उसे बहुत समझाना चाहा पर शाशिवृता उनकी एक न सुनी, यह देखकर देवगिरी के राजा ने अपने मंत्री से परामर्श लिए उसके मंत्री ने सुझाव दिया की आप अपनी पुत्री का विवाह वीरचंद से ही करें क्योंकि आप टिका भेजवाकर वचन दे चुके है. पर अपने पुत्री के मोह वश वे ऐसा न कर पाए, उन्होंने Prithviraj Chauhan को एक पत्र लिखकर ये बता दिया की शाशिवृता शिवालय में रहेगी आप उसे वहां से आकर ले जाए. जब Prithviraj Chauhan को ये खबर मिली तो उन्होंने अपनी सेना का भार कान्हा चौहान को दे दिया और स्वम निठुर राय और यादवराय के साथ देवगिरी जा कर घूमने लगे.

जब Prithviraj Chauhan घुमते हुए किले के निचे पहुंचे तो शाशिवृता ने उन्हें देख लिया और दोनों की आंखे चार हो गयी,शाशिवृता ने अपने पिता से आज्ञा लेकर शिवालय चली गयी. उस समय शाशिवृता के साथ वीरचंद और शाशिवृता के पिता की सेना थी, इसलिए Prithviraj Chauhan ने बुद्धि से काम लेना उचित समझा, उन्होंने अपने सिपाहियों को योगियों के भेष में मिल जाने की आज्ञा दी यही हुआ. अस्त्रों को गुप्त रूप से छिपाते हुए Prithviraj Chauhan की सेना वीरचंद और भानराय के सेना में सम्मिलित हो गयी. इधर Prithviraj Chauhan एक सुन्दर सा घोडा लेकर मंदिर के पास आ पहुंचे, जब शाशिवृता मंदिर से पूजा कर निकली Prithviraj Chauhan ने शाशिवृता को सीडी पर से ही उसके करकमलों को पकड कर घोड़े पर बिठा लिया.

शाशिवृता को लेकर भागते हुए वीरचंद के सेना ने Prithviraj Chauhan को देख लिया अब शाशिवृता के कारण एक बहुत बड़ा युद्ध होने वाला था. वीरचंद की सेना हुंकार उठी एक और जहाँ मंदिर के सामने मग्न करने वाली ध्वनि बज रही थी वहीं वो ध्वनि युद्ध के बाजों और बिगुल में बदल गयी,जयचंद्र का भतीजा कम्धुन्ज वीरचंद केसरिया बंगा पहने, शस्त्र बंधे शिवदर्शन को आ रहा था, शाशिवृता को इस तरह हरण होते देख, उसने अपनी तलवार निकाल Prithviraj Chauhan की ओर झपटा, उसने सुन्दरी शाशिवृता को छीन लेना चाहा, तुरंत ही Prithviraj Chauhan के सामंत और सेना ने अपनी कपट भेष को फेंक कर अपने शस्त्र निकाल लिए. मंदिर के पास ही मार काट मच गयी.

किसी तरह शाशिवृता को लेकर Prithviraj Chauhan अपने सेना के पड़ाव में आ गए. अब क्रमवध युद्ध होने लगा. बहुत भयानक युद्ध होने लगा. यद्यपि भानराय ने Prithviraj Chauhan को पात्र लिखकर अपनी पुत्री को उन्हें सौंपना चाहा था पर वो अपनी इज्जत बचाने के लिए वीरचंद के साथ हो लिया. संध्या होना चाहती थी पर सैनिकों में विराम न था, इसी बीच शाशिवृता का भाई मारा गया, राजा भान राय ने Prithviraj Chauhan से अपनी हार मानकर अपनी सेना वापस मंगवा ली, पर वीरचंद ने हार नहीं मानी. दुसरे दिन फिर युद्ध शुरु हो गया, आज के युद्ध में वीरचंद का वीर सहचर ख़ोज खवास मारा गया, उसकी मृत्यु से वीरचंद को बहुत दुःख हुआ, साथ ही उसे कुछ भय भी था इसलिए वो अपने सामंतों से विचार करने लगा की क्या करना उचित होगा.

उसके सामंतों ने इस युद्ध का घोर विरोध किया और वीरचंद से कहा की एक स्त्री के लिए हज़ार सिपाहियों का बलिदान देना बिलकुल भी उचित नहीं होगा अतः इस युद्ध को यही समाप्त कर देना उचित रहेगा. वीरचंद ने उनकी बात मान ली और अपने सेना को पीछे हटने का आदेश दे दिया वीरचंद की सेना जैसे ही पीछे हटने लगी Prithviraj Chauhan के सेना को लगा की वो हमसे डर कर भाग रही है और Prithviraj Chauhan की सेना ने और भी वेग से आक्रमण कर दिया, वास्तव में वीरचंद की सेना का बल कम नहीं हुआ था,

तुरंत ही उसकी सेना फिर से अपने स्थान में डट कर खड़ा हो गयी और फिर से युद्ध करने लगी, शाम होने वाली थी. वीरचंद के मस्तक में हमेशा एक चांदी का छत्र लगा रहता था, पुंडीर ने उस वीरचंद पर एक ऐसा वार किया की उसका छत्र दूर जाकर गिर गया, छत्र के गिरते ही उसकी सेना में कोलाहल मच गया वीरचन्द्र भी बहुत भयभीत हो गया, थोड़ी देर में ही रात हो गयी और युद्ध विराम हो गया.

वीरचंद और Prithviraj Chauhan ने अपने अपने सामंतों से विचार करने लगे. Prithviraj Chauhan के सामंतों ने अपना मत दिया की आप शाशिवृता को लेकर दिल्ली चले जाईये हम यहाँ संभाल लेंगे Prithviraj Chauhan ने कहा की इसतरह हम आपलोगों को मुसीबत में छोड़ कर दिल्ली जाकर आनंन्द नहीं मना सकते है, सभों के समझाने पर भी Prithviraj Chauhan ने एक न सुनी अन्त में सभों को चुप होना पड़ा, सुबह होते ही युद्ध का बिगुल बज उठा, आज का युद्ध में निट्टराय को सेनापति बनाया गया.

घोर युद्ध होने लगा. Prithviraj Chauhan घोड़े में बैठकर इस तरह वीरचंद के सेना को काट रहे थे जैसे उनका काल उनके सामने हो, कोई भी उनके पास आने से पहले एक बार अवश्य सोच रहा था, शाम होने से पहले ही वीर पुंडीर ने वीरचंद को बंदी बना लिया पर Prithviraj Chauhan ने कहा की अपना काम हो गया अब उसे बंदी बनाने से कोई फायदा नहीं और Prithviraj Chauhan ने वीरचंद को छोड़ देने का आदेश दिया. इस तरह Prithviraj Chauhan ने हजारों मनुष्यों की बलिदान देकर शाशिवृता को अपना पत्नी बनाया और दिल्ली आ पहुंचे.

वीरचंद का भानराय से द्वेष

इधर Prithviraj Chauhan शाशिवृता को ले दिल्ली आ पहुंचे और वीरचन्द्र ने Prithviraj Chauhan से हार का बदला भानराय से लेने की ठानी. उसने भानराय के किले को चारों ओर से घेर लिया और कुछ सेना और भेजने के लिए जयचंद को पत्र लिखा. भानराय ने जब अपने को घिरा पाया तो Prithviraj Chauhan को पत्र लिखा की आपके कारण ही मेरे उपर इतनी बड़ी विपदा आई है इसलिए इस समय आप मेरी रक्षा कीजिये.

इसी समय वीरचंद का दूत पत्र लेकर जयचंद के पास पहुंचा और पत्र के अतिरिक्त उसने जबानी ही सारा हाल जयचंद्र को बता दिया, जयचंद्र पहले से ही दिल्ली का राज सिंहासन न मिलने के कारण Prithviraj Chauhan से क्रोधित था अब तो वो और भी क्रोधित हो गया, उसने तुरंत ही वीरचंद को अपनी सहायता पहुंचाई. जयचंद ने तुरंत ही अपने सभी मंत्रियों को बुलाकर ये परामर्श करने लगा की अपने सभी अधीन राजाओं और सामंतों को सभी सेना समेत कन्नोज बुला लिए जाए वे राजसूय यज्ञ करेंगे. 

दुसरे ही दिन सवरे से ही कन्नोज में सेना एकत्र होने लगी. जयचंद्र के अधीन राजाओं की सेना भी उनमे आकर सम्मिलित होने लगी. उनकी सेना ध्वजा लिए आगे आगे चलने लगी और उस ध्वजा के पीछे पीछे वीर योद्धा चलने लगे. इसी समय नरवर के राजा का छोटा भाई अमरसिंह और दीर्घकाय महाबलशाली पंगुराय भी अपनी सेना लेकर जयचंद के सेना में सम्मिलित हो गया. इस तरह जयचंद की विशाल सेना भानराय और Prithviraj Chauhan से बदला लेने के लिए चल पड़ी. जब भानराय द्वारा लिखा पत्र Prithviraj Chauhan को मिला तो उन्होंने भानराय की मदद करना अपना कर्तव्य समझा और तुरंत ही Prithviraj Chauhan ने समरसिंह को पत्र लिख कर कहा की इस समय आपको हमारी मदद अवश्य ही करनी चाहिए.

समर सिंह ने सहर्ष ही Prithviraj Chauhan की प्राथना स्वीकार कर ली. समर सिंह को पहले से ही पता था की यवनी सेना Prithviraj Chauhan पर फिर से आक्रमण करना चाहती है इसलिए समरसिंह ने Prithviraj Chauhan से कहा की आप दिल्ली न छोड़े,आप दिल्ली की सुरक्षा के लिए वहीं रहे और आप अपने कुछ सामंत हमारे साथ कर दे भानराय की सहायता हम कर लेंगे. Prithviraj Chauhan ने समरसिंह की बात मान ली. उन्होंने अपने सामंत चामुंडराय और जैतसी को समरसिंह के पास भेज दिया और स्वयं दिल्ली में रुक गए. 

समरसिंह ने अपने भाई अमरसिंह को भानराय की सहायता के लिए देवगिरी भेज दिया, इधर वीरचंद भानराय का किला को घेराबंदी किये बैठा था पर अबतक कुछ कर नहीं पाया था. चामुंडराय ने रात्रि के समय जाकर वहां आक्रमण कर दिया, एक तो वर्षा की अंधकारमयी रात्रि के कारण वीरचन्द्र की सेना पहले से ही विचलित हो रही रही थी, जब जल की वर्षा के साथ तीरों की वर्षा भी होने लगी तो वीरचन्द्र की सेना और भी घबरा गयी.

इतना सब कुछ होने पर भी उसकी सेना ने रणक्षेत्र नहीं छोड़ा, दोनों दलों में घोर युद्ध होने लगा. इसी बीच समरसिंह की सेना लिए उसका भाई अमर सिंह युद्ध मैदान में आ गए और चामुंडराय की मदद करने लगे, युद्ध और भी भीषण होने लगा. जयचंद को हर समय का समाचार लगातार मिल रहा था, वीरचंद की सेना की हार से पहले ही वो रणक्षेत्र में पहुँच कर किला में अधिकार करना चाहता था, इसलिए वो और भी वेग से आगे बढ़ा.

जब वह वहां पहुँच कर देखा तो पता चला की किला बहत लम्बा चौड़ा और खाई से घिरा हुआ है तब उसे लाचार होकर वहीँ पड़ाव डालना पड़ा. जयचंद बहुत ही कूटनीतिज्ञ था, उसने राजनीतिज्ञ चालो द्वारा वहां के रक्षको को घूस देकर अपने साथ मिलाना चाहा पर ऐसा न हो पाया. तब उसने दुसरे ढंग की चाले चला. उसने किला में सुरंग लगाने की आज्ञा दी,परन्तु किले की खाई इतनी गहरी थी की उसकी ये चेष्टा भी निष्फल हुई, अब उसके तीनो राजनीतिज्ञ शस्त्रों साम,दाम,दंड, निष्फल हो गए थे अब आखिरी शास्त्र भेद की बरी थी, उसने एक दूत को राजा भानराय के पास भेजकर ये सन्देश भेजवा दिया की आप मेरे साथ मिल जाईये ताकि हम मिलकर Prithviraj Chauhan से आपके अपमान का बदला ले सके.

भान राय ने अपने मंत्री से जब इसकी सलाह ली तो उसके मंत्री ने कहा की हमें जयचंद के इस चाल में नहीं आना चाहिए Prithviraj Chauhan से बैर करना उचित नहीं होगा अपने मंत्री की दूरदर्शिता को देखकर वो बहुत खुश हुआ और भावराय ने जयचंद के साथ मिलने से इनकार कर दिया. जब जयचंद लाचार होकर किले पर अपना अधिकार नहीं जमा पाया तब उसने देवगिरी में लूटपात मचाना शुरू कर दिया. और अनेक स्थानों में अपना शाषण फैलाना भी शुरू कर दिया, परन्तु चामुंडराय और अमरसिंह के सेना ने उसके इस कार्य में उसे तंग करने लगी. अपने राज्य से इतनी दूर आकर जयचंद वास्तव में मुसीबत में फंस गया था क्योंकि वो देवगिरी के इलाकों में अपना अधिकार तो कर लेता पर जयादा समय तक उसका।

उचित प्रबंध न कर पाता, इसप्रकार से चामुंड राय और अमरसिंह के द्वारा उसके कितने ही सेना मारे गए. जयचंद्र के सामंतों ने उसे ये बात समझाई की अगर आप देवगिरी में विजय प्राप्त कर भी लेते है तो आप अपना प्रभुत्व अपने राज्य से दूर होने के कारण यहाँ कायम नहीं रख पाएंगे, ये युद्ध शाशिविता के लिए थी, Prithviraj Chauhan तो उसे ले गए अब व्यर्थ ही नरसंहार करने की कोई आवश्यकता नहीं है. मंत्रियों की ये बात जयचंद के मन में भा गयी, उसने उस समय अपने सभी सेना को कन्नोज वापस चलने की आज्ञा दे दी. इस तरह से देवगिरी का युद्ध समाप्त हो गया.

दिल्ली पर आक्रमण

Prithviraj Chauhan के शाषणकाल में दिल्ली सुख और समृद्धि से फल फूल रही थी. मुहम्मद गौरी बार बार Prithviraj Chauhan पर आक्रमण करता और उसे मुंह की खानी पड़ती. मुहम्मद गौरी समझ चूका था की Prithviraj Chauhan से सीधे सीधे नहीं जीता जा सकता है इसलिए उसने शस्त्र युद्ध के बदले कूटनीति से कार्य करवा आरंभ किया,उसने अपने कुछ आदमियों को दिल्ली में भेजकर दिल्ली में जगह जगह कोहराम मचाना शुरू कर दिया.

दिल्ली की सेना जब तक उनतक पहुँचति तबतक वो लोग वहां से लूटमार कर भाग जाते और फिर दूसरी जगह लूट मार करते. दिल्ली की प्रजा का सुख दिनों दिन खोता जा रहा था, और अन्दर ही अन्दर उनमे Prithviraj Chauhan के प्रति दुर्भावना आती जा रही थी की हमारे महाराज कुछ नहीं कर रहे है. परन्तु सच्चाई कुछ और ही थी Prithviraj Chauhan हर तरह से उनकी मदद कर रहे थे.

अब मुहम्मद गौरी के आदमियों ने अनंगपाल के पास जाकर फरियाद की, कि आपने अपना राज्य एक गलत और अनुपयुक्त पुरुष के हाथों में दे दिया है कृपया आप अपना राज्य अपने हाथों में वापस ले ले. Prithviraj Chauhan तरह तरह से अपनी प्रजा को कष्ट पहुंचा रहा है, आपकी प्रजा पीड़ित हो रही है,अतः आप वापस चलकर अपना राज पाट अपने हथिन में वापस ले ले. शाहबुद्दीन के पक्षपात धर्मयन ने कुछ लोगो को अपने साथ मिला कर अनंगपाल को ऐसा दिखाया की उन्हें लगे की Prithviraj Chauhan की प्रजा सही में उनसे दुखी है, अनंगपाल मुहम्मद गौरी की चाल को समझ न पाए, और उन्हें उसकी बातों पर यकीन हो गया. 

अनाग्पाल ने Prithviraj Chauhan को एक पत्र लिखकर अपना राजपाट वापस माँगा और दिल्ली राज्य छोड़ देने को कहा, परन्तु हाथ में गया हुआ राजपाट इतनी आसानी से कौन दे सकता है, Prithviraj Chauhan को मुहम्मद की चाल का भनक मिल गयी थी अतः Prithviraj Chauhan ने राजपाट लौटने से साफ़ इंकार कर दिया. अनंगपाल के तपोस्वी वन जाने पर भी उनके पास पक्षपातियों की कमी न थी, अनंगपाल ने अनायास ही थोड़ी सेना बटोर ली और दिल्ली में आक्रमण कर दी, Prithviraj Chauhan बहुत फेर में पड़ गए, वे सोचने लगे की एक तो अनंगपाल रिश्ते में नाना लगते है और उपर से इतना बड़ा राजपाट और इतना बड़ा राज्य तो उनका ही दिया हुआ है वे उनसे युद्ध कैसे कर सकते है.

अतः Prithviraj Chauhan ने किले का द्वार बंद करने का आदेश दे दिया और ये भी कहा की चौहान सेना एक भी सैनिक को हाथ नहीं लगाएगी, ऐसा ही हुआ, अनाग्पाल ने Prithviraj Chauhan के किले में हमला किया और Prithviraj Chauhan किले का दरवाजा बंद कर केवल आत्मरक्षा करने लगे. लाचार होकर अनंगपाल को लौट जाना पड़ा. शाहबुद्दीन गौरी अपने कार्य साधन के लिए इस समय को उपयुक्त समझा. उसने हरिद्वार में अपना एक दूत भेजकर अनंगपाल को कुछ प्रलोभन देकर अपने साथ मिला लिया. मुहम्मद गौरी के संपर्क में अनाग्पाल की बुद्धि भ्रष्ट होती ही जा रही थी. अनंगपाल ने दिल्ली के कुछ इलाकों में अपना कब्ज़ा करना शुरू कर दिया था. अनाग्पाल एवं उनके कुछ सैनिकों की सहायता लेकर गौरी दिल्ली में आक्रमण कर दिया. 

इस बार यवनी सेना को आक्रमण करता देख Prithviraj Chauhan शांत न रह सके उन्होंने आगे बढ़कर उन्हें दंड देना उचित समझा, उन्होंने अनंगपाल का तो ध्यान ही छोड़ दिया था. मुहम्मद गौरी को दंड देने के लिए महल का दरवाजा खोल दिया गया. इस बार ततार खां मुहम्मद गौरी का प्रमुख सेनापति बनकर आया था.Prithviraj Chauhan ने अपने सेना को अनंगपाल को जीवित पकर लेने की आज्ञा दी थी. बहुत ही भयानक युद्ध होने लगा. मुहम्मद गौरी के वीर सरदार मारुफ़ खां,ततार खां,खुरासान खां, आदि योद्धाओं ने अपने अपमान का बदला लेने में कोई कसर न रखी, वे इस तरह से राजपूत की सेना में टूट पड़े जैसे की भेंड के झुण्ड में मृगराज टूटता है, परन्तु जिन्हें वो भेंड समझ रहे थे वास्तव में वो शेर थे.

चौहान सेना के वीरों ने मुसलमानों का इस खूबसूरती से सामना किया की दुशमन अपनी शान भुलाकर अपनी औकात में आ गए,खून की नदियाँ बहने लगी, लड़ते लड़ते दोनों ओर की सेना मदमत हो गयी, परन्तु भारत में अभी मुसलमानों के शासन में विलम्ब था, Prithviraj Chauhan की दहाड़ और हिन्दू सेना की हुंकार सुनते ही दुश्मनों के रूह तक काँप उठे थे, वे विचलित होकर इधर उधर भागने लगे, Prithviraj Chauhan ने यवनी सेना में ऐसा तहलका मचाया की वो भागने को मजबूर हुए, जल्द ही मुहम्मद गौरी के सेना को हारना पड़ा. चामुंडराय ने मुहामद गौरी को पकड़ लिया और कैदखाने में डाल दिया, अनंगपाल को भी पकड़ लिया गया और पुरे सम्मान पुर्वक महल में रखा गया. 

Prithviraj Chauhan सभी कामों से निश्चिंत होकर दरबार में विराजे. सेनापति कैमाश ने मुहम्मद गौरी को Prithviraj Chauhan के समक्ष प्रस्तुत किया। Prithviraj Chauhan ने बहुत कुछ समझा कर, और कुछ धन देकर उसे छोड़ दिया. इधर अनंगपाल ने एक वर्ष तक महल में आराम से रहे. इसके बाद अनंगपाल की रानियों ने उन्हें समझाया की आप व्यर्थ ही किसी के बहकावे में आकर अपना राजपाट सब नष्ट करने में लगे है.

क्या आपको दिल्ली की प्रजा को देखकर लगता है की वो Prithviraj Chauhan से दुखी है, अगर आपको राज करने का मन था ही तो फिर Prithviraj Chauhan को दिल्ली का राजगद्दी क्यों सौंपा. अनाग्पाल को उसके अपनी की बातें भा गयी, उन्हें अपने किये पर पछतावा होने लगा, और उन्हें Prithviraj Chauhan के सामने लज्जित महसूस होने लगी. अतः अब उन्हें दिल्ली में रहना उचित नहीं लगा और फिर बदरिकाश्रम की ओर प्रस्थान कर दिए. Prithviraj Chauhan ने स्वयं ही उनको बदरिकाश्रम तक पुरे सम्मान से पहुंच आये.

राजसूये यज्ञ

अब हमलोग कन्नोज की ओर झुकते है. जब जयचंद की उम्र सोलह वर्ष की थी तब उसके यहाँ चंद्रमा के सामान दीपवती कुमारी संयोगिता ने जन्म लिया. यह कन्या बहुत ही रूपवती थी. जब संयोगिता की उम्र बारह वर्ष की हुई तब जयचन्द राजसूये यज्ञ करने का विचार कर रहा था. बारह वर्ष की उम्र में ही सब कोई संयोगिता की सुन्दरता में मुग्ध रहते थे. जयचंद भी उससे बहुत प्यार करता था. जयचंद के लाड प्यार इतना बढ़ा चढ़ा था की संयोगिता दिनों दिन हठी बनाये जा रहा था. इस हठ का परिणाम क्या होगा इसका अंदाज़ा किसी को न था. 

बालुकराय जयचंद के भाई थे, जयचंद ने बालुकराय से परामर्श कर राजसूय यज्ञ करना चाहा. राजसूए यज्ञ में छोटे से बड़े सभी राजाओं को निमंत्रण देना होता है, इसलिए जयचंद ने विभिन्न प्रान्तों के राजाओं को एकत्र करने के लिए निमंत्रण पत्र भेजने का विचार किया. कन्नोज राजमहल में अतिथि सत्कार और दानपुण्य के लिए सभी सामग्रियां जुटायी जाने लगी. 

उस समय जयचंद के मंत्री सुमंत ने बहुत तरह से समझाने की कोशिश की किये करना उचित नहीं है, आजकल यज्ञ का सुचारु रूप से संपन्न होना संभव नहीं है व्यर्थ ही बैठे बिठाये विरोध बढ़ने की सम्भावना है. परन्तु जयचंद ने अपनी मंत्री की एक बात नहीं मानी बल्कि उसने अपने मंत्री को आदेश दिया की तुम Prithviraj Chauhan को ये पत्र लिखो की दिल्ली राज्य पर हमारा और तुम्हारा दोनों का अधिकार है इसलिए दिल्ली का आधा क्षेत्र हमें दे दो और यज्ञ में उपस्थित होकर यज्ञ का काम पूरा करो.

यह बात सहज में में नहीं होने वाली थी . बहुत कुछ समझाने पर भी जब जयचंद नहीं माना तब जयचंद के मंत्री सुमंत खुद ही Prithviraj Chauhan से मिलने के लिए दिल्ली चले गए. सुमंत ने Prithviraj Chauhan को समझाया और यह निश्चय हुआ की सभी सामंत एकत्र होकर इस विषय पर विचार करेंगे. इधर जब ये सब बातें हो रही थी तब जयचंद का भेजा हुआ एक अन्य दूत राजसूये यज्ञ का निमंत्रण लेकर आ पहुंचा, निमंत्रण पत्र में लिखा था की तुरंत यहाँ आकर जयचंद की आज्ञा अनुसार राजसूए यज्ञ का जो भी कार्य सौंपा जाए उसका पालन कीजिये, Prithviraj Chauhan ने दूत को बहुत तरह से समझाया की इस समय जयचंद का राजसूये यज्ञ करना किसी भी तरह से उचित नहीं है इसलिए इस काम में वे हाथ न डाले,अतः तुमलोग जाकर अपने राजा को समझाओ.

दूत और सुमंत वहां से लौट आये. सुमंत ने लौट कर फिर से समझाना चाहा परन्तु कौन सुनता है, इस समय तो जयचंद के माथे होनहार स्वर थी. उसे जब मालूम हुआ की Prithviraj Chauhan न ही दिल्ली का आधा राज्य देना चाहता है न ही उसका अधीनता स्वीकार कर राजसूए यज्ञ में शामिल होना चाहता है तो उसके क्रोध का सीमा न रही. उसने युद्ध विद्या विरासद बालुकराय और यवनी सेना प्रमुख खुरासान खां को बुलाकर राज्य की सुरक्षा का भार सौंपा और खुद ये विचार करने लगा की Prithviraj Chauhan को परास्तकर जबरदस्ती कैसे यहाँ लाया जाए, पर ये काम सोचने जितना सहज नहीं था, उपर से यज्ञ का समय निकल जाने का भी डर था. इसलिए उसने आज्ञा दी की Prithviraj Chauhan की सोने की प्रतिमा बनवाकर द्वार पर स्थापित कर दी जाए और यज्ञ का कार्य शुरू किया जाए, यही राय स्थिर हुआ और यज्ञ की तयारियां होने लगी.

यह समाचार भी Prithviraj Chauhan के पास पहुंचा. Prithviraj Chauhan की प्रतिमा द्वारपाल के स्थान में रखे जाने का समाचार सुनकर Prithviraj Chauhan के सभी सामंत क्रोध से अधीर हो उठे, उन्होंने अपने महाराज का अपमान होते देख क्रोध पुर्वक Prithviraj Chauhan से युद्ध की अनुमति मांगी, उन सबने एक स्वर से कहा की हमें कन्नोज में इसी वक़्त आक्रमण कर यज्ञ को विध्वंस कर देना चाहिए, परन्तु सेनापति कैमाश ने कहा की की अभी कन्नोज से युद्ध करने का सही अवसर नहीं है जयचंद का बल बहुत ही बढ़ा चढ़ा है और इसके साथ ही कन्नोज में छोटे बड़े नृपति भी उपस्थित है,

इसलिए हमें खोखंदपुर में हमला कर जयचंद के भाई बालुकराय को मार डालना चाहिए उसके मौत से जयचंद को भरी सदमा लगेगा और यज्ञ स्वयं ही विध्वंस हो जायेगा, Prithviraj Chauhan ने कैमाश की बात मान लिए, और बालुकराय को मारने के लिए चल दिए. जैसे ही Prithviraj Chauhan की सेना ने कन्नोज में कदम रखा वैसे ही खोखंदपुर में चरों ओर हाहाकार मच गया, सारे गांव को उजाड़ा जाने लगा, जमींदार पकडे जाने लगे, चौहान सेना के इस उपद्रव से परेशान होकर प्रजा ने बालुकराय से फ़रियाद की. 

बलुकराय बहुत वीर था, उसने ये समाचार सुनकर Prithviraj Chauhan को राज्य में उपस्थित होने से पहले ही रोकना चाहा. युद्ध की तयारियां होने लगी . बलुकराय की सेना ने चौहान सेना को चारों ओर से घेर लिया, बहुत ही भयानक युद्ध होने लगा, बलुकराय इस समय अपने हाथी में बैठकर युद्ध कर रहा था, उसका हाथी ने चौहान सेना को रौंदने लगा था ये देखकर चौहान सेना थोड़ी विचलित हुई पर Prithviraj Chauhan ने उसके हाथी पर एकाएक ऐसा वार किया की उसका हाथी कराहकर जमीन में गिर गया,

हाथी के गिरते ही चौहान सेना बलवती हो उठी और दुगुने जोश से लड़ने लगी, बालुकराय हाथी के गिरने पर स्वयं भी जमीन पर गिर पड़ा, लड़ते लड़ते उसका सामना कान्हा से हो गया, कान्हा ने बालुकराय पर ऐसा वार किया की उसका सर धड़ से अलग हो दूर जा गिरी, बालुक राय के मरते ही सेवा विचलित हो उठी और रणक्षेत्र से भाद खड़ी हुई. इस युद्ध में बालुकराय के पांच हज़ार और Prithviraj Chauhan के तेरह सौ सिपाही मारे गए. 

संग्राम में शत्रु सेना को परास्त का Prithviraj Chauhan खोखंदपुर को लूटने के लिए अग्रसर हुए.और उसे लूटकर दिल्ली लौट आये. इस प्रकार Prithviraj Chauhan ने अपने अपमान का बदला ले राजसूये यज्ञ को विध्वंस किया.

संयोगिता प्रेम प्रसंग

 जिस समय ये समाचार जयचंद को मिला जयचंद क्रोध से पागल हो उठा. उसने तुरंत ही अपने मंत्री को सेना तयार करने की आज्ञा दी, यह समाचार सुनते ही चारों ओर सन्नाटा छा गया. जयचंद की रानी को जब ये समाचार मिला तब तब उसने जयचंद को बहुत तरह से समझाया और कहा की पहले संयोगिता का स्वयंबर कर ले बाद में Prithviraj Chauhan से युद्ध कर ले, क्योंकि इस समय पूरे भारत भर से नरेश उपस्थित है.

ये समाचार संयोगिता को मालूम हुए.संयोगिता पहले से ही Prithviraj Chauhan की कृति सुनकर उन पर आसक्त हो रही थी, ये समाचार सुनकर वो बहुत दुखित हुई। धीरे धीरे उसके मन में Prithviraj Chauhan के प्रति प्रेम का बीज फूट पड़ा, और ये अंकुर कितनो ने ही देखा, जयचंद की रानी ने जयचंद को सारी बातें बता दी, जयचंद ने संयोगिता को बहुत समझाने की कोशिश की, परन्तु संयोगिता ने अपने सहेलियों से स्पष्ट कह दिया था की मैं दुसरे का वरण न करूंगी, दूती ने यह बात जयचंद से जा कही ये सुनकर जयचंद क्रोध से अधीर हो उठा।

और जब स्वयंबर का समय आया तब संयोगिता ने द्वारपाल बने Prithviraj Chauhan के स्वर्ण प्रतिमा में स्वयबर हार डाल दिया, वहां उपस्थित सभी राजा और राजकुमार अपना अपमान समझ कर तुरंत वहां से चले गए, जयचंद ये देख कर उसकी गुस्सा का ठिकाना न रहा और उसने राजकुमारी संयोगिता को गंगा किनारे एक महल में कैद करवा दिया अब उसने Prithviraj Chauhan को मारकर निश्चिंत होना ही उचित समझा औ मन ही मन सोचा की Prithviraj Chauhan को मार डालने से संयोगिता उसके बारे में सोचना बंद कर देगी और और विवाह के लिए राजी हो जाएगी। उस समय वो ये क्रोध के कारण भूल गया था की एक राजपूत की बाला अपने प्राण दे सकती है पर अपना हठ नहीं छोड़ सकती है। Prithviraj Chauhan को ये सभी खबर मालूम हुए, और संयोगिता को पाने की इच्छा उनमे बलवंत हो उठी, पर तुरंत उस समय उन्होंने कुछ नहीं किया.

Prithviraj Chauhan के इच्छानुसार यज्ञ तो विध्वंस हो ही गया था, अब कन्नोज की सेना Prithviraj Chauhan पर आक्रमण करने हेतु दिल्ली की ओर अग्रसर हुई, उसने दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया और कई क्षेत्रों में अधिकार कर गावों को लूटने लगे। जब Prithviraj Chauhan को ये समाचार मिला तब उसकी सेना उन गावों की तरफ अग्रसर हुई और आसानी से जयचंद की सेना को मार भगाया। 

रासो में लिखा है की शहाबुद्दीन की माता कितनी ही बेगमों के साथ मक्के की यात्रा करने जाती थी. वे भारतवर्ष के हांसी प्रान्त से होकर जा रही थी. इस समय हान्सिपुर में नरवाहन नामक नागवंशी सरदार सूबेदार के पद पर नियुक्त था. जब उसकी सवारी दिल्ली राज्य के सरहद के पास पहुंची तब Prithviraj Chauhan के सामंतों ने उसे लूट लिया, Prithviraj Chauhan को इसकी खबर न थी, उनके सामंत ने सब धन लूटकर बेगमों को छोड़ दिया, शाहबुद्दीन की माँ गजनी लौट आई और सारा हाल शहाबुद्दीन गौरी को बता दिया, समाचार सुनकर गौरी अत्यंत क्रोधित हुआ और एक भरी सेना लेकर Prithviraj Chauhan से युद्ध करने निकल पड़ा.

जब सेना हांसीपुर से दस कोश की दूरी पर रह गयी तब जाकर Prithviraj Chauhan के सामंतों को इसकी खबर मिली, चामुंडराय ने तुरंत ही किले की घेराबंदी कर ली और कई दिनों तक युद्ध चलता रहा, परन्तु हांसी के किले में किसी भी तरह यवनी का अधिकार नहीं हो पाया एक बार फिर चौहान सेना की वीरता के कारण यवनी सेना को मुंह की खानी पड़ी. जब ये समाचार गौरी को मिला तब वह स्वयं ही एक और बड़ी सेना लेकर आया, परन्तु Prithviraj Chauhan और समर सिंह ने उससे युद्ध कर उसे फिर से भगा दिया.

संयोहिता हरण- Prithviraj Chauhan और संयोगिता मिलन

इतना सुनते ही जयचंद ने कवी चन्द्र को विदा किया और मंत्री सुमंत को अपनी सेना को तयार करने का आदेश दे दिया, जयचंद के सैनिकों ने तुरंत ही Prithviraj Chauhan के निवास स्थल को घेरने के लिए चल पड़ी जैसे ही ये बात Prithviraj Chauhan के एक सामंत लाखिराय को मिली वो तुरंत ही उनसे युद्ध करने के लिए अग्रसर हो गए. उन्होंने बहुत ही वीरता से युद्ध किया इस युद्ध में Prithviraj Chauhan का सामंत लाखिराय मारा गया और जयचंद का मंत्री सुमंत और सहसमल समेत कई सामंत भी मारा गया.

भांजे और अपने राजमंत्री की मौत और हार का समाचार सुनकर जयचंद और भी क्रोधित हो उठा और अपने हिन्दू और मुसलमान सेना को आक्रमण करने का आदेश भी दे दिया, और साथ ही वो स्वयं भी युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचा. युद्ध आरम्भ हो गया, इसबार Prithviraj Chauhan ने अपने सेना का भार पंगुराय को देकर स्वयं Prithviraj Chauhan ने संयोगिता को लाने के लिए चले गए.

Prithviraj Chauhan के सामंत ने उन्हें अकेले जाने से रोका पर Prithviraj Chauhan उनका कहना न मानकर घोड़े में बठकर अकेले ही कन्नोज जा पहुंचे. Prithviraj Chauhan तो उधर चले गए और इधर दिल्ली में शत्रु सेना चन्द्र के निवास स्थल तक जा पहुंची.जयचंद्र दिल्ली में अपनी सेना का । प्रबंध कर लौट आया. जयचंद की सेना ने चौहान सेना को चारों ओर से घेर लिया बहुत ही भयानक युद्ध होने लगा. जयचंद्र के लगभग दो हज़ार योद्धा मारे गए, Prithviraj Chauhan के भी कई सामंत और सैनिक मारे गए. 

Prithviraj Chauhan घुमते फिरते ठीक उसी स्थान में जा पहुंचे जहाँ संयोगिता थी. महल की दासियाँ झांक झांक कर Prithviraj Chauhan को देखने लगी. अब वे गंगातट में बैठ कर मछलियों का तमाशा देखने लगे. संयोगिता अपने सहेलियों के साथ पहले से ही Prithviraj Chauhan को गंगातट में बैठे हुए देख रही थी. संयोगिता Prithviraj Chauhan को पहचानती नहीं थी.

संयोगिता Prithviraj Chauhan का कामदेव सा रूप देखकर अपने सुध बुध भूल चुकी थी. उनमे से कुछ सहेलियों ने उन्हें बताया की लगता है यही महाराज Prithviraj Chauhan है, क्या उनका परिचय पुछा जाए. संयोगिता ने कहा की मेरा भी मन यही कहता है की यही मेरे प्राणेश्वर Prithviraj Chauhan है, मेरी हाल तो सांप-छुडुंदर सी हो गयी है इधर जब मैं अपने माता पिता को देखती हूँ तो उनके प्रति वेदना उत्पन्न हो जाती है और जब Prithviraj Chauhan के बारे में सोचती हूँ तो उनसे मिलने की इच्छा होती है.

इसी बीच Prithviraj Chauhan के घोड़े के गले की माला की एक मोती टूटकर गंगा में लुडकता हुआ जा गिरा.मछलियाँ उसे खाने का पदार्थ समझ कर एक दुसरे को हटाती हुई उस मोती की ओर लपक पड़ी और उसे खाने का प्रयत्न करने लगी.इसे देखकर Prithviraj Chauhan ने उस माला के सभी मोती को गंगा में एक एक कर डालने लगे, संयोगिता भी ये सारी चीजें देख रही थी, उसने अब अपनी दासी को Prithviraj Chauhan के पास एक मोतियों से भरा थाल देकर भेज दिया, और वो दासी ठीक Prithviraj Chauhan के पीछे खड़ी हो गयी,

अब वो दासी Prithviraj Chauhan को मुट्टी भर भर के मोतियाँ देने लगी और Prithviraj Chauhan मछलियों में खोय सभी मोतियाँ गंगा में डालते चले गए, जब सारे मोती ख़तम हो गए तब दासी ने अपने गले का हार खोलकर Prithviraj Chauhan को दे दिया हाथ में हार देखकर Prithviraj Chauhan चोंक गये, जब उन्होंने पीछे मुड़ा तो उन्होंने एक स्त्री को देखा और फिर Prithviraj Chauhan उससे पूछने लगे की तू कौन है? तब दासी ने अपना परिचय देते हुए कहा की मैं महाराज जयचंद की राजकुमारी संयोगिता की दासी हूँ,

Prithviraj Chauhan ने भी अपना परिचय दे दिया, इतना सुनते ही उस दासी ने Prithviraj Chauhan को संयोगिता के तरफ इशारा कर दिया, संयोगिता उस समय खिड़की से Prithviraj Chauhan को ही देख रही थी,संयोगिता को देखते ही Prithviraj Chauhan की बहुत ही विचित्र दशा हो गयी. दासी ने भी Prithviraj Chauhan को संयोगिता के तरफ इशारा कर दिया, संयोगिता उस समय खिड़की से Prithviraj Chauhan को ही देख रही थी,संयोगिता को देखते ही Prithviraj Chauhan की बहुत ही विचित्र दशा हो गयी.

दासी ने भी संयोगिता को इशारे में सारी बातें बता दी. संयोगिता ने सभी से सलाहकार Prithviraj Chauhan को महल में बुला लिया और यहीं पर उन्होंने गंधर्व विवाह किया. अब वहां से घर जाने का समय हो गया था क्योंकि उन्हें मालूम था की उनके सामंत अभी भी युद्ध कर रहे थे, घर जाने के नाम से ही संयोगिता व्याकुल हो उठी और विलाप करने लगी, उनकी दशा बहुत ही दीन हो गयी.Prithviraj Chauhan भी बहुत व्याकुल हो उठे पर उन्हें वहां ठहरना उचित न लगा,इतने में ही गुरुराम Prithviraj Chauhan को सामने से आते हुए दिखाई दिए, इन्हें देखकर Prithviraj Chauhan के जी में जी आया, गुरुराम को Prithviraj Chauhan की तलाश में भेजा गया था.

गुरुराम ने Prithviraj Chauhan को कहा की अआप तो यहाँ श्रींगाररस में डूबे हुए है परन्तु क्या आपको पता है की लक्खिराय,इंदरमन,कुरंग, दुर्जनराय, सलाख सिंह,भीम राय, और न जाने कितने ही सामंत मारे जा चुके है, इतना कहकर उन्होंने कान्हा को दिया पत्र उनके हाथों में थमा दिया, पत्र पढ़कर Prithviraj Chauhan वहां से चल दिए. Prithviraj Chauhan को रस्ते में ही जयचंद की सेना ने घेर लिया. इस स्थान में Prithviraj Chauhan ने वीरता दिखाते हए बखबी उतने सारे सैनिकों का । मुकाबला किया, गुरुराम ब्राह्मण होते हुए भी तलवार निकाल कर युद्ध में कूद पड़े, वे दोनों लड़ते लड़ते कान्हा के पास जा मिले. 

कान्हा से मिलते ही Prithviraj Chauhan ने सारी कहानी कान्हा से जा कहे, इस पर कान्हा ने कहा ये क्या महाराज, ये आप क्या कर आये, ये काम तो आप बहुत ही अनुचित किया,दुल्हिन को वहीं छोड़ आये, या तो आपका उनका हाथ ही नहीं पकड़ना था, और अगर पकड़ लिया था तो छोड़ कर न आना था.Prithviraj Chauhan कान्हा की बात मान कर फिर लौट आये.साथ में वीरवर गोयन्दराय भी थे.

Prithviraj Chauhan महल में जाकर संयोगिता को लेकर फिर अपने स्थान की ओर बढ़े. ये समाचार सारे कन्नोज में जंगल की आग की तरह तुरंत ही फ़ैल गयी की Prithviraj Chauhan संयोगिता को लिए जा रहे रहे है.जयचंद की सेना Prithviraj Chauhan को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ी. इससमय कन्नोज राज्य में जयचंद का रावण नामक एक सरदार था, उसने जयचंद के आदेशानुसार सारे कन्नोज में ये बात फैला दी की Prithviraj Chauhan जहाँ मिल जाए उसे पकड़ कर मार दिया जाए. 

जयचंद ने Prithviraj Chauhan को पकड़ने के लिए अपनी समस्त सेना को जल्द से जल्द उपस्थित होने का आदेश दे दिया. उसकी तय्यारी देखते ही सारे कन्नोज वाशी कहने लगे थे की आज Prithviraj Chauhan का जिन्दा कन्नोज से निकल जाना असंभव है. राह में ही जयचंद की सेना का सामना Prithviraj Chauhan से फिर से हो गया.

जयचंद की सेना को देखकर गोयन्दराय ने इस समय अतुल्य प्रकारम दिखाया, उसने दोनों हाथों में तलवार लेकर जयचंद की सेना में इस तरह टूट पड़ा और उन्हें काटने लगा की जैसे कोई गाजर मूली काटता हो, गोयन्दराय ने अकेले ही शत्रु की सेना में हलचल मचा दी, उसने जयचंद के कई सैनिकों को अकेले ही मार गिराया,अंत में गोयन्दराय इस वीरता के बावजूद वीरगति को प्राप्त किया, Prithviraj Chauhan ने संयोगिता को एक किनारे में कर खुद भी युद्ध में उतर गए और वीरता के साथ लड़ने लगे,Prithviraj Chauhan के अलाव पंज्जूराय,केहरीराय, कएंथिर परमार,पिपराय,आदि भी युद्ध में पराकर्म दिखने लगे. पंज्जुराय भी मारा गया, लेकिन मरने से पहले उसने जयचंद की मुसलमान सेना को बहुत हानि पहुंचाया.

अब पुयांदिर कान्हा के साथ युद्ध भूमि में आकर Prithviraj Chauhan की मदद करने लगा, एक एक कर Prithviraj Chauhan के कई सामंत मरने लगे, पुयांदीर ने भी शाम तक युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त किये. रात हो चुकी थी लेकिन आज युद्ध थमने का नाम नहीं ले रही थी. अब कान्हा ने अपना बहुत ही परक्रम दिखाया. आज के युद्ध में कान्हा ने जैसा प्रक्रम दिखाया है उसे देखकर चंदरबरदाई ने बहुत ही ज्वलंत भाषा में लिखा है की कान्हा की तलवार का घाव खाकर मेघ के सामान शरीर वाले हाथी और शत्रु के सेना मेघ के सामान ही गरज उठते थे. 

धीरे धीरे रात गहरी हुई और युद्ध थम गया, सब सामंतों ने संयोगिता समेत Prithviraj Chauhan को बीच में किया और बैठकर धीरे धीरे ये विचारने लगे की आगे क्या करना है.सभी सामंतों ने चंदरबरदाई को दोष देने लगे की इसी के सच बोलने के गुण के कारण हम पर इतनी बड़ी विपदा आई है. Prithviraj Chauhan ने सबको समझाया. इस समय सभी सामंतों की लाश को एक जगह एकत्र किया जाने लगा, Prithviraj Chauhan उन्हें देखकर अपने आप को रोक नहीं पाए और और जिस जगह में लाश रखी थी उस जगह जाकर उनसे लिपट लिपट कर रोने लगे और अपना माथा पटकने लगे.

Prithviraj Chauhan की दुर्गति देखकर सारा माहोल शोक में डूब गया, Prithviraj Chauhan का रो रो कर जब बहुत ही बुरा हाल हो गया तब चन्द्रबरदाई ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि जो होना था वो तो हो गया अब आगे के लिए क्या विचार है.सभी सामंतों ने ये विचार किया की अभी जैसे बन पड़े महाराज को बेदाग़ दिल्ली पहुंचा देना चाहिए,इसके बाद हम दुश्मन के सेना को समझ लेंगे अगर हम सबको भी वीरगति को प्राप्त करना पड़े तो कोई बात नहीं सीधे स्वर्ग पहुंचेंगे. 

अब सामंत उन्हें समझाने लगे की आप संयोगिता को लेकर रात्रि के अंधेरे में निकल जाए, सभी सामंत Prithviraj Chauhan को समझा कर थक गए पर वो एक न माने, उनके सामंत जितना समझाते वो उतना ही उनपर बिगड़ते. उनकी ये हालत देखकर सभी सामंत बहुत दुखी हुए. सुबह होते ही Prithviraj Chauhan घोड़े पर सवार हुए संयोगिता उनके पीछे जा बैठी,सारे सिपाहीगण और सामंत उन्हें चारुं ओर से घेरे हुए दिल्ली की ओर अग्रसर हुए,इधर कन्नोज की सेना उनको राह में गिरफ्तार करने के लिए बहुत ही वेग से बढ़ी.

कन्नोज सेना Prithviraj Chauhan को पकड़ना चाहती और सभी सामंतगण उनकी रक्षा किये जा रहे थे. Prithviraj Chauhan की सेना एक घेरा बनाये हुए दिल्ली की ओर चली जा रही थी, जयचंद की सेना बराबर उनके पीछा करती जा रही थी, इस तरह से युद्ध करते करते कान्हा भी वीरगति को प्राप्त किया. इस युद्ध में Prithviraj Chauhan के चौसठ सामंत वीरगति को प्राप्त किये. और बहुत ही कठिनता से दिल्ली पहुँच गए. इसप्रकार से Prithviraj Chauhan अपने राज्य की इतने मजबूत स्तंभों को गंवाकर संयोगिता का हरण किया.

उपसंहार

भारत के भाग्य में शुरू से ही फूट रही है, इस फूट के कारण कितने ही घर बर्बाद हो गए थे और और हो रहे है, इस फूट की आग में Prithviraj Chauhan भी नहीं बच पाय, Prithviraj Chauhan के अध्यापतन का यह पहला कारण था, इस फूट ने ऐसा भयानक आकार धारण कर लिया था की आपस में विद्रोह ने कितना ही भयानक धूम मचाई और कलह को जन्म दिया, उनके वीरता से कई राजा बहुत दुखित हुए थे, और उन्हें नीचा दिखने में लगे रहते थे,जरा जरा सी बातें में तलवार निकाल लेना और बात बात पर लोगो को मार गिराना Prithviraj Chauhan को अध्य्पतन की ओर धकेलने लगा था. ये सब बातें आपको Prithviraj Chauhan के पिछले भागों को पढ़ने से पता चल ही गया होगा. 

 Prithviraj Chauhan ने तो अपना समाराज्य बढ़ाने के लिए कई राज्यों के राजकुमारी से शादी किया ताकि उन राज्यों के राजाओं को Prithviraj Chauhan की गुलामी कुबूल करनी पड़े,ये सामराज्य बढ़ाने का बहुत साधारण सा तरीका था, पर ये उनके विपरीत ही हआ, कई राज्यों से लड़ने के बाद जीत तो उनकी ही हुई पर ये जीत उन्हें बहुत महँगी पड़ी, उनके सभी नामी योद्धा मारे जाने लगे.

अगर क्षत्रिय जाती में बहपत्नी का चलन न होता तो Prithviraj Chauhan के कई योद्धा जीवित रहते और मुहम्मद गौरी कभी भी अपना सामराज्य भारत पर नहीं फैला पाता. Prithviraj Chauhan ने ग्यारह विवाह किये और कुछ विवाह को छोड़ दे तो ऐसा कोई विवाह नहीं है जिसमे दो चार हज़ार मनुष्यों की प्राणहुती न हुई हो. ये Prithviraj Chauhan के अध्यापतन का दूसरा कारण था. 

Prithviraj Chauhan के अध्यापतन का तीसरा कारण था की Prithviraj Chauhan जितने ही वीर थे वे उतने ही अन्दर से ह्रदय के कमजोर थे, दया भाव उनमे कूट कूट कर भरे हुए थे, मुहम्मद गौरी के मगरमच्छ के आंसू को समझ नहीं पाए और बार बार उन्हें माफ़ करते चले गए. मानता हूँ की शास्त्र में लिखा है की क्षत्रिये धरम के अनुसार झुके गर्दन पर तलवार नहीं उठाया जाता है, या फिर किसी निहत्थे पर वार नहीं किया जाता है ये गुण तो Prithviraj Chauhan को याद थे पर शास्त्र के ये बात उन्हें क्यों याद नहीं आये की यदि सांप को मारा जाए तो उसका सर अच्छी तरह से कुचल दिया जाता है उसे अधमरा नहीं छोड़ा जाता वरना वो वापस अवश्य ही काटता है.

अध्यापतन का चौथा कारण था की एक वैश्या के फेर में पड़कर आपने वीर सेनापति कैमाश को मार देना बिलकुल ही निराशापूर्ण था.उन्होंने बिना कारण ही चामुंडराय को कारगार में डलवा दिया. इसके अतिरिक्त Prithviraj Chauhan का ठीक तरीके से राज शाषन न करना और भी कितने सारे कारण थे जिनके कारण उन्हें अपने देश रक्षकों से हाथ धोना पड़ा था. यहाँ तक जो होना था वो तो हो ही गया,Prithviraj Chauhan के कितने ही वीर संयोगिता हरण में मारे जा चुके थे, पर उस समय भी भारत की भूमि आज की जैसे वीर शुन्य नहीं हुई थी, इतना होने के ब्बजूद Prithviraj Chauhan के पास और भी कितने ही वीर बाकि थे और उनके कारण भारत स्वतंत्रता की सांसे ले रहा था.

यदि Prithviraj Chauhan संयोगिता को लाने के बाद एकदम से उनके प्रेम जाल में न फँसकर राज्य के काम को अच्छी तरह से देखते और राज्य का शाषण किसी और को न दे खुद ही सँभालते और संयोगिता की पास महल में न विराजते तब उनकी हार कभी भी संभव न थी, एक तरह से Prithviraj Chauhan ने खुद ही अपनी पैर में कुल्हाड़ी मार लिया था, वरन Prithviraj Chauhan को हरा पाना गौरी के वश में कभी न था. और Prithviraj Chauhan ही क्यों सभी राजाओं में यही बात उस समय घुस गयी थी जिसके कारण भारत को परतंत्रता का मुंह देखना पड़ा. 

Prithviraj Chauhan का अंत हुआ और इसके साथ ही हिन्दू साम्राज्य का भी अंत हुआ. और समस्त पिथोरागढ़ शोक में डूब गया.सभी को मालूम हो गया की अब दिल्ली में शत्रु किसी भी वक़्त अआते होगे. Prithviraj Chauhan की मौत की खबर सुनते ही संयोगिता और अनके अन्य रानियों ने सती का राह अपनाया, इधर Prithviraj Chauhan के पुत्र रेणु सिंह ने मुसलमानों से लड़ता हुआ वीर गतो को प्राप्त किया, और समस्त भारत परतंत्रता की जंजीर में बांध कर रह गया. अन्य कई मुसलमानों की सेना द्वारा दिल्ली लूटी जाने लगी.नगर निवासी के कत्ल किये जाने लगे और कितने ही बेड़ियों में बाढ़ दिए गए.

दिल्ली नगरी को स्मशान घाट बना दिया गया. अनेक मुसलमान शाशकों के भारत आने का मार्ग खुल गया था क्योंकि अब उन्हें यहाँ रोकने वाला कोई न था.अजमेर,दिल्ली और कन्नोज को लूटने की बाद मुसलमानों ने बनारस को लूटा,और इस तरह भारत के कितने ही प्रदेश मुसलमानों के अधीन हो गया. इन घटनाओं को ध्यान से देखने पर मालूम होता है की एक अकेला Prithviraj Chauhan ही भारत पर मुसलमान सामराज्य स्थापित होने के प्रधान बाधक थे. उनकी ही वीरता,धीरता,युद्धनीति,के कारण इतने समय तक भारत में यवन का शासन स्थापीत नहीं हो पाता था. क्योंकि उनकी मृत्यु होते ही क्रमशः सारे राजा का अस्तित्व ख़त्म होने लगा.

अगर Prithviraj Chauhan ने बहुपत्नी या फिर केवल संयोगिता का हरण ही न किया होता तो शायद कभी भी मुसलमान हमारे भारत पर नहीं आ पाते, जयचंद से युद्ध के बाद ही उनके ताकत खत्म होने लगी थी.संयोगिता का जन्म ही भारत के भविष्य के लिए अंधकार मय था. मैं आशा करता हूँ की आप कभी भी अपना अपने घर या अपने देश को एक स्त्री लिए कभी बर्बाद नहीं होने देंगे.

Prithviraj Chauhan VIDEO

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Conclusion:

तो दोस्तों अगर आपको हमारी Prithviraj Chauhan History, Wife, Death, Story, Kahani, movie And Serial Hindi यह पोस्ट पसंद आई है तो इसको अपने दोस्तों के साथ FACEBOOK पर SHARE कीजिए और WHATSAPP पर भी SHARE कीजिए और आपको ऐसे ही POST और जानकारी चाहिए तो हमें कमेंट में आप लिख कर बता सकते हैं उसके ऊपर हम आपको अलग से एक पोस्ट लिखकर दे देंगे दोस्तों.

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