Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास

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Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास

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Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास परिचय

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास:  Maharana Pratap जन्मभूमि की स्वतंत्रता के संघर्ष के प्रतिक है. वे एक कुशल राजनीतिज्ञ, आदर्श संगठनकर्ता और देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को तत्पर रहने वाले महान सेनानी थे. 

अपनी संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए उन्होंने वन वन भटकना तो स्वीकार किया मगर मुग़ल सम्राट अकबर के सामने अधीनता स्वीकार नहीं की. 

 Maharana Pratap भारतीय इतिहास के ऐसे महानायक है, जिनकी अनन्य विशेषताओ पर भारतीय इतिहासकारों ही नहीं, पाश्चात्य लेखकों और कवियों को भी अपनी लेखनी चालायी है. Maharana Pratap स्वदेश पर अभिमान करने वाले, स्वतंत्रता के पुजारी, दृढ़ प्रतिज्ञ और एक वीर क्षत्रिये थे. 

सम्राट अकबर ने अपना समस्त बुद्धिबल, धनबल और बाहुबल लगा दिया था, मगर Maharana Pratap को झुका नहीं पाया था. Maharana Pratap का प्रण था की बाप्पा रावल का वंशज, अपने गुरु, भगवान, और अपने माता-पिता को छोड़ कर किसी के आगे शीश नहीं झुकाएगा. 

प्रताप अपनी सारी जिंदगी अपने दृढ़ संकल्प पर अटल रहे, वे अकबर को ‘बादशाह’ कह कर सम्बोधित कर दे ऐसा असंभव माना जाता था, उनका मनना था की “अकबर एक तुर्क है और हमेशा एक तुर्क ही रहेगा, मुग़ल पहले हमारे साथ मित्रता का हाथ बढ़ाते है फिर अपनी बुरी दृष्टी हमारे घर की स्त्रियों पर डालते है”, और ये हम सभी भी जानते है की उनका सोचना बिलकुल सही है. 

 Maharana Pratap ने अपनी जीवन में एक भविष्यवाणी की थी जो की बिलकुल ही सही हो गयी, वो ये था कि “ हमारा हिन्दू धर्म जैसा है वैसा ही रहेगा, हमारा भारतवर्ष देश जैसा है वैसा ही रहेगा, पर एक दिन ऐसा आएगा की हमारी इस पवित्र भूमि से मुगलों का नामोनिशान मिट जायेगा”.

स्वतंत्रता की रक्षा की लिए विषम परिस्थितियों में भी Maharana Pratap ने जो संघर्ष किया, उसकी राजकुलों में जन्मे लोगो के साथ तुलना और कल्पना भी नहीं की जा सकती है . मेवाड़ नरेश होते हुए भी  Maharana Pratap का अधिकांश जीवन वनों और पर्वतों में भटकते हुए व्यतीत हुआ, अपने अदम्य इच्छाशक्ति, अपूर्व शोर्य, और रण कौशल, से अंततः मेवाड़ को स्वाधीन करने में सफल हुए.

वीर शिरोमणि  Maharana Pratap बाल्य जीवन

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: सिसोदिया वंश के सूरज राणा Maharana Pratap का जन्म 9 मई,सन 1540 (विक्रमी संवत 1597, जयेष्ट सुदी 3, रविवार) को अपनी ननिहाल पाली में हुआ था.

उनके पिता राणा उदय सिंह एक महान योद्धा थे. महराणा उदय सिंह की जीवन रक्षा की कहानी पन्ना धाय से जुडी हुई है, उदय सिंह के पिता राणा रतन सिंह के मृत्यु के पश्चात उदय सिंह के बड़े भाई विक्रमादित्य ने राजगद्दी संभाली. 

विक्रमादित्य अभी थोड़े छोटे थे इसलिए उनकी देखरेख का जिम्मा बनवीर को दिया गया, लेकिन थोड़े ही दिन में बनवीर के मन में राजगद्दी हथियाने के इच्छा जागृत हो गयी. 

उसने कुछ सामंत को अपने में मिला लिया और जो सामंत उनके विरुद्ध गए उनकी हत्या कर दिया. उसके बाद उसने विक्रमादित्य को भी मार डाला, और फिर चल दिया मेवाड़ के एकलौते वरिश उदय सिंह की हत्या करने. 

उस समय उदय सिंह सो रहे थे और हाथ में नंगी तलवार लिए बनवीर उदय सिंह को मारने आ रहा था, अचानक से महल में हलचल पैदा हो गयी और ये समाचार पन्ना धाय तक भी पहुँच गयी, उस समय पन्ना धाय ने एक ऐसा बलिदान दिया जो की इतिहास में आज तक किसी ने न दिया होगा, उन्होंने उदय सिंह और अपने पुत्र में से उदय सिंह को चुना और अपने पुत्र को उदय सिंह के स्थान पर लिटा दिया, और उदय सिंह को फूलों की टोकरी में छिपा दिया, जब बनवीर ने पूछा की उदय सिंह कहाँ है, तो उसने अपने पुत्र को उदय सिंह बता दिया और बनवीर ने पन्ना धाय के सामने उसके पुत्र की हत्या कर दिया. 

पन्ना धाय ने उस फूलों की टोकरी के साथ कुम्भलगढ़ पहुँच गयी. कुम्भलगढ़ में आशा शाह देपुरा को कुंवर उदय सिंह को सौंपकर पन्ना धाय चित्तोड़ वापस चली आई, उस समय उदय सिंह की आयु केवल 15 वर्ष की थी. यहीं पर उदय सिंह ने शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने फिर जयवंताबाई से शादी की. Maharana Pratap सिंह इन दोनों के ही पुत्र थे.

प्रताप का जन्म ही युद्ध के दौरान हुआ था, एक तरफ उदय सिंह अपनी मातृभूमि को वापस पाने के लिए बनवीर से युद्ध कर रहे थे और इसी शुभ क्षण में भगवान एकलिंग का अवतार लिए Maharana Pratap सिंह धरती में पधारे. 

उनके जन्म के उत्सव में चार चाँद तब लग गए जब ये खबर आई की  Maharana Pratap उदय सिंह बलवीर को हरा वापस चित्तोड़ के किला पर अपना अध्यापत स्थापित कर चुके है, Maharana Pratap के जन्म की उत्सव चित्तोडगढ के किला में ही बड़े धूम धाम से मनाया गया. 

प्रताप के जन्म के तीन सौ साल पहले ही मुसलमान हमारी भारत माता पर अपना अधिकार जमा चुके थे पर जैसा की हम सब जानते है पूरा भारत कभी भी गुलाम नहीं रहा है उनमे से एक प्रदेश ऐसा भी था जो स्वतंत्रता की सांसे ले रहा था वो क्षेत्र था “राजपुताना”. 

राजपुताना भारत माता की एक ऐसा अंग था जहाँ के वीरों ने कभी भी आसानी से गुलामी का रास्ता नहीं चुना था, खासकर ये वीरता के पर्याय बाप्पा रावल के वंशज.

ये वंश अपने मातृभूमि के लिए अपनी जान लगा देने वालों में से थे, और ये जाती बहुत ही विचित्र युद्ध कौशल से निपूर्ण थी, जिसका सामना करने से बड़े से बड़े सेना भी डरती थी. 

इस समय भारत की राजनीती व्यस्था में बहुत ही उथल पुथल हो रही थी, Maharana Pratap के जन्म से पहले दिल्ली में मुहम्मद जल्लालुद्दीन अकबर के पिता हुमायूँ का राज था, जो की मुग़ल वंश से सम्बंधित था, उस समय एक और बड़ी ताकत हुमायूँ को बार बार चुनौती दे रहा था वो था अफगान का शेरशाह सूरी.

शेरशाह शुरी ने हुमायूँ को सबसे पहले 25 जून 1539 को चौसा के युद्ध में पराजित किया और इसके बाद 17 मई 1540 में बिलग्राम या कन्नोज के युद्ध में बहुत ही बुरी तरह से पराजित कर आगरा और दिल्ली में अपना कब्ज़ा कर लिया. 

अभी Maharana Pratap तीन साल के नहीं हुए थे की शेरशाह सूरी ने एक बहुत बड़ी सेना के साथ राजपूताने में आक्रमण कर दिया उसकी सेना ने कई इलाको को जीत लिया और कई घर और गाँव को तहस नहस कर दिया. 

उसके बाद शेरशाह सूरी ने चित्तोडगढ में आक्रमण किया उदय सिंह के पास उसकी सेना का आक्रमण का जवाब नहीं था उनके पास बहुत ही थोड़ी सेना थी इसलिए उदय सिंह ने युद्ध के बजाये कूटनीति का रास्ता चुना, उन्होंने शेरशाह सूरी के सामने अपने शस्त्र दाल दिया, उनके सारे सामंतों ने इसका विरोध किया पर उदय सिंह ने ये भरोसा दिलाया की वो समय आने पर अपना अधिकार वापस लेंगे.  

उन्होंने शेरशाह सूरी से संधि कर लिया जिसमे उन्हें आध मेवाड़ देना पड़ा, इसके कुछ दिन बाद ही शेरशाह शुरी की मृत्यु 22 मई 1945 को हो गयी, उस समय मेवाड़ में उदय सिंह और शेरशाह सूरी के सेनापति श्मशखान ही राज कर रहा था.

राणा उदय सिंह ने तीन विवाह क्रमशः जयवंताबाई, सज्जाबाई, भटियानी धीरबाई जी से किया था. शक्ति सिंह और सागर सिंह सज्जाबाई के पुत्र थे और जगमाल धीरबाई के पुत्र थे. 

प्रताप बचपन से ही बहुत ही बहादुर और अपनी वीरता दिखाकर लोगो को अचंभित कर जाते थे, वे जितने वीर थे उतने ही स्वाभाव से सरल और सहज थे. वे बहुत ही साहसी और निडर थे. बच्चों के साथ खेल खेल में ही दल बना लेते थे और ढाल तलवार के साथ युद्ध करने का अभ्यास करते थे. 

अपने लड़ाकू तेवर और अस्त्र-शस्त्र सांचालन में निपुणता के कारण वे अपने मित्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए थे. 

उनमे नेतृत्व के गुण इसी अवस्था में जागृत होने लगे थे. Maharana Pratap को गुरु आचार्य राग्वेंद्र का भरपूर साथ मिला उन्हें Maharana Pratap की ताकत और सूज बूझ को सही दिशा प्रदान किया. 

प्रताप भी अपने गुरु से बहुत सारी शिक्षा प्राप्त की. गुरु राग्वेंद्र ने शक्ति सिंह, सागर सिंह और जगमाल को भी शिक्षा दी.

एक बार गुरु ने उन चारों राजकुमारों को तालाब में से कमल का फूल लाने को कहा. गुरु की आज्ञा पाकर चारों राजकुमार तालाब में कूद गए और एक दुसरे के साथ पहले फूल लाने के लिए होड़ करने लगे, की अचानक बीच में ही जगमाल थक गए और डूबने लगे तब Maharana Pratap आगे बढ़कर जगमाल की मदद किये तबतक इधर शक्ति सिंह कमल लेकर गुरूजी के पास पहुँच गए और कहने लगे मैंने सबसे पहले कमल का फूल लेके आया हूँ, गुरु जी बोले Maharana Pratap तम्हारे आगे था पर वो अपने भाई को मदद करने के कारण पहले नहीं पहुँच सका, शक्ति सिंह का सारा हर्ष क्षण भर में ही गुम हो गया. 

अब गुरु जी ने कहा की अब मुझे देखना है की तुम में से सबसे अच्छा घुड़सवार कौन है ये घोड़े लो और उस टीले में जो सबसे पहले आएगा वो ही विजयी रहेगा. 

दौड़ शुरू होने से पहले ही जगमाल ने अपने हाथ खड़े कर लिए और कहा मैं नहीं जाऊंगा उस टीले तक मैं थक चूका हूँ, गुरु जी ने जगमाल के मुख में विलाशिता की भावना को परख लिया था इसलिए उन्होंने कहा की कोई बात नहीं जगमाल मेरे साथ ही रहेगा तुम लोग जाओ. 

प्रताप सबसे पहले उस टीले से लौट आये उसके बाद शक्ति सिंह और सागर सिंह सबसे आखिरी में आया. गुरु जी ने Maharana Pratap की बहुत तारीफ की, इस पर शक्ति सिंह जलभुन गया. 

शक्ति सिंह भी Maharana Pratap की तरह ही बहुत साहसी था पर Maharana Pratap से तुलना होने पर वो हर बार हार जाता था जो की उसे पसंद नहीं था. एक बार जंगल में गुरु जी चारों राजकुमार को कुछ शिक्षा दे रहे थे की तभी एक बाघ ने शक्ति सिंह को पीछे से झपटने के लिए आगे बढ़ा, शक्ति सिंह डर से हिल भी न पाया था, गुरुवर कुछ कर पाते की Maharana Pratap ने सामने रखा भाला बाघ के सीने में डाल दिया बाघ वही गिर पड़ा, तब शक्ति सिंह के जान में जान आई, शक्ति सिंह ने Maharana Pratap का धन्यवाद किया और गुरु जी ने भी Maharana Pratap की बहुत प्रसंशा की. इस तरह से Maharana Pratap की शिक्षा पूरी हुई.

राणा उदय सिंह जब भी Maharana Pratap को देखते थे वो हर्ष उल्लास से भर जाते थे, राणा Maharana Pratap को विश्वास था की उनके बाद मेवाड़ का भविष्य एक सुरक्षित हाथों में जाने वाला है. इसी सोच के साथ लगातार उदय सिंह गुप्त रूप से अपनी सेना को एक जुट करने में लग गए. 

लगभग 10 साल के लम्बे समय के बाद उदय सिंह ने अफगानों में आक्रमण करने का निर्णय लिया, वे अपने सभी राजकुमारों को किसी सुरक्षित स्थान में पहले पहुंचा देना चाहते थे पर Maharana Pratap जो की अभी केवल 13 साल के ही थे किसी तरह उनको युद्ध की खबर हो गयी, वो इस युद्ध से कैसे अनछुए रह सकते है इसलिए अपने पिता के आज्ञा के बगैर उस युद्ध में कूद गए, थोड़े ही समय में युद्ध शुरू हो गया, और Maharana Pratap इतनी कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा की चमक चारों ओर बिखेरने लगे थे.

इस युद्ध में कई राजपूत सिपाहियों ने Maharana Pratap का भरपूर साथ दिए, बहुत ही मुस्किल से किसी तरह इस युद्ध में राणा उदय सिंह विजयी रहे, जब उन्हें पता चला की Maharana Pratap भी इस युद्ध में सम्मिलित थे उनकी आँखे आशुओं से नम हो गयी और उन्होंने Maharana Pratap को गले लगा लिया. 

अब सम्पूर्ण मेवाड़ में उदय सिंह का राज था. इस तरह से Maharana Pratap सिंह की खायाति पूरे राजपूताने में फैलने लगी, मेवाड़ की प्रजा Maharana Pratap के स्वाभाव से अत्यंत प्रसन्न रहती. क्योंकि कभी कभी Maharana Pratap तो उनकी मदद करने में इतने खो जाते थे की वे भूल जाते थे की वो एक राजकुमार है. 

और इस तरह Maharana Pratap अपने वीरता की गाथा को बिखरते हुए बड़े होने लगे.

अकबर का चितौड़गढ़ में आक्रमण

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: जब Maharana Pratap 14 वर्ष के थे तब मुहम्मद जल्लालुद्दीन अकबर ने 13 वर्ष की उम्र में दिल्ली का सम्राट बना. उस समय वो बहुत छोटा था इसलिए बैरम खान की संरक्षण में वो दिल्ली की राजगद्दी संभाला. 

राजपूताने को जीतना शुरू से ही उसकी ख्वायिश थी. सम्राट बनते ही उसने आमेर के कछावा राजाओं से संधि कर ली और फिर शीघ्र ही  Maharana Pratap उदय सिंह के पास प्रस्ताव भेज दिया की वो मुग़ल-सत्ता की अधीनता को स्वीकार कर ले. 

 Maharana Pratap उदय सिंह ने इस संधि का जवाब बहुत ही कड़े शब्दों में दिया और जवाब में लिख दिया की हम कभी किसी विदेशी ताकत के आगे नहीं झुक सकते है.

इससे क्रोधित होकर अकबर ने 20 अक्टूबर सन 1567 एक बड़ी विशाल सेना लेकर बैरम खान के नेतृत्व में चितौड़ पर आ धमका. चितौड़ को मुग़ल सेना ने चारों ओर से घेर लिया गया इसके बावजूद मुग़ल सेना चितौड़ के अन्दर न घुस पायी, मैं आपको बता देना चाहूँगा की चितौड़ का किला सबसे बड़ा किला माना जाता है. 

6 महीने तक  Maharana Pratap उदय सिंह, Maharana Pratap और समस्त चितौड़गढ़ के सेना ने बड़े ही वीरता के साथ मुगलों को सामना किया. 

परन्तु राशन पानी बंद हो जाने के कारण उदय सिंह मुगलों का ज्यादा देर तक सामना न कर सके लगभग 6 महीने की भीषण संग्राम के बाद 23 फरवरी को उदय सिंह को समस्त परिवार के साथ चितौड़ छोड़ना पड़ा, उन्होंने पहाड़ियों से घिरे सुरम्य स्थल उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया और फिर वहीँ रहने लगे.

एक दिन  Maharana Pratap उदयसिंह अपने पुत्र Maharana Pratap के साथ उदयपुर की वादियों में टहलने निकले दोनों सफ़ेद घोड़े पर सवार थे.  Maharana Pratap उदय सिंह का शरीर ज्यादा स्वस्थ नहीं दिखाई दे रहा था, वो लम्बे समय से बीमार थे, चितौड़गढ़ में अकबर का कब्ज़ा, राजपूतानियों का जौहर, और 30,000 मासूम नागरिकों की निर्मम हत्या ने उदय सिंह को अन्दर से झकझोर दिया था,जिसका इतिहास उदय सिंह के चेहरे में साफ़ साफ़ देखा जा सकता था. 

प्रताप युवा थे, प्रदीप्त सूर्य की तरह उनका चेहरा दैदीप्यमान था. घोड़े पर सवार कुंवर Maharana Pratap साक्षात् देव लग रहे थे. घने जंगल में उदय सिंह ने अपना घोडा रोका और उतर गए, Maharana Pratap भी घोड़े से उतर गए. उदयसिंह ने सूर्य की किरणों को देखते हुए कहा की हम राजपूतों का जीवन मातृभूमि की रक्षा करने के लिए होता है, हम इसकी रक्षा अपने प्राण का न्योछावर कर के भी करते है, तुम जानते हो की मुग़ल सम्राट अकबर की नजर पुरे मेवाड़ में है. 

इसपर Maharana Pratap ने कहा की आप चिंता न करे पिताजी आपके पुत्र Maharana Pratap की भुजा में इतनी शक्ति है की वो हर उस शत्रु का सामना कर सकता है जो मेवाड़ पर अपनी बुरी दृष्टी डालेगा. 

इसपर उदयसिंह ने कहा की मुझे मालूम है बेटे, पर आजकल हम राजपूतों का दिन कुछ अच्छा नहीं रहा है, राजपूताने के कई राज्य अकबर से जा मिले है, और तुम्हारा बूढ़ा पिता भी अपने कई नागरिकों को नहीं बचा पाया, Maharana Pratap ने कहा की आप धैर्य रखिये पिताजी मैं प्रण करता हूँ की जब तक मैं शत्रु से उस महाविनाश का बदला नहीं ले लूँगा, तब तक चैन से नहीं बैठूँगा. 

इसे देख कर उदय सिंह के आँखों में आंसू आ गए, उन्होंने कहा की पर “प्रताप तुम्हारे छोटे भाई जगमाल और शक्ति सिंह दोनों ही तुमसे आयु के साथ साथ बुद्धि में भी छोटे है मुझे दर है की कहीं मेरी मृत्यु के बाद शिशोदिया वंश…….” Maharana Pratap ने कहा की नहीं नहीं पिताजी मैं अपने विवेक के साथ उन दोनों को अपने साथ बांधने का प्रयत्न करूँगा. 

उदय सिंह की हालत अब और भी खराब हो गयी थी वो अपने घोड़े पर बैठे और वापस अपने महल की ओर वापस चले गए.

महल पहुँचने पर छोटी रानी भटियानी ने उदय सिंह का स्वागत किया और उन्हें अपने कक्ष में ले गयीं. और वहां पर उन्होंने अपने छोटे बेटे जगमाल को राजा बनानें की इच्छा व्यक्त कर दी. 

उदय सिंह को पहले से ही यह एहसास था की छोटी रानी जगमाल को राजा बनाना चाहती है, परन्तु आज छोटी रानी ने उदय सिंह को इस प्रकार से घेर लिया था की उससे उनका चैन और सुख जाता रहा, वे परेशान हो गए और अंततः जगमाल को उतराधिकारी घोषित करना पड़ा. 

उसके उतराधिकारी बनने के कुछ दिन बाद ही  Maharana Pratap उदय सिंह स्वर्ग सिधार गए. जिसने भी यह सुना की जगमाल मेवाड़ का उतराधिकारी है वह उदय सिंह की आलोचना करने लगा. सारे प्रजा में निराशा की लहर दौड़ गयी. 

परन्तु Maharana Pratap ने इसका जरा भी विरोध नहीं किया उन्होंने अपने पिता के फैसले का सम्मान किया और जगमाल को मेवाड़ का नया राणा बनने में ख़ुशी जाहिर किया.

जगमाल का उत्ताराधिकारी घोषित करना

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: मेवाड़ की सारी प्रजा और सभी राजपूत युवक और सामंत जिनकी भुजा राणा उदय सिंह में हुए आक्रमण का बदला लेने के लिए मचल रही थी उनको Maharana Pratap का राणा न बन पाने की फैसला बिलकुल भी अच्छी नहीं लग रही थी. 

पर वो सभी महल की राजनीती के विरुद्ध नहीं जा पाए. Maharana Pratap के मन में अपने पिता के प्रति अपार श्रद्धा और आदर था, और साथ ही उनके मन में अपने पुरे परिवार के प्रति सदभाव था इसलिए जगमाल का उन्होंने जरा भी विरोध न किया, बल्कि उन्होंने अपने सारे सामंत को अच्छी तरह से समझा बुझा कर जगमाल के साथ कर दिया. 

रानी भटियानी Maharana Pratap की शोर्य और सामंतों के बीच उनके प्रभावों से भली भांति परिचित थी, उसे सर था की Maharana Pratap कहीं जगमाल से राज्गद्दी न छीन ले, इसलिए रानी भटियानी ने जगमाल को सावधान कर दिया था की वो Maharana Pratap से जरा संभल कर रहे.

जगमाल किसी भी कीमत में मेवाड़ की गद्दी संभालने योग्य न था, वो भोग विलास में सदैव डूबा रहता था, जगमाल Maharana Pratap की मदद से अपने सभी कमजोरियों को दूर कर सकता था पर जगमाल Maharana Pratap को अपने पास तक भटकने नहीं देता, हर बात में Maharana Pratap को निचा दिखाना और अपने राणा होने का गलत फायदा उठाना अब तो जगमाल के लिए ये आम बात हो गयी थी. वो खुद अपने देवता सामान बड़े भाई Maharana Pratap को शक की नजरों से देखने लगा था. 

जगमाल की राजनितिक सूझ-बुझ कमजोर थी,  राज काज को संभालने एवं व्यक्ति को परखने वाली पैनी नजर उसमे बिलकुल भी न थी, वो अब केवल अपने आप को बहुत महत्व देने लगा था. अपने सभी विशेष सामंतों की अनसुनी करना और केवल अपने फैसले में ही अटल रहना उसकी खूबी बनती चली गयी. 

कई पुराने सामंत उससे असंतुष्ट रहने लगे.  Maharana Pratap अपने स्तर से राज्य की स्थिति को संभालने में प्रयासरत थे. 

पर जब उन्होंने देखा की राज्य की भविष्य अब अंधकारमय हो चूका है तो उन्होंने एक बड़े भाई के अधिकार से जगमाल को समझाने जा पहुंचे. 

जगमाल ने Maharana Pratap को देखकर उपरी तौर से पूरा आदर दिखाया. Maharana Pratap ने जगमाल को समझाया की राज्य का बोझ अकेले नहीं उठाया जा सकता इसके लिए उसे सरदारों के राय की आवश्यकता पड़ती है इसलिए तुम्हे पुराने सरदारों के साथ विश्वास को बनाये रखना चाहिए और उनका पूरा पूरा समर्थन और सम्मान देना चाहिए, इतना कहकर Maharana Pratap चले गए. 

इस बारे में जगमाल ने अपने कुछ चापलूस सामंतों के साथ विचार-विमर्श किया, उन्हें लगा की अगर जगमाल ऐसा करेगा तो उनकी सत्ता खतरे में पद जाएगी, इसलिए उन्होंने जगमाल को अपने ही तरीकों से समझाने लगे, की अगर राणा आप है तो आपकी ही आदेश को सबको माननी पड़ेगी, Maharana Pratap को इस मामले में हस्तक्षेप न करने दे अन्यथा आपका राज वो आपसे छीन लेगा.  

अंत में निश्चय यह हुआ की पुराने सरदारों का असंतोस स्वाभाविक नहीं है उन्हें Maharana Pratap ने अवश्य उकसाया होगा, और उन्हें महत्व देने के पिछे Maharana Pratap की ही कोई चाल होगी. जगमाल ने अपने चापलूस सामंतों से कहा की राजनीती कहती है की शत्रु सर उठाये उससे पहले ही ……..उसका सर कुचल देना चाहिए. 

माँ ठीक कहती है Maharana Pratap मेरा भाई नहीं राजनितिक शत्रु है, आखिर मैंने उसका अधिकार छिना है वो चैन से कैसे बैठ सकता है. इतना कहकर जगमाल ने अपने दूत को भिजवा कर तुरंत ही Maharana Pratap को बुला भेजा. 

उसने Maharana Pratap से कहा की मेवाड़ का राणा मैं हूँ आप नहीं, आपको मेरे राज काज में कोई आपत्ति न ही हो तो अच्छा है, इतनी कर्कश शब्दों को सुनकर Maharana Pratap चिल्लाये “जगमाल” और उनका हाथ तलवार तक चला गया पर जल्द ही उन्होंने अपने आप को संभाल लिया. 

जगमाल ने कहा “चीखो मत Maharana Pratap सिंह जो मैं कहता हूँ उसे ध्यान से सुनो-मेवाड़ का राणा होने के हैसियत से मैं ये आदेश देता हूँ की तुम अभी इसी वक़्त मेवाड़ की सीमा से बाहर चले जाओ. 

अर्थात “मातृभूमि से निर्वासन” हाँ तुमने सही सुना मातृभूमि से निर्वासन, Maharana Pratap की भुजाये भड़क उठी, उनके दोनों नेत्र लाल हो गयी, एकाएक उनकी दाहिने हाथ उनके कमर में बंधी तलवार तक पहुंची, उनके तलवार में हल्का सा खिचाव भी पड़ा पर तलवार निकलते निकलते रह गयी, किसी तरह Maharana Pratap ने अपने अपमान की घूंट को पीकर रह गए. 

प्रताप एक सच्चे राजपूत थे, अगर उन्हें अपमान और मौत में से चुनाव करना होता तो वो मौत ही चुनाव करते पर आज कुछ स्थिति ही दूसरी थी, क्या वो अपने भाई से बदला लेते ये उनके संस्कार के अनुकूल नहीं था इसलिए Maharana Pratap वहां से चुपचाप चले गए. Maharana Pratap बहुत ही विवेकी और आशावादी थे इसलिए उन्होंने जगमाल का तनिक भी विरोध न किया.

 Maharana Pratap का मातृभूमि से निर्वासन की खबर सारे मेवाड़ में आग की तरह फ़ैल गयी. सारी प्रजा जगमाल के विरुद्ध हो गयी. Maharana Pratap को दण्डित करने का अर्थ था की मेवाड़ की जनता को दण्डित करना. 

प्रताप की ख्यति उस समय तक भारतवर्ष के कोने कोने तक पहुँच चुकी थी, एक मात्र राजपूत जिसने न केवल अकबर के सामने घुटने न टेके बल्कि अकबर की विशाल सेना की भी कई दिनों तक दांत खट्टे कर के रख दिए और भी कई सारी खूबियों के कारण Maharana Pratap बहुत प्रचलित हो चुके थे इसलिए उनमे  न केवल राजपूत जाती और मेवाड़ की ही नजरें टिकी थी वरन सम्पूर्ण भारतवर्ष के अकबर अधीन राजाओं की नजर भी थी और इस तरह से उनका घोर अपमान कर निर्वासन कर देना किसी तरह से क्षमा योग्य न था. 

अकबर के सेना चित्तोडगढ में अभी भी मुग़ल ध्वज लहराए हुए है और इस दुखद समय में एक और झटका मेवाड़ के जनता कभी में इसे स्वीकार नहीं करेगी. सारे मेवाड़ के लोग हड़ताल करने लगे और जगमाल को बुरा भला कहने लगे. कई सामंत भी जगमाल के विरुद्ध हो गए.

प्रताप का  Maharana Pratap के रूप में संकल्प

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: प्रताप के निर्वासन की खबर सुन कर पुरे मेवाड़ नगरी की प्रजा में आक्रोश से भर गयी, कई लोग Maharana Pratap की गुणगान करते नही थक रहे थे। कुछ गाँव वाले अपने में बात कर रहे थे की Maharana Pratap ही मेवाड़ के असली  Maharana Pratap है, उदय सिंह छोटी रानी भटियानी से ज्यादा प्यार करते थे इसलिए जगमाल को राजा बना दिया जो की दिन भर नशे में धुत रहता है। 

इसपर दुसरे गाँव वाले ने कहा की सही कहा उस दिन 6 मुग़ल सैनिक हमारी गाँव के एक लड़की के साथ दुष्कर्म कर रहे थे तभी Maharana Pratap वहां पहुँच कर अकेले ही उन छः मुग़ल सैनिकों से भीड़ गए और उसका संहार कर उस लड़की की इज्जत को बचाया। 

इतना सुनते ही दुसरे व्यक्ति ने कहा की हाँ हाँ सही कह रहे हो एक दिन मेरी बैल गाडी खेत में कीचड़ में फंस गयी थी कितनी कोशिश के बाद भी वह नहीं निकला, Maharana Pratap ने जैसे ही मुझे देखा वो एक राजकुमार होते हुए भी मेरी मदद के लिए कीचड़ में घुस आये, एक महराणा होने के सारे गुण Maharana Pratap में मौजूद है, Maharana Pratap ही हमारे  Maharana Pratap है और हम उनका निर्वासन कैसे देख सकते है, राजपूताने के कई राजा ने तो अकबर के सामने घुटने टेक दिये है एक Maharana Pratap ही उसको चुनौती दे सकते है, वे हमारे स्वाधीनता के अंतिम आशा है और किसी भी हालत में उनका निर्वासन नहीं होने देंगे।

उदयपुर के कई सरदार जगमाल के इस फैसले से पहले से ही बौखलाए हुए थे, उनकी सलाह के बिन जगमाल ने इतनी बड़ी फैसला कैसे कर लिया था। 

प्रताप के मामा झालावाड़ नरेश इस फैसले से बहुत ज्यादा क्षुब्ध थे, मेवाड़ के कई सामंतों ने अपनी आक्रोश को उनके सामने व्यक्त किया। झालावाड के नरेश ने अपनी नेतृत्व सामंतों को प्रदान किया और यह निर्णय लिया गया की जगमाल को गद्दी से हटाया जायेगा और Maharana Pratap को मेवाड़ का  Maharana Pratap बनाया जायेगा।  

इतना निर्णय लेकर वो महल की ओर जाने लगे, रास्ते में उन्हें मेवाड़ के गाँव के कई लोग मिले। सामंतों को आता देख सभी लोग ने चुप्पी साध ली, उसमे से एक व्यक्ति ने आगे बढ़ कर कहा की ये हमारे साथ क्या हो रहा है सरदार, हमारे साथ इतना बड़ा अन्याय क्यो हो रहा है ? जहाँ Maharana Pratap को मेवाड़ का राणा होना था वहां एक विलासी बैठा मौज कर रहा है, और हमारे असली  Maharana Pratap को निर्वासन? 

सरदार उनका दुःख समझ रहे थे, इस पर चुण्डावत कृष्ण जो की सामंतों के सरदार थे आगे बढ़ के कहा की हम खुद ही मेवाड़ की राजनीती से विस्मित है और आप सब हमारा विश्वास करे की मेवाड़ के असली उत्तार्धिकारी को ही मेवाड़ का  Maharana Pratap बनाया जायेगा ये हम सब का वचन है। 

इतना बात सामंतों और लोगो के बीच हो ही रहा था की साधारण वेशभूषा में Maharana Pratap अपने घोड़े में कुछ सामन के साथ नजर आये, सभी आश्चर्य से Maharana Pratap को देखते रह गए, सभी को समझते ये देर न लगी की Maharana Pratap निर्वासन के फैसले के अनुसार मेवाड़ को छोड़ कर जा रहे है। 

सभी लोगों ने Maharana Pratap का रास्ता रोक लिया और फिर चुण्डावत कृष्ण जी ने आगे बढ़कर कहा की “रुक जाइये Maharana Pratap आप मेवाड़ की सीमा को नहीं लांघेगे, मेवाड़ की समस्त जनता आपका प्रतीक्षा कर रहे है”। 

प्रताप ने अपने घोड़े की लगाम को खींचते हुए कहा की लेकिन चुण्डावत जी जगमाल मेवाड़ का राजा है और उसने मुझे निर्वासन का आदेश दिया है, इसपर चुण्डावत गरजने लगे और कहने लगे की “जगमाल निरा मुर्ख है, उसे राज काज की समझ कहाँ है और ये बात आपको और हम सब को भली भांति अच्छी तरह से पता है। 

आप ही मेवाड़ के राणा है इसलिए आपको ही मेवाड़ के राजगद्दी में बैठना होगा। उदयपुर के साथ साथ सारे मेवाड़ की जनता और सामंतों की ओर से सन्देश लेकर मैं आपके पास आया हूँ। 

क्या आपको अपने पिता से किया वायदा याद नहीं चित्तोडगढ अभी भी मुगलों के हाथ में है और आपको ही उसे मुगलों से आजाद करवाना है। इसपर Maharana Pratap ने बड़े ही विनम्रता से कहा को जगमाल मेरा छोटा भाई है उसके विरुद्ध मैं तलवार नहीं उठाऊंगा, मुझे अपने भाई के साथ युद्ध कर राज काज भोगने की कोई इच्छा नहीं है। 

चुण्डावत निकट आते हुए कहा की आपको वापस चलना ही होगा अन्यथा मेवाड़ आपके बिना अनाथ हो जायेगा, मेवाड़ की जनता ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। उनका धैर्य का बाण टूट जायेगा। 

प्रताप ने कहा की क्या एक एक भाई को भाई के विरुद्ध विद्रोह करना शोभा देगा, विद्रोह तब होगा जब आप नहीं चलोगे, मेवाड़ की जनता  अपना संतुलन खो बैठेगी और विद्रोही सरदार अपने म्यान से तलवार निकाल आएगी, और पूरा का पूरा मेवाड़ गृह युद्ध की चपेट में आ जायेगा।  

इस तरह काफी देर तक बहस करने के बाद Maharana Pratap को एहसास हो गया की चुण्डावत सही कह रहे है, मेवाड़ को उनकी आवश्यकता है और उन्हें मेवाड़ की उन्हें। वे अपनी जन्मभूमि, मातृभूमि से दूर कैसे जा सकते थे,उन्हें दूर जाना भी नहीं चाहिए, राज्य का अधिकार उन्हें सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि उन्हें स्वाधीनता की रक्षा करने के लिए उन्हें करना ही पड़ेगा, यह एक चुनौती है और इससे भागना अब मात्र एक पलायन होगा।  

प्रताप और सारे सामंतों ने अपना घोडा उदयपुर की ओर मोड़ लिया। इधर जगमाल Maharana Pratap के निर्वासन से निश्चिन्त हो गया था की उसका एकमात्र कांटा को उसने निकाल फेंका है, वह अब और ज्यादा विलाशभोगी हो गया था, उसके चापलूस सामंत अब राजकोष के धन में सेंध लगाने लगे थे। अगली ही सुबह जगमाल ने अपने सामने चुण्डावत कृष्ण के साथ Maharana Pratap को देखा तो उसे अपने आँखों में विश्वास न हुआ, रात भर पि हुई मदिरा की नशा एक पल में ही ओझल हो गयी।

जगमाल सिंहासन में बैठा था सभी चापलूस सरदार अपनी अपनी ओट लिए हुए था। इतने में चुण्डावत ने अपनी गर्जना भरे स्वर में कहा की “जगमाल छोड़ दो ये सिंहासन” जगमाल ने कहा –“चुण्डावत सरदार आप होश में तो है”

“हाँ कुमार” अब हम सब होश में आ गए है। उस दिन हम सब वास्तव में होश में नहीं थे जबब  Maharana Pratap उदय सिंह ने तुम्हे राणा बनाया था। तुम इसके तनिक भी योग्य नहीं हो। हमने तुम्हे राणा के रूप में अवश्य ही स्वीकार किया है पर तुम इसके जरा भी योग्य नहीं हो तुमने इस सिंहासन का अपमान किया है। 

जगमाल क्रोधित हो गया और अपने सैनिकों को आदेश दिया की पकड़ लिया जाए इस चुण्डावत सरदार को। सभी सैनिकों के साथ साथ सभी सरदारों ने भी अपने आँखों को झुका लिया, उनके हाथ तलवार की मुठ में अवश्य थे पर चुण्डावत के विरुद्ध जाना उनके वश में न था, किसी ने भी उस समय अपनी तलवार अपने म्यान से निकालने की चेष्टा तक न की, जगमाल ने सभी सामंतों के तरफ नजर दौड़ाई सभी शांत थे। 

पुरे दरबार में सन्नाटा छा गया था। जगमाल झट से अपनी तलवार निकाला और Maharana Pratap की ओर  देखते हुए बोला अपनी तलवार निकालो Maharana Pratap अभी फैसला हो जायेगा। Maharana Pratap का हाथ झट से तलवार पर गया पर छू कर वापस आ गया, वो चुण्डावत को देखने लगे, जैसे की वो कहना चाहते हो की उन्हें सिंहासन तो चाहिए लेकिन इस तरह नहीं। 

चुण्डावत समझ गए थे की Maharana Pratap क्या कहना चाहते है इसलिए उन्होंने झट से अपनी तलवार निकलते हुए कहा की सभी लोग अपनी तलवार निकाल कर इसे बता दो की हम सब Maharana Pratap है, चुन्दावत की आदेश सुनते ही सभी ने अपने तलवार को म्यान से बाहर निकाल लिया और जगमाल को घेर लिया। इतने देखते ही जगमाल का सारा नशा पल भर में उड़ गया। 

सभी सरदारों ने एक स्वर में चिल्लाने लगे की हम सब Maharana Pratap के साथ है।  इसे देख कर जगमाल चुण्डावत सरदार कृष्ण के प्रति प्रतिशोध की भावना से धधक उठा वो नंगी तलवार लिए चुण्डावत की ओर लपके और उनमे वार किया, चुण्डावत सरदार पहले से तैयार खड़े थे उन्होंने एक वार में ही जगमाल के तलवार की दो टुकड़े कर डाले। 

इतना देख कर दो सैनिकों ने जगमाल को पकड़ लिया। उसी समय Maharana Pratap को पुरे विधि अनुसार Maharana Pratap को राणा घोषित किया गया।  चुण्डावत ने स्वयं अपने हाथों से उनके मस्तक में टीका चढ़ाया और राजश्री छत्र पहनाया। और उनका अभिनन्दन करते हुए कहा की अब आप ही हमारे आन, बान और शान हो। मेवाड़ ही नहीं पूरा भारतवर्ष आपके शोर्य की वीर गाथा कहे। अपने बाहुबल से एक नया इतिहास लिखो, ऐसी हमारी कमाना है।

प्रताप बहुत गंभीर थे, गंभीर चेहरे में हलकी सी मुस्स्कान को बड़ी मुस्किल से बाहर आने दे रहे थे। फिर कुछ शब्द उभर कर आये, मेवाड़ के  Maharana Pratap की जय, हमारे Maharana Pratap की जय। 

सारे दरबार में  Maharana Pratap की जय जयकार होने लगी। यह जयजयकार इतनी ऊँची थी की सारा महल इस ध्वनि से गूँज उठा था, सभी सामंतों में ख़ुशी की लहर से छाई हुई थी, जयजयकार की आवाज सुनकर जगमाल सिहर उठा था। 

मेवाड़ की सेना को और जनता को जब ये समाचार मिला की Maharana Pratap अब महराणा बन चुके है तब उनमे ख़ुशी का ठिकाना न रहा, यूँ लगा मानो अनाथ बच्चे को उसका खोया हुआ माता-पिता मिल गए हो। सारी मेवाड़ की धरती  Maharana Pratap की जय, मेवाड़नाथ की जय से कांप उठी। तभी एक सैनिक ने सलीके से सजाई हुई बप्पा रावल की तलवार को लिए दरबार में उपस्थित हुआ। चुण्डावत ने उस तलवार को उठाई और Maharana Pratap के हनथो में दे दी। 

सारा मेवाड़ में मानो आज कोई उत्सव मनाया जा रहा हो ऐसा प्रतीत होने लगा था।  इस तरह से चुण्डावत सरदार ने तलवार देने की रस्म पूरी की। Maharana Pratap को तलवार देने के बाद चुण्डावत सरदार ने कहा की –“हे क्षत्रिये कुल दिवाकर ये हमरे पूर्वज बाप्पा रावल की तलवार है जिसे हम सदियों से चितोड़ की देवी मानते है आज वही चितौड़ मुगलों के कब्जे में है। 

मुगलों ने जब चितौड़ में कब्ज़ा किया था तब वहां के हर एक मंदिर और प्रतिमाओं की टुकड़े टुकड़े कर दिए, वहां के पंडितों और विद्वानों को अपमानित किया, राजपूतों पर मुगलों की अत्याचार की गवाह है ये तलवार, तब से समस्त मेवाड़ मुगलों से पप्रतिशोध के ज्वाला में जल रहा है, चितौड़ की पराजय से मेवाड का मस्तक झुक गया है, मैं ये तलवार इसी आशा के साथ सौंपा हूँ की आप चितौड़ के अपमान का बदला लेंगे और फिर से चितौड़ को मेवाड़ का भाग बनायेगे। 

ये आपके मस्तक में चढ़ा मुकुट आपके शोभा और वैभव नहीं है अपितु आपके लिए एक चुनौती है, की आप हमारा खोया हुआ स्वाभिमान और स्वाधीनता वापस लायेंगे। प्रजा जनों की रक्षा और विकास की चुनौती भी आप ही की जिम्मेदारी होगी। इसतरह तालियों की गडगड़ाहट के बिच चुण्डावत सरदार कृष्ण का भाषण समाप्त हुआ।

फिर  Maharana Pratap उठे उन्होंने तालियों के बीच सबका अभिवादन किया और फिर अपना तलवार को खींचते हुए कहा की मैं राणा Maharana Pratap बप्पा रावल की इस पूजन्य तलवार की सौगंध खा कर कहता हूँ की इस तलवार को सौंपकर चुण्डावत जी नें जो दायित्व मुझे सौंपा है उसे मैं अवश्य पूरा करूँगा। 

अपने स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दूंगा। मैं कभी किसी शत्रू के सामने अपना मस्तक नहीं झुकाऊँगा।  अपने शत्रु से चितौड़गढ़ को वापस लूँगा और चितौड़ पतन के समय हम पर हुए अत्याचारों का बदला लेना मेरा परम ध्येय रहेगा। 

इसके बाद Maharana Pratap मौन हो गए और फिर इसके बाद Maharana Pratap ने वो संकल्प लिया जो की Maharana Pratap के जीवन का मुख्य भाग था  और जिसके लिए वो हमेशा हमेशा के लिए प्रचलित रहेंगे उन्होंने प्रण लिया की:- ”माँ भवानी और भगवान् एकलिंग (शंकर) की सौगंध खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ , कि जब तक मेवाड़ का चप्पा-चप्पा भूमि को इन विदेशियों से स्वतंत्र नहीं करा लूँगा, चैन से नहीं बैठूँगा। 

जब तक मेवाड़ कि पुण्यभूमि पर एक भी स्वतंत्रता का शत्रु रहेगा, तब तक झोपडी में रहूँगा, जमीं पर सोऊंगा, पत्तलों में रुखा-सुखा खाना खाऊंगा, किसी भी प्रकार का राजसी सुख नहीं भोगूँगा, सोने-चांदी के बर्तन और आरामदायक बिस्तर की तरफ कभी आँख उठाकर भी नहीं देखूंगा ! बोलिए, क्या आप सब लोग मेरे साथ कष्ट और संघर्ष का जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार है ?”

“हम सब अपने  Maharana Pratap के एक इशारे पर अपना तन-मन, सब कुछ न्योछावर कर देंगे !” चारों तरफ से सुनाई दिया।“द्रढ़ इरादे वाले लोगों और राष्ट्रों को कोई बड़ी से बड़ी शक्ति भी पराधीन नहीं रख सकती ।” 

राजगुरु ने कहा — “इस पवित्र ललकार को सुनने के लिए मेरे कान जाने कब से व्याकुल हो रहे थे, प्रताप!””शत्रुओं द्वारा मात्रभूमि के किये गए अपमान का बदला गिन-गिनकर तलवार की नोक से लिए जायेगा । 

चप्पा चप्पा भूमि की रक्षा के लिए यदि खून की नदियाँ भी बहानी पड़ी, तो मेरे मुख से कभी उफ़ तक न निकलेगा । आप लोगों ने मुझे जो स्नेह और विश्वास प्रदान किया है, Maharana Pratap दम में दम रहते उस पर रत्ती-भर भी आंच न आने देगा ! जय स्वदेश! जय मात्रभूमि ! जय मेवाड़ ! ”

उसके बाद सभी उपस्थित सरदारों, सामंतों और दरबारियों ने मात्रभूमि की स्वतंत्रता और रक्षा के प्रति निष्ठावान रहने की शपथ ली । अपने नए  Maharana Pratap का अभिवादन किया ।

प्रताप को राणा बनते देख पूरा राजपुताना दो खेमों में बंट गया था, एक ओर वो थे जिन्होंने अपना स्वाभिमान अकबर को बेच दिया था और दुसरे वो थे जिनके पास स्वाभिमान तो था पर सागर जैसे सेना और ताकतवर मुग़ल सामराज्य से लोहा लेने की ताकत न थी इसलिए वैसे राजाओं ने Maharana Pratap के राणा बनने में ख़ुशी जाहिर की ।

शक्तिसिंह प्रकरण

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: प्रताप के  Maharana Pratap बनते ही कई राजपूत वीरों का खून उबलने लगा था और वो आकर  Maharana Pratap से मिलने लगे थे. वो सभी शत्रु से दो दो हाथ करने के लिए मचलने लगे थे जिसने उन्हें परतंत्रता ककी जंजीर में बंधा था, परन्तु उस समय उनका शत्रु दिल्ली का बादशाह जल्लालुद्दीन अकबर था जिसके पास सागर सा विशाल सेना थी और जिसने चितौडगढ़ में लगातार 6 महीने तक राजपूतों से युद्ध कर चितौडगढ़ जीता था. 

कई राजपूत वीर अपने भाला, तलवार और तीर कमान लेकर जंगल की ओर युद्ध का अभ्यास करने चल पड़े. वो अपने हथियार को धार और युद्ध अभ्यास करने को उतावले थे, उन्होंने जंगल को अपना युद्धाभ्यास का क्षेत्र बना लिया था. इन्ही दिनों राणा Maharana Pratap भी युद्धाभ्यास के लिए जंगल जाया करते थे.

एक दिन वो अपने छोटे भाई शक्ति सिंह के साथ वराहों का शिकार करने के लिए जंगल गए,  जैसे ही उन्हें वराह दिखा दोनों भाइयों ने उस वराह में एक साथ अपना भाला फेंक दिया, परन्तु एक भाला वराह को लगा और वराह वहीँ मर गया. दोनों भाई वराह का पीछा करते हुए वहां पहुंचे. 

वराह को मृत देख शक्ति सिंह ने कहा की देखा भैया मेरा निशाना कितना अचूक है मेरे एक वार से यह वराह धराशयी हो गया , राणा Maharana Pratap को यह बात अच्छी नहीं लगी , उन्हें अच्छी तरह से ज्ञात था की यह भाला उनका है, वे बोले नहीं शक्ति ये तुम्हारा भाला नहीं ये मेरा भाला है. 

इस पर शक्ति सिंह बौखला गया, और फिर कहा “आपका कहने का तो यही अर्थ हुआ न की मैं झूठ बोल रहा हूँ, मैं आपको झूठा नजर आ रहा हूँ, मैं किसी भी तरह से श्रेष्टता में आपसे कम न हूँ, मैं एक राजपूत हूँ और एक राजपूत कभी भी झूठ सहन नहीं कर सकता है. आप मेवाड़ के राजा अवश्य होंगे परन्तु मैं झूठ नहीं सहन कर सकता हूँ. 

इस पर राणा Maharana Pratap ने कहा की “मेरा ये अर्थ नहीं था शक्ति, मैं तो बस तुम्हे सत्य का बोध करा रहा था,” और कई तरह से समझाने की कोशीश करते हुए मुस्कुराने की कोशिश किये. 

शक्ति सिंह ने कहा की “सत्य असत्य का बोध आप न कराये मुझे मुझे अच्छी तरह से पता है सत्य क्या है, ये शिकार मेरा है और मैं इसे लेकर रहूँगा, मैं जगमाल नहीं हूँ जो आसानी से अपना हक़ छोड़ दूँ” इतना कहकर शक्ति सिंह ने अपने अनुचरों से कहा की आनुचारों उठा इस शिकार को, इसपर राणा Maharana Pratap गरजे शक्ति सिंह तुम अपनी हद पार कर रहे हो,  तुमने मेरा ही नहीं मेवाड़ के Maharana Pratap का भी अपमान किया है, नादे भाई के रूप में मैं तुम्हे क्षमा कर भी दूं, पर मेवाड़ के Maharana Pratap का अपमान नहीं सहा जायेगा. 

शक्ति सिंह ने कहा की मैं एक राजपूत हूँ, और आपको मेरा ताकत का अंदाजा नहीं है इतना कहकर उसने एक भाला उठाया और पूरी शक्ति से एक शिला में फ़ेंक दिया, भाला शिला से टकराते ही क्षण भर में चूर चूर हो गया,और फिर कहा  तो फिर ठीक है, एक राजपूत योद्धा के भांति निकालिए अपना तलवार और सामना कीजिये इस राजपूत का, राणा Maharana Pratap ने फिर समझाने की कोशिश की कि लगता है तुम अपने ताकत की घमंड में अपनी मर्यादा भूल गया हो, शक्ति सिंह अपने आप को सम्भालों. 

शक्ति सिंह कायर नहीं है, और आप अपनी तलवार निकालो और सामना करो जो जीवित बचेगा वही विजयी होगा,  सारे अनुचर उन दोनों भाइयों को देख रहे थे और थर थर काँप रहे थे, यदि आज Maharana Pratap चुप रह जाते तो ये मेवाड़ के  Maharana Pratap की शान के विरुद्ध होता, और सारी मेवाड़ में Maharana Pratap की किरकिरी हो जाती, इस ललकार को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता था, इसलिए राणा Maharana Pratap ने अपनी तलवार निकाल लिया, इतना देखते ही उनके सैनिक बीच में आ गए और होने वाले युद्ध को रोकना चाहा पर शक्ति सिंह उस समय इस तरह पागल हो चूका था की वो तलवार लिए अपने सैनिकों की तरफ ही लपक पड़ा, सभी सैनिक अपनी जान बचा कर वहां से भाग गए.

फिर उसने राणा Maharana Pratap पर पहला वार किया, और राणा Maharana Pratap ने भी अपना बचाव किया, दोनों योद्धा तलवार बाजी में निपूर्ण थे, इसलिए थोड़ी ही देर में उन दोनों के बीच होने वाली लड़ाई युद्ध में बदल गयी, तलवार की झंकार से सारा माहोल थर्रा उठा था, और कोई भी उनके पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था, दोनों भाई एक दुसरे के खून के प्यासे लगने लगे थे. 

युद्ध की आवाज सुनकर उनके गुरु राघवेन्द्र वहां पहुँच गए, और वो उन दोनों को इस तरह युद्ध करता नहीं देख पाए, उन्होंने कई बार उन दोनों से युद्ध न करने की प्रार्थना की पर किसी ने भी उनकी बात को न सुना, फिर युद्ध को रोकने की प्रार्थना करते हुए वे उन दोनों के बिलकुल समीप आ पहुंचे, इतने में ही शक्ति सिंह ने Maharana Pratap पर एक ऐसा वार किया की Maharana Pratap तो किसी तरह उस वार से बच गए परन्तु वो वार सीधा गुरुवर राघवेन्द्र को लगा, गुरु वहीँ पर अपने प्राण त्याग दिए, दोनों गुरुवर को इस प्रकार गिरता दिख आहात हो गये,

उन्होंने अपने क्रोध को भूल कर गुरुवर की तरफ देखे, गुरु की मृत शरीर को देख Maharana Pratap जोर जोर से वहीँ रोने लगे और अपनी गलती की क्षमा मांगने लगे, उन्होंने अपने गुरु की सिर को अपने जांघों में रखा और अपनी पश्चताप करने लगे, शक्ति सिंह वही खड़ा सब देख रहा था, उसने जैसे ही गुरु की तरफ आगे बढ़ा राणा Maharana Pratap ने उसे रोक लिया और क्रोद्ध भरे नज़रों से शक्ति सिंह को देखा. 

राणा Maharana Pratap उस समय बहुत ज्यादा क्रोद्धित हो चुके थे, इस लिये उन्होंने शक्ति सिंह को उसी समय राज्य से निर्वासन का आदेश दे दिया, शक्ति सिंह अपने निर्वासन के आदेश को सहन नही कर सका और उसी समय मेवाड़ को छोड़ दिया. इधर राणा Maharana Pratap ने पुरे सम्मान के साथ अपने गुरुवर का अंतिम संस्कार किया.

उदयपुर का त्याग और कुमलमेर को राजधानी बनाना

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: शक्तिसिंह के निर्वासन के बाद राणा Maharana Pratap ने सभी सामंतों और राजपूत योद्धाओं की एक सभा बुलाई और सबको एक साथ सम्भोधित करते हुए कहा की “मेवाड़ के समस्त सामंत, बहादुर, और नागरिकों आज का दिन हम सबके लिए आत्ममंथन का दिन है, संकल्प का दिन है, हम सभी जानते है की साम्राज्यवादी ताकते हम सभी को नष्ट कर हमारी संस्कृति को छिन-भिन्न कर देना चाहती है, हमारा बस अपराध इतना है.

की हमने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की है, आज पूरा भारतवर्ष विदेश से आये हुए मुस्लिम साम्राज्य के आगे घुटने टेक दिए है, हमारे राजपूताने के कई राजाओं ने भी उनकी अधीनता स्वीकार कर ली है, पर आजतक हमारे किसी भी पूर्वजों ने किसी के सामने अपना सर नहीं झुकाया है, हमारे हर पूर्वजों ने अपना सर झुकाने के स्थान में अपना सर कटाने पर विश्वास किया है. 

मुग़ल हमारी ताकत और राजपूतों की आन बाण और शान से भली भांति परिचित है, परन्तु राजपूतों के ख़ून में जो सबसे बड़ी कमजोरी है वो है एक दुसरे से जलना, उन्हें निचा दिखाना, और हर संभव एक दुसरे को नष्ट करना. विदेशी शक्ति सदैव से इन कमजोरियों का लाभ उठा कर राजपूतों के पीठ पर वार किया है. अपनों के साथ विश्वासघात ही समाराज्य्वादियों की जड़ों को हमारी धरती में गहराइ तक ले गयी है. 

इन विदेशियों से हाथ मिलाने की इच्छा इसलिए नहीं होती है क्योंकि जब जब राजपूतों ने इनसे हाथ मिलाया है हमारे घरों की स्त्रियों की मान, मर्यादा खतरे में पड़ी है, इनके सरदार जब चाहे हमारे घरों से किसी सामान की भांति हमारी घरों के स्त्रियों को ले जाते है, और आप इस बात से बिलकुल भी अनजान नहीं है की आज जो दिल्ली का राजगद्दी में बैठा शाषण कर रहा है, वो किस तरह से वहां के हिन्दू स्त्रियों को आगरा के बाजार में खुले आम बेच रहा है. 

इतिहस साक्षी है की, राजपूत स्त्रियाँ इनकी हवास का शिकार बनने से बचने के लिए जलती चिताओं में अपने कुंदन से सुन्दर तनो को जीवित जलाकर राख किया है, महारानी पदिमनी जैसी असंख्य राजपूत ललनाये अपनी सोने से शारीर को आग्नि में भस्म कर चुकी है, बाप्पा रावल के वंशज भीम सिंह से लेकर  Maharana Pratap सांगा तक असंख्य वीर राजपूतों ने हमारी इस धरती को विदेशियों से बचाने के लिए अपनी प्राणों की बलि दे दी है. 

हमें लड़ाकू कौम कहा जाता है, और हम इस बात को स्वीकार करते है की हम लड़ाकू है, और हमें इस बात पर गर्व है की हम एक लड़ाकू कौम है पर लड़ाकू होने का ये अर्थ नहीं है की हम आक्रान्ता हो जाये, अपने ही भाइयों को नीचा दिखाने और उनका हक़ छिनने से हममें और उन मुगलों में क्या अंतर रह जायेगा.

आप लोगो ने मुझे मेवाड़ का राणा बनाकर मुझपर बहुत भरी दायित्व दाल दिया है, परन्तु चित्तौड़ अभी भी उन मुगलों के अधीन है, मेरा सबसे पहला कर्तव्य यही है की चितौड़ को मुगलों से छुड़ा कर राजपूती शान को फिर से स्थापित करूँ और मुगलों को ये सन्देश पहुंचा दू की राजपूतों से टकरा कर वो भी चैन से नहीं सो सकते है राजपूत मरने से नहीं डरते वो तो युद्ध में मर कर अमर हो जाया करते है. 

परन्तु एक बात ध्यान रहे मैं अकेला कुछ भी नहीं हूँ, यदि आप लोगो की फौलादी ताकत मेरे साथ है तो मैं फौलाद हूँ,  आज मेरे साथ साथ आपलोग भी शपथ लीजिये की जब तक हम चितौड़ को मुक्त नहीं करा लेंगे तब तक हम सब सोने चांदी के बर्तनों में भोजन नहीं करेंगे, जीवन को भोगों में नष्ट नहीं होने देंगे, हम आपसी वैर भाव, और अन्य सभी संकिर्ताओं को अपने से दूर रखेंगे, और इस तरह  Maharana Pratap के साथ सभी योद्धाओं, सरदारों और नागरिकों ने सपथ ली.

शपथ के बाद ही मेवाड़ क्षेत्र में नई हलचल आरम्भ हो गयी, राजपूतों ने सिर और मुछ के बालों को कटवाने बंद कर दिए. सादे जीवन का प्रण लेकर अपने  Maharana Pratap को हर संभव सहयोग देने लगे.

इसके साथ ही उदयपुर जैसे सुन्दर नगरी को त्याग कर, कुमलमेर की दुर्गम पहाड़ियों के बीच अपनी राजधानी बनाने का निर्णय  Maharana Pratap और उनके विवेकशील सरदारों ने लिया. राणा Maharana Pratap जानते थे की उदयपुर समतल स्थान में बसी नगरी है, और यहाँ भारी मुग़ल सेना कभी भी उनपर आक्रमण कर उनपर अपना अधिकार जमा सकती है, इसके साथ ही राजपूतों के संख्या कम होने के कारण पहाड़ियों के बीच उन्हें लड़ना सदैव से अनुकूल रहा है. 

देखते ही देखते उदयपुर वीरान हो गया, और  Maharana Pratap के इशारे में उदयपुर निवासी कुमलमेर में जाकर बसने लगे.  राणा Maharana Pratap ने उदयपुर छोड़ने का आदेश इतनी शक्ति से दे रखा था की जो भी उदयपुर की सीमा में प्रवेश करता उसे मृत्यु दंड दिया जाता. कुछ ही समय में कुमलमेर आबाद और उदयपुर आजाद हो गया. कुमलमेर में आराम का जीवन नहीं था, कठोर जीवन देकर  Maharana Pratap अपने नागरिकों को ये एहसास दिलवाना चाहते थे की उनका जन्म भोग-विलास के लिए नहीं बल्कि अपनी धरती को मुगलों से आजाद करवाने के लिए हुआ है. 

 Maharana Pratap ने एक विशाल किला कुमलमेर में बनवाया, और सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया. राजपूत युवकों को युद्ध करने का अभ्यास करवाया जाता था, अपनी मातृभूमि में मर मिटने के लिए तैयार रहने का मनोबल दिया जाता था. स्त्रियाँ भी अपने भाइयों, बेटों और पत्तियों को उनकी तैयारी में पूरा सहयोग करती. 

मेवाड़ की समस्त प्रजा अपनी आय में से कटौती कर सुरक्षा व्यवस्था के लिए धन जूटा कर देती, जन जन में  Maharana Pratap ने ये मन्त्र फूंक दिया था की, ना कोई राजा है न ही कोई प्रजा है, जब तक हम अपनी खोई हुई जमीन वापस नहीं ले लेते तब तक हम चैन से नहीं बैठ सकते ह

राणा Maharana Pratap में मुगलों से अपनी मातृभूमि लेने का लक्ष्य था वही उनके दोनों भाइयों ने उन्हें बहुत निराश किया. उनका छोटा भाई जगमाल जिसे हटा कर Maharana Pratap को राणा बनाया गया कभी चैन से नहीं बैठा, राणा Maharana Pratap ने बहुत कोशिश की कि जगमाल को पूरी प्रतिष्ठा दी जाय पर जगमाल उनसे हमेशा असंतुष्ट और नाराज ही रहता वो अपने आप को अपमानित समझता. 

वो अधिक दिन तक मेवाड़ में नहीं रह सका और उसने मेवाड़ त्याग कर अपने परिवार समेत जहाजपुर चला गया. जहाजपुर आज्मेर के सुबेदारी की अधीन था. अजमेर के सूबेदार ने उसकी रहने की व्यवस्था कर दी. 

कुछ दिन बाद जगमाल अकबर से मिला. अकबर विस्तारवादी था वह हमेशा से राजपूतों को अपने साथ मिला कर उन्हें अधीन करना चाहता था. वह जनता था की पुरे भारतवर्ष में राजपूत कौम ही सबसे बहादुर और लड़ाकू है, इसलिए ये कौम जिसके पक्ष में रहेगी वही भारत में राज कर पायेगा. 

उसे पता लगा की राणा Maharana Pratap का भाई उसकी शरण में आया है, जिसे राज गद्दी से हटाकर Maharana Pratap मेवाड़ का राजा बना है. तो उसे हार्दिक प्रसन्नता हुई. जगमाल के पिता उदय सिंह से चितौड़ का किला छींनते समय वो राजपूतों के बहुबल से परिचित हो चूका था, उसके विशाल मुग़ल सेना ने मुट्ठी भर राजपूतों से चितौड़ का किला जितने में छ: महीने का वक़्त लगा था.

अब राणा Maharana Pratap का छोटा भाई जगमाल उसके सामने खड़ा था, वह Maharana Pratap से घृणा करता था, ऐसे व्यक्ति को शरण देकर अकबर राजपूतों की एकता की कमर तोड़ देना चाहता था. इसलिए उसने जगमाल का स्वागत किया और उपहार स्वरूप जहाजपुर का परगना दे दिया. जगमाल ने अकबर को वचन दिया की वह सदैव अकबर की अधीनता में रहेगा और यथा संभव सहयोग देगा.

उसी समय एक घटना और हो गयी सिरोही राज्य के उत्तराधिकार को लेकर देवड़ा सुरतान और देवड़ा बीजा में टन गयी, दोनो को ही अपनी शक्ति में भरोसा नहीं था इसलिए वो सम्राट अकबर के मित्र राय सिंह के पास पहुंचे. 

राय सिंह ने दोनो की बात सुनी और फिर देवड़ा सूरतान का पक्ष ले लिया, उसने सुरतन से शर्त रखी की वह सिरोही का आधा राज्य अगर अकबर को दे दे , तो वह उसकी सहायता करेगा. सुरतान तैयार हो गया. उसने आधा सिरोही राज्य अकबर को दे दिया. और अकबर ने तुरंत ही वह सिरोही राज्य जगमाल को दे दिया. 

राव सुरतान को ये बात बहुत बुरी लगी, उसने जगमाल को चुनौती दे डाली, परन्तु देवड़ा बीजा उसके उसके साथ हो गया और राव सुरतान का शक्ति संतुलन बिगड़ गया.उसे सिरोही छोड़ना पड़ा.वह भाग कर आबू चला गया.

बाद में देवड़ा बीजा ने जगमाल का साथ छोड़ दिया अब जगमाल अकेला पड़ गया. राव सुरतान ने मौका देख कर जगमाल पर आक्रमण कर दिया. इस युद्ध में जगमाल मारा गया. रायसिंह की भी इस युद्ध में मृत्यु हो गयी.

अकबर की कूटनिति ये थी की वह राजपूतों को अपने अधीन करके उनके बल पर पुरे भारतवर्ष पर शाषण करना चाहता था, अपनी इस योजना को पूरा करने के लिए वह राजपूतों पर सदैव दबाव बनाये रहता था, उन्हें आपस में लड़ा कर नष्ट करने से भी वह कभी नहीं चुकता था, वह राजपूतों की कमजोरियों को अच्छी तरह से समझ गया था, इसी कारण से उन्हें एक एक कर के झुकाने और बर्बाद करने में सफल रहा. 

सिरोही का आधा राज्य देवड़ा सुरतान से लेकर जगमाल को देने के बाद अकबर ने अपना पल्ला झाड़ लिया और राजपूतों के बीच लड़ने के लिए हड्डी फेंक दी, सिरोही का राज्य उनकी आपसी फूट को हवा देने का माध्यम बन गया. राजपूतों के आपस में अनेक युद्ध हुए और जगमाल, रायसिंह और व कोलिसिंह आदि अनेक राजपूत योद्धा अकबर के मकसद को पूरा करने में काम आये.

मानसिंह से सलाह

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: अम्बर के राजा भगवानदास ने अपनी बहन जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया था, भगवानदास का पुत्र मानसिंह अकबर का परम विश्वसनीय सेनापति था. अकबर ने मानसिंह को अकेले में बुलाया और मेवाड़ में आक्रमण करने के बारे में बातचीत की. 

अकबर ने शब्दों को अच्छी तरह से चबाते हुए कहा की – :मानसिंह तुम जानते हो की मैं व्यर्थ में खूनखराबा नहीं चाहता और वह खून खराबा राजपूतों के विरुद्ध हो तो मुझे दुःख होता है, परंतु मेवाड़ के राणा Maharana Pratap सिंह का भाई शक्तिसिंह दिल्ली आया हुआ है, उसे Maharana Pratap ने निर्वासित कर दिया है, उसने बताया की Maharana Pratap चित्तोडगढ वापस लेने के लिए मुगलों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी भी कर रहा है”. 

इस पर मानसिंह ने बड़े ही आदर से कहा की ये सब राजपूतों के आपसी झगडे है, शक्ति सिंह Maharana Pratap का भाई है उससे कुछ गड़बड़ हुई होगी और Maharana Pratap ने उसे निर्वासित कर दिया, पर इससे ये साबित नहीं होता है की शक्ति सिंह एक गंभीर व्यक्ति नहीं है, फिर हम उसे गंभीरता से क्यों ले. 

इसपर अकबर ने कहा की तुम ठीक कहते हो मानसिंह परन्तु Maharana Pratap के बारे में मैंने अन्य राजपूतों और अपने गुप्तचरों से भी सुना है वह कई लोगो में जातीय स्वभिमानता को जाग्रत कर हमसे टकराने के लिए उन्हें तैयार कर रहा है.  मानसिंह ने कहा की हमें तनिक भी चिंता नहीं करनी चाहिए, Maharana Pratap की मुट्ठीभर राजपूत सेना हमारी सागर सी विशाल सेना का कुछ नहीं बिगड़ सकती है. शत्रु को कभी कमजोर समझने की भूल ना करना मानसिंह, और जब शत्रु राणा Maharana Pratap जैसा योद्धा हो तब तो कदापि नहीं.

मानसिंह ने कहा की राणा Maharana Pratap के लिए आपके मन में इतनी कद्र? इस पर अकबर ने कहा की बहादुरों की कद्र करना हमारी फिदरत है. बेशक हम राणा Maharana Pratap की बहादुरी की कद्र करते है. इतना ही नहीं हमारे मन में तो सारे राजपूत कौम के लिए इज्जत है. 

हम नहीं चाहते है की Maharana Pratap हंसे टकराए और हमें राजपूतों का बेवजह खून बहाना पड़े. इसलिए कुछ युक्ति सोचो और Maharana Pratap को समझा बुझा कर मुग़ल सल्तनत के अधीन कर लो, इसके बाद तोह सभी राजपूत खुदबखुद मुग़ल सल्तनत के अधीन हो जायेंगे, बस हमें और कुछ नहीं चाहिए.

सारे राजपूतों को झुकाकर मुग़ल सल्तनत के अधीन करने वाली बात सुन कर मानसिंह के मन इन चुभन सी होने लगी उसने अकबर कहा की आप चिंता ना करे मैं शोलापुर के विद्रोह का दमन करने जा रहा हूँ. 

वहां से लौटते समय मैं Maharana Pratap सिंह से अवश्य मिलूँगा और उन्हें समझा बुझा कर माय=उगल सल्तनत से संधि करने के लिए अवश्य मना लूँगा. इतना सुनकर अकबर ने गहरी सांस ली और कहा की देखो मानसिंह मैं राजपूत कौम का परम हितैषी हूँ, मैं बेवजह राजपूतों का खून नहीं बहाना चाहता हूँ, राजपूत कौम की सुरक्षा मुगल सल्तनत से मिलकर ही रहने में है परन्तु पता नहीं क्यों Maharana Pratap जैसे कुछ राजपूतों को ये बात समझ में ही नहीं आती है. 

इसपर मान सिंह ने कहा की हाँ जह्पनाह मैं Maharana Pratap से मिलकर उन्हें अवश्य समझाऊंगा और मुझे पूरा विश्वास है की मेरी पहल कका नतीजा अवश्य ही निकलेगा. इतना कहकर मानसिंह वहां से चला गया. शोलापुर का विद्रोह दबाने में उसे भारी सफलता मिली. उसके आत्मविश्वास का स्तर और बढ़ गया.

शोलापुर से लौटते समय वे मेवाड़ के निकट से गुजर रहे थे , उनके दिल में एक अरमान उठा अब वे Maharana Pratap सिंह से मिलेंगे और दिल्लीपति से सुलह करा उनके सल्तनत को अकबर के अधीन लायेंगे. उन्होंने अपना दूत को राणा Maharana Pratap के पास भेजा. दूत ने राणा Maharana Pratap से भेंट की और अम्बर नरेश का सन्देश उन्हें दे दिया.

राणा Maharana Pratap ने दूत को कहा मेवाड़ के नरेश उनके स्वागत के लिए पहुँच रहे हैं..राणा Maharana Pratap ने मानसिंह को सम्मान पूर्वक कुमलमेर ले आये. राणा Maharana Pratap उन दिनों पत्तों से बनी पत्तली पर भोजन करते थे. और उनकी प्रेरणा से सभी राजपूत योद्धा पत्तलों पर ही भोजन करते थे. 

अपने राज्य को मुगलों के अधिपत्य से मुक्त कराने का संकल्प लेकर वे तपस्वी सा जीवन जी रहे थे पर इसके बावजूद उन्होंने मानसिंह के लिए सोने चांदी की बर्तोनो की व्यवस्था की. सोने की थाली में तरह तरह की व्यंजनों को मानसिंह के पास परोसा गया. 

राणा Maharana Pratap के बेटे अमर सिंह ने भोजन की व्यवस्था स्वयं कराई थी. वे सम्मान पूर्वक राजा मानसिंह से बातें कर रहे थे और भोजन की व्यवस्था के बारे में बार बार पूछ रहे थे. भोजन परोसे जाने के बाद अमर सिंह ने निवेदन किया की महाराज आप भोजन प्रारंभ कीजिये. 

मान सिंह ने द्वार की ओर देखा और बोले-“तुम्हारे पिता अभी तक नहीं पहुंचे है..क्या वे हमारे साथ भोजन नहीं करेंगे.. अमर सिंह ने अपनी नजरें झुका ली और बोला-“आप भोजन आरंभ कीजिये राजा साहब, पिताजी ने सन्देश भिजवाया है की राजा साहब को आदरपूर्वक भोजन कराया जाए. 

वो किसी कारन से यहाँ आने में असमर्थ है. राजा मानसिंह ने चौंक कर कहा की आखिर ऐसा कौन सा कारण उपस्थित हो गया है की तुम्हारे पिता हमारे साथ भोजन के लिए नहीं पहुँच पा रहे है….मुझे इसका जवाब चाहिए नहीं तो मैं भोजन नहीं करूँगा. 

आप बुरा ना माने महाराज आप हमारे अतिथि है आप भोजन आरंभ कीजिये- अमर सिंह ने हाथ जोड़कर विनर्मता पूर्वक कहा. पिताजी के सर में दर्द हो गया है वो भोजन के बाद आपसे अवश्य मिलेंगे. 

इसपर मानसिंह एकाएक चीखे और कहा अपने पिता से जाकर कह दो की मैं उनके सर में दर्द का कारण जान चूका हूँ अगर वो अभी यहाँ आकार मेरे साथ भोजन में सम्मिलित नहीं हुए तो उनके सर में दर्द का उपचार मैं अच्छी तरह से जानता हूँ और उनका समुचित उपचार अवश्य करूँगा.

अमर सिंह ने फिर से विनती की आप भोजन कीजिये महाराज..इसपर मानसिंह क्रोधित हो गए और कहा की आज Maharana Pratap सिंह ने मेरे साथ जैसा व्यव्हार किया है ऐसा व्यवहार क्या किसी राजपूत को शोभा देता है. ठीक उसी समय राणा Maharana Pratap अपने प्रमुख सरदार के साथ राणा Maharana Pratap वहां आ पहुंचे. 

राजपूतों को क्या शोभा देता है, क्या नहीं इसका फैसला आप कब से करने लगे राजा मानसिंह? Maharana Pratap सिंह आप मेरा अपमान कर रहे है. नहीं राजा मान सिंह राणा Maharana Pratap किसी का अपमान नहीं करते है..  परन्तु आप जैसे राजपूत के साथ भोजन करना मैं अपने प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता हूँ. 

राणा Maharana Pratap ये मत भूलों की तूम किसके साथ बात कर रहे हो.जनता हूँ राजा साहब मैं अम्बर के महाराजा मानसिंह के साथ बात कर रहा हूँ. ये वही महाराजा मानसिंह है जिनके पिता ने अपनी बहन मुग़ल सम्राट अकबर के साथ ब्याह दी, ताकि मुग़ल के को से बचा सके और मुगलों के रिश्तेदार बनकर युद्ध के खतरे से मुक्त हो जाये..मैं ये भी जानता हूँ की राजा मानसिंह अकबर के चहेते मुग़ल सेनापति है…उनके अधीन कई लाख सैनिकों वाला विशाल लश्कर है, वे चाहें तो पलक झपकते ही मेवाड़ की ईट से ईट बजा सकते है. 

मुग़ल सेना को लेकर राजपूतों की मान मर्यादा को रौंद सकते है.  यह जानते हुए भी तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हुई की तुमने मुझे घर बुला कर मेरा इतना अपमान किया. 

जिसे आप अपना अपमान समझ रहे है राजा मान सिंह वह केवल आपको स्मरण करने के लिए था की आपने इस मिटटी के साथ विश्वासघात किया है.. अपने मातृभूमि को मुगलों के हाथों बंधक्ल रखते तुम्हे तनिक भी लज्जा नहीं आई.. आपने राजपूत के घर जन्म लेकर राजपूती शान को कलंकित किया है…राजपूत वह कौम है, जो भरण-पोषण देने वाली अपनी जन्मभूमि को अपनी माता मानती है और हर कुर्बानी देकर उसकी रक्षा करती है …

पर आप जैसे राजपूत ने अपनी गर्दन बचाने के लिए अपनी माँ को बंधक रखना ज्यादा सही समझा… यदि अकबर से रिश्तेदारी बनाने के स्थान पर अपनी जननी जन्मभूमि की रक्षा के लिए मुगलों के खिलाफ तलवार उठा कर लड़ते लड़ते प्राणों की बलि दे दी होती तो देश की अगली पीढ़ी तुम पर गर्व करती और यदि आप जीवित बच जाते तो आज हम आपके साथ भोजन कर रहे होते और गर्व का अनुभव कर रहे होते. 

तुम्हारी बातों से जातीय स्वाभिमान और राष्ट्र भक्ति की सुंगध आती है राणा Maharana Pratap सिंह यह सुंगंध मुझे भी अच्छी लगती है. काश हम भी तुम्हारी महत्वकांक्षा में सहयोगी की भूमिका निभा सकते परन्तु अब ईश्वर को मंजूर नहीं है Maharana Pratap सिंह, अब बहुत देर हो चुकी है, अब तो हम सब का भलाई इसी में है की की हम अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए मुग़ल सल्तनत का अंग बनकर उसके साथ खड़े हो जाये.. मैं यही सत्य समझाने के लिए तुम्हारे पास आया था, की अब भी समय है एक मौका है उसे मत गंवाओ मेरी सलाह मान लो और मुग़ल के साथ संधि कर के युद्ध की विनाश लीला से बचो. अगर पूरी राजपूत जाती युद्ध में यूँ ही मरती रही तो हमारा बीज नाश हो जायेगा. 

अगली पीढियां पढेगी की राजपूत जाती कोई हुआ करती थी और अपने मिथ्या अहंकार और समयानुकूल सोच ना रहने के कारण वह नष्ट हो गयी. नहीं राजा मान सिंह नहीं राणा Maharana Pratap बहुत ही बुलंद स्वर में बोले…यही तोह मुख्य अंतर है हमारी और तुम्हारी सोच में….हम तो यही बात मानते है की दुनिया में केवल वही कौम जीवित बचती है जो अपने आन बान और शान को बचाने के लिए हमेशा अपने सर को कटाने के लिए तैयार रहती है. 

और वे कौम मिट जाती है जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए शत्रुओं के सामने घुटने टेक देती है. आपने शत्रुओं के आगे घुटने नहीं टेके है लेकिन आपने शत्रुओ के हरम में अपनी बहु बेटियों तक को वास्तु की तरह उठा कर देने का अपराध किया है. भारतवर्ष के इतिहास में आपका नाम काले अक्षरों से लिखा जायेगा.. अगली पीढियां आप पर थूका करेंगी.  

इसपर मानसिंह चीखे और कहा की Maharana Pratap सिंह लगता है आपकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है, आपकी बुद्धि को ठीक करने के लिए अब एक ही रास्ता है युद्ध. अबकी बार आप ठीक भाषा बोल रहे है राजा साहब राणा Maharana Pratap को ऐसी ही भाषा पसंद है जाओ जाकर कह दो अपने सम्राट अकबर से यदि उसे अपनी शक्ति पर इतना ही नाज है तो सेना लेकर आये अपनी और राणा प्रतापसिंह से करे दो दो हाथ. 

तुम्हे अपने बाहू बल पर घमंड हो गया प्रतापसिंह इसलिए मेरे बार बार सहनशीलता का परिचय देने पर भी तुमने मेरा अपमान किया है. सम्राट अकबर की बात छोड़ो मैं स्वयं तुम्हे सबक सिखाने आऊंगा और इसके लिए तुम्हे ज्यादा दिन प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी. 

तुम्हे तुम्हारा घमंड चूर चूर करके तुमसे पूछुंगा की एक राजपूत को घर बुला कर अपमान करने का परिणाम क्या होता है. चलो नाराजगी में हीओ सही तुम्हारे दिल में राजपूती जज्बा तो आया..जाइये और दल बल लेकर रण भूमि में शीघ्र आईये हमारी तलवारें आपका युद्ध भूमि में स्वागत करेगी. 

मान सिंह अपने घोड़े पर स्वर हुए और अपने घोड़े को ऐड लगा दी. राणा Maharana Pratap मान सिंह के घोड़े को देखते रहे जब तक की वह उनके आँख से ओझल ना हो गया. फिर वो अपने सरदारों की ओर मुड़े और मुस्कुराये..चलो अब इतिहास हम पर युद्ध छेड़ने का इल्जाम नहीं लगाएगा…शत्रु स्वयं ही आक्रमण करेगा. हमें केवल प्रतिरक्षा ही नहीं करनी है, अपितु राजपूती शोर्य से ऐसा इतिहास लिखना है जिसे पढ़ते समय इतिहास हम पर गर्व करें.

मान सिंह के आक्रमण की तैयारी

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: मान सिंह ने दिल्ली पहुँच कर कर सम्राट अकबर को राणा Maharana Pratap द्वारा किये गए अपमान की कहानी सुनाई. इसे सुनकर अकबर को बहुत प्रसन्नता हुई. परन्तु अकबर ने अपनी प्रसन्नता को प्रकट नहीं होने दी. वह गंभीर मुद्रा में बोला-“तुम्हारा अपमान मेरा अपमान है मानसिंह, परन्तु मैं खून खराबा से बचना चाहता हूँ.

खासकर राजपूत का, राजपूत से टकराना मुझे अच्छा नहीं लगता है. राणा Maharana Pratap राजपूत अवश्य है जह्पनाह परन्तु अहंकार ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है . उसे अपनी वीरता पर बहुत घमंड है. मैंने कसम खाई है की उसका घमंड चूर चूर कर अपने अपमान का बदला लूँगा. 

अकबर एक क्षण चुप रहा, फिर बोला-“लेकिन मानसिंह तुम तो Maharana Pratap की बड़ी प्रशंसा किया करते थे. तुम तो उसे परम विवेकी और सुलझा हुआ शासक समझते थे. जब जब मैने मेवाड़ को अपने राज्य में मिलाने की बात कही तुमने सदा उसका विरोध किया है. 

तुम्हारी ही बदौलत अबतक Maharana Pratap चैन से शासन करता रहा, मैं तो राजपूत को अब और ना छेड़ने का मन बना चूका था परन्तु तुम्हारा अपमान…..अकबर ने अपमान की पीड़ा में जलती मानसिंह की आँखों में देख कर बोला, अब तो तुम्हारे अपमान करने की सजा Maharana Pratap को अवश्य मिलेगी, जाओ युद्ध की तैयारियां करो और मेवाड़ की ईट से ईट बजा दो. Maharana Pratap को जीवित पकड़ कर मेरे सामने उपस्थित करो. यदि जीवित ना ला सको तो मुर्दा ही सही. पर उसे दिल्ली अवश्य लाना. अकबर को प्रणाम कर मानसिंह वहां से चला गया.

अकबर सोचने लगा…यह राजपूत कौम भी बड़ी विचित्र है.  सबसे अधिक लड़ाकू और देशभक्त राजपूत जरा सी बात पर एक दुसरे का खून के प्यासे बन जाते है…कल तक जो मान सिंह राणा Maharana Pratap की प्रशंसा करते नहीं थकता था, आज राणा से अपमानित होकर उसके विनाश का सबब बन गया है. 

अब राणा Maharana Pratap को धुल में मिलाने का सही अवसर है..मानसिंह की प्रतिशोध की भावना शक्तिसिंह के प्रतिशोध की भावना से मिल कर राणा Maharana Pratap का विनाश अवश्य कर डालेगी. जो काम छ: महीने तक मैंने Maharana Pratap से युद्ध लड़कर केवल चितौड़ के किले को ही जीत सका अब मानसिंह के कारण मैं पूरा मेवाड़ पर अधिकार करूँगा.  

अकबर ने तुरंत ही शक्ति सिंह को बुलाया. शक्ति सिंह प्रतिशोध की भावना में जल रहा था. उसने आते ही पुछा जहाँपनाह आप Maharana Pratap सिंह से निबटने का मौका कब दे रहे है? अब मेरे सब्र का बाण टूटने लगा है. इस पर अकबर बोला- अब तुम्हे अधिक इन्तेजार की जरुरत नहीं है. 

शक्तिसिंह. Maharana Pratap से बदला लेने का मौका तुम्हारे पास खुद ही चल के आ गया है. तुम्हारे मगरूर भाई ने मानसिंह का अपमान कर अपनी मौत का फरमान खुद जरी कर दिया है. शाही फ़ौज की तैयारी हो रही है देखे तुम्हारी तलवार कितनी गर्दन नापती है. 

आप मौका तो दीजिये जहापनाह शक्ति सिंह की बान्हे फड़कने लगी.-मैं अकेला ही शाही फ़ौज की विजय का इतिहास लिखूंगा..अवश्य शक्ति सिंह तुम इन मेवाड़वाशियों को बता दो की तुम्हारी शक्ति को ना पहचान कर कितनी बड़ी भूल की है. अपनी प्रसंसा सुनते ही शक्ति सिंह का मुह खुल गया. 

घर का भेदी शक्ति ने मुग़ल सम्राट अकबर को बता दिया की Maharana Pratap के पास कुल मिलाकर 20-22 हजार सैनिक है इनमे जान पर खेलजाने वाले राजपूतों के अलावा एक बड़ी संख्या में भील भी है…भील एक जंगली जाती होती है, ये गजब के तीरंदाज होते है. 

वे एकाएक आक्रमण कर गुफाओं में चिप जाते है..और फिर वहां से अचानक निकल कर बिजली की तेज़ी से आक्रमण करते है.. इनसे निपटने के लिए एक विशेष प्रकार की रणनीति बनानी होगी. अकबर ने शक्ति सिंह का सारा भेद जानने के बाद सफल रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से फौजी हाकिमो की बैठक बुलाई..इस बैठक का केंद्र शक्तिसिंह थे..फौजी हाकिम बड़ी ही सावधानी से शक्ति सिंह से सैनिक महत्त्व के सारे भेद उगलवा लिए.

अब फौजी हाकिम अपनी जीत के प्रति और अधिक आश्वस्त हो गए. शाही फ़ौज की जीत सुनिश्चित होने लगी. परन्तु बहुत सोच विचार के बाद भी शाही फ़ौज के सेनापति के चयन की समस्या नहीं हल हो सकी. अकबर का मन था की सेना का पूरा दायित्व मानसिंह ही संभाले. 

मानसिंह पर अकबर का पूरा भरोसा था. मानसिंह अब तक कई शाही फ़ौज का सेनापतित्व कर चुका था. उसके नेतृत्व में सही फ़ौज ने कई युद्ध जीते भी थे. परन्तु संकट ये भी था की मान सिंह के सेनापति बनते ही बागी हो जाने का खतरा था. 

अकबर के कूटनीति के हिसाब से शक्तिसिंह के हौसले को कहीं से भी कम होने देना शाही फ़ौज की हवा निकलने जैसा था. अकबर ने बहुत ही विवेक से काम लिया और मानसिंह व् शक्तिसिंह को एक ही तुला में तोला और अपने पुत्र सलीम को सेनापतित्व का दायित्व सौपा.

राणा Maharana Pratap को अपनी शक्ति और राजपूत के स्वाभिमान पर अटूट विश्वास था. वे जानते थे की अकबर से युद्ध करना सर्वनाश को आमंत्रण देना है, परन्तु वे ये भी जानते थे की अकबर के सामने स्वेच्छा से झुक जाना और उसकी अधीनता को स्वीकार कर लेना अपमानजनक ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए घातक है. 

यदि इसी तरह सभी शासक मुगलों के समक्ष बिना किसी प्रतिरोध के आत्मसमर्पण करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब राजपूति संस्कृति ही नहीं वरन पूरी की पूरी हिन्दू संस्कृति ही मिट जाएगी. अत्याचार और अन्याय का विरोध ही वास्तव में मानव धर्म है. 

सच्चे राजपूत का धर्म है, जो पृथ्वी पर आया है, चाहे वो स्वयं हो अथवा अकबर, पर मनुष्य कहलाने का अधिकारी वही है जो अपने धर्म का निर्वाह करते हुए मृत्यु को प्राप्त करे. गुलामी के सौ वर्ष से ज्यादा Maharana Pratap की आजादी का एक पल प्रिय था. गुलामी की चुपड़ी रोटी की जगह आजादी की घास की रोटी Maharana Pratap को ज्यादा मीठी लगती थी. यही कारन था की तमाम दबाव के बावजूद Maharana Pratap ने अकबर के विरुद्ध युद्ध करना ही श्रेष्ट समझा.

हल्दीघाटी का युद्ध

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: 5000 चुने हुए सैनिकों को लेकर मानसिंह व शक्तिसिंह शहजादे सलीम के साथ 3 अप्रैल, 1576 ई. को मंडलगढ़ जा पहुंचे. शहजादा सलीम इस सेना का सेनापति था, परन्तु आक्रमण का पूरा सेहरा मानसिंह के सर पर था. सब जानते थे की ये आक्रमण मानसिंह के पहल में ही हो रहा है. 

इस सेना में मुग़ल सेना की चुनी हुई हस्तियाँ मानसिंह के साथ में थी- गाजी खां, बादक्शी,ल ख्वाजा गियासुद्दीन, आसफ खां आदि को साथ लेकर मानसिंह ने दो माह तक मांडलगढ़ में मुग़ल सेना का इन्तेजार किया. 

 Maharana Pratap को जब यह पता लगा की शक्तिसिंह को साथ लेकर मानसिंह मेवाड़ पर आक्रमण के लिए चल पड़ा है, और मंडलगढ़ में रूककर एक बड़ी मुग़ल सेना का इन्तेजार कर रहा है, तो  Maharana Pratap ने उसे मंडलगढ़ में ही दबोचने का मन बना लिया, परन्तु अपने विश्वसनीय सलाहकार रामशाह तोमर की सलाह पर राणा Maharana Pratap ने इरादा बदल दिया. 

रणनीति बने गयी की मुगलों को पहल करने देनी चाहिए और उस पर कुम्भलगढ़ की पहाड़ियों से ही जवाबी हमला किया जाए. अपनी फ़ौज की घेरा को मजबूत करने के लिए  Maharana Pratap कुम्भलगढ़ से गोगुंडा पहुंचे. उनके साथ उस समय झालामान,झाला बीदा, डोडिया भीम, चुण्डावत किशन सिंह, रामदास राठोड, रामशाह तोमर, भामाशाह व् हाकिम खां सूर आदि चुने हुए व्यक्ति थे. 

जून के महीने में बरसात के आरम्भ में मुगल सेना ने मेवाड़ के नै राजधानी कुम्भलगढ़ के चरों ओर फैली पर्वतीय श्रृंखलाओं को घेर लिया. कुम्भलगढ़ Maharana Pratap का सुविशाल किला था, जो की Maharana Pratap की समस्त गतिविधियों का केंद्र था. 

इसी जगह Maharana Pratap का जन्म हुआ था और कहा जाता है की विश्व में चीन की दिवार के बाद सबसे लम्बी दीवारों में से एक है. मानसिंह तथा मुग़ल शहजादा ने सारी जानकारी प्राप्त कर यह रणनीति तैयार की कि Maharana Pratap को चारो ओर से घेर कर उस तक रसद पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाए. 

कुम्भलगढ़ के बुर्ज से  Maharana Pratap ने जब मुग़ल सेना और उसकी घेराबंदी का निरिक्षण किया तब वे समझ गए की राजपूतों के अग्निपरीक्षा के दिन आ गए है. 

जहाँ भी नजर जाते थी बरसाती बादलों के तरह फैले मुग़ल सेना के तम्बू नजर आ रहे थे. मुग़ल सेना का घेरा बहुत मजबूत था, इतना मजबूत था की उससे नजर बचाकर परिंदा भी कुम्भलगढ़ मे प्रवेश नहीं कर सकता था. मुग़ल सेना में अधिक संख्या भीलों और नौसीखिए की थी. 

तीर कमान, बरछी, भाले, और तलवारे ही उनके हथियार थे. मुग़ल सेना के पास तोपें थे और अचूक निशाना लगाने वाले युद्ध पारंगत तोपची थे.  Maharana Pratap के पास एक भी टॉप नहीं थी पर उनका एक एक सैनिक अपना सर में कफ़न बंधकर निकला था, जान लेने और जान देने का जूनून Maharana Pratap के हर सैनिक में था. 

मुग़ल सेना के निरिक्षण के बाद  Maharana Pratap अपने प्रमुख सलाहकारों एवं सरदारों के साथ अपनी सेना के सम्मुख पहुंचे. और सैनिकों को सम्भोधित करते हुए कहा –“जान लेने और जान देने का उत्सव अब हमारे सिर में है, मुग़ल सेना काले घटाओं की तरह कुमलमेर की पहाड़ियों पर छा गयी है, एक लाख से अधिक मुग़ल सेना ने हमें इस आश को लेकर घेरा है की हम संख्या में कम है और विस्तार देख कर ही डर जायेंगे, परन्तु शायद वो भूल गए है की सूर्य की एक मात्र किरण अत्यंत अन्धकार को विदीर्ण करने के लिए काफी होती है. 

मुग़ल सेना का सेनापति भावी मुग़ल सम्राट शहजादा सलीम कर रहा है, और उसका मार्गदर्शन कर रहे है देश के दो गद्दार राजपूत मानसिंह और शक्तिसिंह. मानसिंह वो गद्दार है जिसने अपनी बहन को शहजादे सलीम से ब्याह दी और शक्तिसिंह इस मेवाड़ धरती का गद्दार है जो की दुर्भाग्यवश मेरा भाई है, उसे भाई कहते हुए मुझे लज्जा आती है, परन्तु यह सच है की आज उसने राजपूती शान का बट्टा लगाया है, वह मुग़ल सेना के साथ मिलकर अपनी ही धरती और अपने ही भाई में चढ़ाई करने आया है. 

शक्ति सिंह इस जगह से भली भांति परिचित है. वह घर का भेदी है, अगर आज वो उनके साथ नहीं होता तो हमारे बहुत से रहस्य शत्रुपक्ष को पता नहीं लग पाते, और उस स्थिति का लाभ उठा कर हम शत्रु पक्ष को अनेक तरह से पटखनी दे सकते थे. 

परन्तु ये हमारे मेवाड़ धरती का दुर्भाग्य है की उसी का एक बेटा विदेशी मुग़ल सेना को लेकर उसी की मनंग उजाड़ने आया है.परन्तु साथियों विजय सिर्फ हमारी होगी क्योंकि ये हमारी स्वाधीनता बचाने की लड़ाई है, और हम अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना खून बहाना भलीं भांति जानते है.

हम गिन गिन कर शत्रुओं का सिर काटेंगे. हमारे एक एक सैनिकों को पच्चीस पच्चीस मुग़ल सैनिकों का सर काटना है. 

हमारा हौसला बुलंद हो, हमारी भुजाओं की ताकत के सामने, हमारे, युद्ध कौशल, व् देशभक्ति के जूनून के सामने एक भी शत्रु सैनिक यहाँ से जीवित बचकर नहीं जा पायेगा. हम एक एक को कुमाल्मेर की पहाड़ियों में दफ़न कर देंगे. 

आओ प्रतिज्ञा करें की हम एक एक सैनिकों को मुगलों के पच्चीस पच्चीस सैनिकों के सिर काटने है, हमारे जीते जी शत्रु हमारी मातृभूमि पर कदम नहीं रख सकेगा, इसके लिए चाहे हमें कोई भी कीमत चुकाने पड़े. 

हम इन मुग़ल सेना को बता देंगे की हम भले ही मर जाये पर युद्ध भूमि से पिछे हटना हम राजपूतों के खून में नहीं है. इसप्रकार से  Maharana Pratap की जोरदार आवाज से सैनिकों में प्रोत्साहन भरा जाने लगा, उनके इस बातों को सुनकर उनके सैनिकों का मनोबल आसमान की उचाईयों में पहुंचा दिया. 

सबने जोरदार अपने तलवारे खिंची और और बुलंद आवाज में घोषणा की कि अब ये तलवार शत्रु का रक्त पी कर ही म्यान में वापस जाएगी. 

दोनों ओर की सेना तैयार हो गयी परन्तु हमला नहीं हुआ,  Maharana Pratap ने मन बना लिया था की पहले मुग़ल सेना पहल करेगी और उसके हमला करते ही हमारी सेना उनपर टूट पड़ेगी परंतू मान सिंह ने यह युद्धनिति तैयार की थी की मुग़ल सेना सीधे हमला कर पहाड़ियों के बीच में नहीं फसेंगी, वो उनको बस कुछ दिन घेरे रखेंगे ताकि उनका रसद उनतक ना पहुँच सके और  Maharana Pratap की सेना पहाड़ियों से उतरकर खुले मैदान में आ सके जिससे उन्हें हराना ज्यादा आसान हो जाये. शहजादा इस पक्ष में था की आगे बढ़कर उनपर आक्रमण किया जाये ताकि युद्ध जल्दी ख़त्म हो सके.

हल्दीघाटी का युद्ध

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: शहजादे सलीम मुग़ल सेना की एक टुकड़ी आगे बढ़कर  Maharana Pratap में आक्रमण करने का निर्देश दे दिया, मानसिंह ने उसे समझाने का प्रयत्न किया परन्तु वो नहीं माना. 

मुगलसेना ने जैसे ही हल्दीघाटी के संकरे घाटी में प्रवेश की राणा Maharana Pratap की सेना ने एक एक कर कई मुग़ल सेना को मौत के घाट उतार दिया क्योंकि हल्दीघाटी की प्राकृतिक बनावट कुछ इस प्रकार से थी की केवल एक बार में एक सैनिक अपने घोड़े के साथ आगे बढ़ सकती थी, इस संरचना का लाभ उठा कर राणा Maharana Pratap के सैनिकों ने मुग़ल सेना के कई सैनिकों को मार डाला, उस समय ये देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो, ये युद्ध केवल राणा Maharana Pratap के हाथ में ही है, परन्तु तुरंत ही सलीम ने अपने सेना को पीछे हटने का संकेत दे दिया. 

अब उन्हें ये समझ नहीं आ रहा था की Maharana Pratap तक पहुँचने का कौन सा मार्ग लिया जाए, ऐसे समय में शक्तिसिंह निकलकर आया और उसने शहजादे सलीम के सामने हल्दीघाटी में सेना को प्रवेश कराने की जिम्मेदारी ली. शक्तिसिंह के मार्गदर्शन में मुग़ल सेना हल्दीघाटी के मार्ग से पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश करने लगी. 

 Maharana Pratap ने जब ये देखा की मुग़ल सेना हल्दी घाटी के पीछे वाले रास्ते से आगे बढ़ रही है तो उन्हें ये समझते देर ना लगी की किसने उन्हें ये रास्ता सुझाया होगा. अब राणा Maharana Pratap ने आगे बढ़कर हल्दीघाटी में ही मुगल सेना को दबोचने की रणनीति बनाई. राणा का आदेश पाते ही राजपूत नंगी तलवार लिए, मुग़ल सेना पर टूट पड़े. 

भीलो का समूह जहर बुझे तलवार से मुग़ल सेना का संहार करने लगी. पहले ही हमले में राणा Maharana Pratap ने मुग़ल सेना के छक्के छुड़ा दिए, देखते ही देखते मुग़ल सेना की लाशे बिछनी लगी. मुग़ल सेना में, मानसिंह सेना की बीचोबीच था. 

सैयद बरहा दाहिनी ओर, बाई ओर गाजी खां बादक्शी था, जग्गनाथ कछावा तथा गयासुद्दीन आसफ खां इरावल में थे. आगे के भाग में चुना-ए-हरावल नाम का विख्यात मुग़ल सैनिक था जो की कुशल लड़ाकू माना जाता था. 

राणा Maharana Pratap के सेना में बीच में स्वयं राणा Maharana Pratap और दाहिनी ओर रामशाह तोमर तथा बाई ओर रामदास राठोड था. राणा Maharana Pratap ने मुग़ल सेना पर अपनी सारी शक्ति झोंक दी थी, अतिरिक्त सेना के रूप में केवल पोंजा भील था, जो अपने साथियों के साथ पहाड़ियों में छिपा रहा.. शहजादा सलीम अपने हाथी पर स्वर था. 

जब उसने देखा की  Maharana Pratap अपने तलवार से मुग़ल सैनिकों को गाजर मुल्ली की तरह कटता जा रहा है और मुग़ल सेना के पैर उखड़ने लगे है, तो उसने तोंपे चलने का आदेश दे दिया. तोंपो के गोले जब आग उगलने लगे तो राणा Maharana Pratap के सेना के पास मुग़ल सेना के तोपों का कोइ जवाब ना था. 

उनकी ढालें, तलवारे, बरछे और भाले उनके तोपों के आगे बौने पड़ने लगे. अचानक से लड़ाई का रुख ही बदल गया और राजपूतों की लाशे बिछनी लगी.  Maharana Pratap ने राजपूत सैनकों की एक टुकड़ी को आदेश दिया की आगे बढ़कर उनकी तोपें छीन ली जाए, सैंकड़ो सैनिक अपनी जान हथेली में रख कर उन तोंपो को छिनने के लिए आगे बढ़ गए, परन्तु इसके विपरीत तोप के गोले उनगे शरीर की धज्जियाँ उड़ाने लगे. 

ये देख कर  Maharana Pratap को बहुत दुःख हुआ, परन्तु यह एक कडवी सच्चाई थी, तोंपो की मार को परवाह किये बगैर राणा Maharana Pratap की सेना दुगुनी उत्साह के साथ मुग़ल सेना पर टूट पड़ी. 

स्वयं राणा Maharana Pratap घाटी से निकलकर गाजी खां की सेना में टूट पड़े, जो की बहुत देर से घाटी के द्वार में कहर ढा रही थी, राणा Maharana Pratap ने गाजी खां के सेना की परखच्चे उडा दिए, इस प्रकार मुग़ल सेना और राणा  Maharana Pratap के बीच दो दिन तक युद्ध हुआ, परन्तु कोई भी नतीजा निकल कर सामने नहीं आया. 

दोनों ओर से सैनिकों की लाशे बिछ गयी थी, पूरा युद्ध क्षेत्र लाशो से पट गया था. मुग़ल सेना के तोंपो से निकले गोलों ने राजपूत सेना में कहर ढाया था. संख्या में चार गुनी होते हुए भी मुग़ल सेना राजपूत सेना के सामने टिक नहीं पा रही थी. 

युद्ध के दौरान कई ऐसे मौके आये जब मुग़ल सेना भाग खड़े हुए, परन्तु उन्हें नया उत्साह देकर वापस युद्ध के लिए भेज दिया गया. हल्दी घाटी के युद्ध में त्तिसरा दिन निर्णायक रहा, अपने जांबाज सैनिकों के लाशों के अम्बार देखकर  Maharana Pratap बौखला गए थे. 

सवानवदी सप्तमी का दिन था, आकाश में बदल भयंकर गर्जना कर रहे थे.. आज राणा Maharana Pratap अकेले ही पूरी फ़ौज बन गए थे. दो दिन तक वो अपने परम शत्रु मानसिंह को ढूंढते रहे जो युद्ध में मुलाकात करने की धमकी दे गया था. राणा Maharana Pratap का बहुत अरमान था की वो उससे युद्ध करे और अपना शोर्य दिखाए, परन्तु मानसिंह अपने सेना के बीचोबीच छिपा रहा. 

आज के युद्ध में  Maharana Pratap ने फैसला कर लिया था की वो मानसिंह को अवश्य ढूँढ निकालेंगे, वो बहुत ही खूबसूरत सफ़ेद घोड़े चेतक में बैठे शत्रुओं का संहार करते करते मानसिंह को ढूँढने लगे. सैनिकों का सिर काटते हुए वो मुग़ल सेना के बीचो बीच जा पहुंचे. 

उन पर रणचंडी सवार थी, देखते ही देखते उन्होंने सैंकड़ो मुगलों की लाशे बिछा दी.  Maharana Pratap के साथ उनके चुने हुए सैनिक थे वो जिधार निकल जाते थे मुग़ल सेना में हाहाकार मच जाता था, मुग़ल युद्ध भूमि को छोड़ भागने को मजबूर हो जाते थे, मुग़ल सेना अब उनसे सीधे सीधे लड़ाई करने में भयभीत हो रही थी,  Maharana Pratap मुग़ल सेना को चीरते हुए आगे बढ़ते गए. कुछ दूर जाने के बाद एक एक कर के उनके सहायक सैनिक ढेर होते गए. 

अब वो मुग़ल सेना के बीचो बीच लगभग अकेले थे, तभी उनकी नजर शहजादे सलीम में पड़ गयी, सलीम एक बड़े हाथी में सवार होकर लोहे की मजबूत सलाखों से बने पिंजड़ा में सुरक्षित बैठा युद्ध का सञ्चालन कर रहा था. 

 Maharana Pratap ने सलीम को देखा और चेतक को उसके ओर मोड़ लिया, सलीम ने जैसे ही देखा की  Maharana Pratap उसके ओर आ रहा है उसने अपने महावत को आदेश दिया की हाथी को दूसरी दिशा में मोड़ कर दूर ले जाया जाये, जब तक वो उनके पास पहुँचते एक कुशल मुगल सेना की टुकड़ी ने उन पर जान लेवा हमला किया परन्तु  Maharana Pratap ने सभी का वार को अच्छी तरह से बेकार कर दिया और सबको मौत के घाट उतार दिया.  

अचानक से  Maharana Pratap की नजर मान सिंह पर पड़ी और उसे देखते ही  Maharana Pratap का खून खौलने लगा,मानसिंह हाथी पर सवार था, उसके पास अंगरक्षकों का एक बड़ा जमावड़ा था, मानसिंह के सुरक्षा व्यूह को तीर की तरह चीरते हुए,  Maharana Pratap का चेतक हाथी के बिलकुल ही नजदीक पहुँच गया, मानसिंह को ख़त्म करने के लिए Maharana Pratap ने दाहिने हाथ में भाला संभाला और चेतक को इशारा किया की वह हाथी के सामने से उछल कर गुजरे, चेतक ने  Maharana Pratap का इशारा समझ कर ठीक वैसा ही किया, परन्तु चेतक का पिछला पैर हाथी के सूंढ़ से लटका तलवार से चेतक का पैर घायल हो गया,  

परन्तु  Maharana Pratap उसे देख ना पाए, घायल होने के क्रम में ही  Maharana Pratap ने पूरी एकाग्रता से भाला को मानसिंह के मस्तक में फेंक डाला, परन्तु चेतक के घायल होने के कारण उनका निशाना चूक गया, और भला हाथी में बैठे महावत को चीरता हुआ लोहे की चादर में जा अटका, तबतक  Maharana Pratap की ओर सभी सैनिक दौड़ पड़े, और मानसिंह Maharana Pratap के डर से कांपता हुआ हाथी के हावड़े में जा छिपा,भला हावड़े से टकरा कर गिर गया, राजा मानसिंह को खतरे में देख माधो सिंह कछावा Maharana Pratap पर अपने सैनिकों के साथ टूट पड़े, उसने  Maharana Pratap पर प्राण घातक हमला किये. 

उसके साथ कई सैनिकों ने  Maharana Pratap पर एकसाथ हमला किये जिससे  Maharana Pratap के प्राण संकट में पद गए. एक बरछी उनके शरीर में पड़ी और  Maharana Pratap लहू लुहान हो गए. उसी समय एक और तलवार का वार उनके भुजा को आकर लगी. 

परन्तु अपनी प्राणों की परवाह किये बगैर  Maharana Pratap लगातार शत्रुओं से लोहा लेते रहे. अपने स्वामिभक्ति दिखा रहा चेतक भी हर संभव  Maharana Pratap का साथ दिए जा रहा था, चेतक का पिछला पैर बुरी तरह से घायल हो चूका था, परन्तु अश्वों की माला कहा जाने वाला अश्व दुसरे अश्वों की तरह घायल हो जाने पर युद्ध भूमि में थककर बैठ जाने वालों में से नहीं था.

झालावाडा के राजा  Maharana Pratap के मामा ने जब ये देखा की  Maharana Pratap बुरी तरह से घायल हो गए है, और लगातार शत्रु से लड़े जा रहे है, तब उन्होंने अपना घोडा दौडाते हुए  Maharana Pratap के निकट जा पहुंचे, उन्होंने झट से Maharana Pratap का मुकुट निकला और अपने सिर में पहन लिया, फिर राणा से बोले-“तुमको मातृभूमि की सौगंध राणा अब तुम यहाँ से दूर चले जाओ, तुम्हारा जीवित रहना हम सबके लिए बहुत जरूरी है. 

 Maharana Pratap ने उनका विरोध किया परन्तु कई और सैनिको ने उनपर दवाब डाला की आप चले जाइये, अगर आप जीवित रहेंगे तब फिर से मेवाड़ को स्वतंत्र करा सकते है,  Maharana Pratap का घोडा चेतक अत्यंत संवेदनशील था, अपने स्वामी के प्राण को संकट में देख तुरंत ही उसने Maharana Pratap को युद्ध क्षेत्र से दूर ले गया. 

मन्नाजी अकेले ही मुग़ल सेना के बीच घिर चुके थे, मुग़ल सेना उन्हें  Maharana Pratap समझ कर बुरी तरह से टूट पड़े, उन्होंने बहुत देर तक अपने शत्रुओं का सामना किया परन्तु अंत में वीर गति को प्राप्त किया. मन्ना जी के गिरते ही राणा Maharana Pratap के सेना के पैर उखड़ गए.

शक्तिसिंह का हृदय परिवर्तन

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: शक्तिसिंह ने  Maharana Pratap को घायल शारीर को लादे हुए चेतक को भागते देख लिया था. उसने ये भी देखा की झाला नरेश ने किस तरह अपनी जान देकर  Maharana Pratap को बचाया था. Maharana Pratap के लिए हजारों राजपूत हसते हसते अपनी जान न्योछावर कर गए. 

और तीन दिन के भीषण युद्ध के सामने मुग़ल सेना त्राहि त्राहि कर उठी थी. यह सब देख कर शक्तिसिंह को बहुत पछतावा होने लगा. हजारों राजपूतों को लाशों का ढेर बनाने एवं देवता सामान भाई की प्राण को संकट में डालने के लिए शक्तिसिंह ही जिम्मेदार था. 

यदि उसने हल्दीघाटी में घुसने और  Maharana Pratap की कमजोरियों को मुगलों के सामने ना बताया होता तो आज के युद्ध का परिणाम कुछ और ही होता, और इतिहास  Maharana Pratap के साथ साथ शक्तिसिंह पर भी उतना ही गर्व करता.  

शक्ति सिंह तुरंत ही अपने घोड़े की ऐड लगाई और उधर चल पड़ा जिस ओर चेतक गया था. इधर सलीम ने घोषणा कर दिया की Maharana Pratap युद्ध के मैदान से जिन्दा भाग गए है उसको जिन्दा पकड़ कर लाने वाले को भरी इनाम दिया जायेगा. 

दो मुग़ल सैनिको को शक्तिसिंह ने Maharana Pratap का पीछा करते हुए पाया.शक्तिसिंह समझ गया की मुग़ल शहजादा से भरी इनाम के लालच में घायल राणा Maharana Pratap का पीछा कर रहे है. शक्तिसिंह ने अपने घोड़े को वायु वेग से दौड़ाया. 

युद्ध के मैदान से निकलने के बाद चेतक की गति कुछ धीमी पद गयी थी..चेतक के पैर से भी रक्त की धारा बहे जा रही थी.  Maharana Pratap लगभग लगभग अछेत की स्थिति में हो चुके थे. अचानक Maharana Pratap को घोड़े की ताप सुनाई दी जब उन्होंने पीछे पलट के देखा तो दो मुग़ल सैनिक उनका वायु वेग से हाथ में तलवार लिए उनकी ओर आ रहे है, चेतक भी बहुत तेज़ी से भागा, परन्तु दुर्भाग्य वश एक बड़ा सा नाला उनके बीच आ गया. 

वो नाला एक पहाड़ी को दुसरे पहाड़ी से अलग करता था, उन दोनों पहाड़ियों के बीच की लम्बाई 27 फूट की बताई जाती है, चेतक वो घोडा था जो अपनी स्वामी की इशारे को अच्छी तरह से समझता था, वो अपने स्वामी के इशारे से वायु वेग में दौड़ना जानटा था. 

ऐसा करते समय वो अपने प्राणों की परवाह तक न करता था. उसने बिना एक पल के देरी के उस नाले में जोरदार छलांग लगा दिया. परन्तु घायल चेतक उस पार जाने के बाद दुबारा फिर कभी नहीं उठ पाया,  Maharana Pratap तो सकुशल थे पर एक मूक जीव ने अपने स्वामीभक्ति दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त किया और अपना नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा गया. 

युद्ध में घायल  Maharana Pratap की उस समय बड़ी ही असहाय स्थिति हो गयी.  Maharana Pratap के शारीर से टिके अर्ध्मुछित से चेतक की मृत्यु पर रो पड़े. जब उन दो मुगलों ने ये देखा तो वे आश्चर्य से देखते रह गए, उन्होंने अपने घोड़े को भी उस नाला को पार करने का आदेश दिया पर हर घोडा चेतक नहीं हो सकता है. 

शक्ति सिंह भी ये सारा नजारा देख रहा था. उस समय उसके ह्रदय में अपने प्रति ग्लानी की भावना प्रकट होने लगी वह अपने आप को कोशने लगा की जब मेवाड़ का एक एक पशु अपने मातृभूमि और अपने स्वामिभक्ति में अपना प्राण न्योछावर कर सकता है तो मैं तो फिर भी मनुष्य हूँ. 

दोनों मुग़ल सैनिक नाला पार कर  Maharana Pratap की ओर बढ़ने लगे. जैसे ही दोनो मुग़ल सैनिक ने  Maharana Pratap में प्राण घातक वार करने का प्रयास किया वैसे ही शक्तिसिंह ने विद्युत् गति से झपटकर दोनों की गर्दने काट दी, जब  Maharana Pratap ने चौंक कर पीछे पलट कर देखा- तो उन्होंने पाया की पीछे मुग़ल सैनिको की लाशे पड़ी हुई है. 

और शक्तिसिंह दोनों हाथ जोड़े अपने घुटने पर बैठा हुआ है. शक्तिसिंह…एक भावुकता भरी आवाज  Maharana Pratap के मुख से निकल पड़ी. और शक्ति सिंह हाथ जोड़े अपने घुटने पर बैठा रहा. अच्छा हुआ तुम आ गए इस समय मैं पूरी तरह से असहाय हूँ, लहूलुहान हूँ, मेरे प्रिय चेतक की मौत ने मुझे जीते जी मार डाला है,इस समय मैं तलवार नहीं उठाऊंगा तुम अपनी इच्छा पूरी कर लो.

राणा ने चेतक की कमर में से जब अपना चेहरा उठाया तो शक्ति सिंह की चीख निकल गयी. नहीं भैया नहीं  मैं आपकी आँखों में आंसू नहीं देख सकता. राणा ने फिर गर्दन घुमा ली और फिर चेतक के शारीर से लिपट कर रोने लगे. 

राणा को रोते हुए देख शक्तसिंह भी रो पड़ा.उसने कहा भैया इस सब का जिम्मेदार मैं हूँ. आपसे प्रतिशोध लेने की भावना में मैं पागल हो गया था. यह कहकर शक्तिसिंह फूटफूट का रोने लगा. उसने तुरंत ही अपने आप को संभाला और और फिर राणा Maharana Pratap के पास जा कर कहने लगा मैं जनता हूँ की मैं क्षमा के योग्य नहीं हूँ परन्तु आप मुझे एक बार क्षमा कर दीजिये मुझे एक बार आप गले से लगा लीजिये….और शक्तिसिंह फिर रो पड़ा. 

प्रताप ने गर्दन उठाई उनका चेहरा खून और आसुओं से सना था. तुम मेरे ही नहीं पुरे मेवाड़ के अपराधी हो शक्ति सिंह तुमने अपने मातृभूमि के साथ विश्वासघात किया है. अब मैं तुम्हारी आँखों में प्रायश्चित के आंसू देख रहा हूँ. 

जी करता हूँ की अपने छोटे भाई को गले लगा लूँ. परन्तु यह क्षत्रिये धर्म मुझे इसकी अनुमति नहीं देता है, मैं मेवाड़ी सिपाही हूँ और तुम मेवाड़ द्रोही शत्रु सैनिक. यह कहकर राणा ने गर्दन घुमाई और फिर शक्तिसिंह को देखे बगैर ही बोले शक्तिसिंह तुम मेरी नजरों से दूर हो जाओ मैं नहीं चाहता की मेरे मन में कोई कमजोरी उभरे . 

मैं जा रहा हूँ भैया. शक्ति सिंह ने भाववेग से थर्राते हुए कहा- बस मेरा एक निवेदन मान लो मेरा ये घोड़ा लो और तुरंत ही यहाँ से दूर चले जाओ. आपको मेवाड़ की जरुरत है. आप यह युद्ध हारे नहीं है केवल ऐसी परिस्थिति आ गयी है की युद्ध को रोकना पड़ रहा है. 

और आब आपके चरणों की सौंगंध है की मेरी ये तलवार अब मेवाड़ के साथ होगी. अपनी करनी से मैं अपने पर लगे इस्कलांक को धो डालूँगा और अगर जिविर्ट बचा तोह आपके गले लगूंगा. 

प्रताप सिंह शक्तिसिंह की बातें सुनते रहे. उनके आँखों से बहते हुए आंसू उनके चेहरे पर लगे हुए खून को धोते रहे. परन्तु शक्तिसिंह अब ये नहीं देख पाया था की अब जो आंसू राणा की आँखों से बह रहे थे वो अपने छोटे भाई के लिए थे,परन्तु वह रे क्षत्र्ये धर्म, उस क्षत्रिये शूरवीर राणा ने अपने भाई से वो आंसू छुपा लिए और धर्म तथा भाई में से धर्म को ज्यादा महत्त्व देकर धर्म को विजय स्थापित किया. 

राणा ने अपने आप को संभाला वे उठे शक्तिसिंह का घोड़ा ले लिया , शक्तिसिंह नजरें झुकाए खड़ा रहा उसके आँखों में प्रायश्चित के आंसू बह रहे थे. मैं तुम्हारा ये एहसान कभी नहीं भूलूंगा शक्तिसिंह, तुमने मुझ अर्धमूर्छित की जान लेने वाले मुग़ल सैनिक को मार कर मेरी जान बचाई है और अभी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए अपना घोडा दे रहे हो.

मेवाड़ याद रखेगा तुम्हारी ये भूमिका. राणा तुरंत घोड़े पर सवार हुए, उनके चरण छूने के लिए शक्तिसिंह ने हाथ आगे बढ़ाये पर तबतक राणा घोड़े की ऐड ले चुके थे. वायुवेग से घोड़े दौडाते हुए राणा कुछ ही समय में शक्तिसिंह की आँखों से ओझल हो गए.

युद्ध की समीक्षा और अकबर द्वारा मेवाड़ को पूरी तरह से कब्जे में लेना

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: अपने भाई मेवाड़ के  Maharana Pratap सिंह को अपना घोड़ा देने के बाद शक्तिसिंह नदी तैर कर नदी पार की और किसी तरह से छुपता छुपाता मुग़ल छावनी तक पहुंचा. जब वहां पहुंचा तो शक्तिसिंह ने देखा की चारों तरफ अफरातफरी मची हुई है “ Maharana Pratap भाग गया  Maharana Pratap भाग गया…” का शोर हर तरफ था. 

परन्तु किसी के भी चेहरे में जीत की ख़ुशी नहीं थी.  Maharana Pratap और उनके वीर सैनिकों ने युद्ध भूमि में जो कौशल दिखाया था उसके कारण उनके छावनी में एक कौतुहल सा मचा था. 

सभी मुग़ल सैनकों के चेहरों में  Maharana Pratap का आतंक साफ़ साफ़ नजर आ रहा था..  Maharana Pratap का युद्ध से सकुशल निकल जाने से उन्हें दो सन्देश मिले थे, एक तो वे  Maharana Pratap को नहीं जीत सके जिसके कारण सागर सी विशाल मुग़ल सेना के मुख में एक जोरदार तमाचा पड़ गया था,  Maharana Pratap ने ना केवल वहां से निकल कर दिखाया अपितु अपने विचित्र रण कौशल से असीम बहादुरी का परिचय भी दिया था जो की शत्रुओं के दिल में दहशत का कारण बन बैठा था. 

और दूसरा ये था की उन्हें मन ही मन ये भय सता रहा था की कहीं फिर से  Maharana Pratap अपने मुट्ठी भर सैनिकों को लेकर ना आ जाए और अपने घोड़े के तापों तले हमें रौंद डाले. 

शहजादा सलीम का दिमाग चकरा गया. उसकी समझ में नहीं आ रहा था की इतना बड़ा करिश्मा हुआ कैसे. इतने कम सैनिको के साथ घोड़े पर सवार  Maharana Pratap ने तीन दिन तक मुगलों की एक लाख वाली सेना को बुरी तरह से रौंद डाला. 

मुग़ल सेना के बीचोबीच पहुँच कर उसने राजा मानसिंह, स्वयं उसे और लगभग सभी मुग़ल सरदारों को चुनौती दी और जब वह इतनी बुरी तरह घायल हो गया और उसके सभी बहादुर साथी मारे गए तब मुग़ल सेना के व्यूह को चीरता हुआ वह घायल राणा युद्ध स्थल से सुरक्षित बहार निकल गया? उसके पास एक घोडा और एक तलवार के अलावा और कुछ भी नहीं बचा था. 

इतनी घायल स्थिति में तो बाख कर कोई भी नहीं निकल सकता था फिर ऐसी हालत में ये चमत्कार हुआ कैसे. शहजादा सलीम, मानसिंह और उसके सरदारों के साथ बैठ कर युद्ध की तहकीकात कर रहा रहा था. 

तब तक कुछ सैनिक वहां आ पहुंचे और और शहजादे सलीम को यह सूचना दी की शक्तिसिंह को मुग़ल छावनी में देखा गया है. उसे उसी दिशा से आते देखा गया है जिधर राणा भगा था. शहजादे सलीम को शक्तिसिंह में शक हुआ. 

उसके पास पहले से ही एक सूचना थी की  Maharana Pratap के युद्ध स्थल से भाग जाने के बाद शक्तिसिंह भी अपने घोड़े में बैठ कर वहां से गायब हो गया था. कुछ ही समय में शहजादे सलीम के पास दो सैनिक आ गए और उन्हें सूचना दी की यहाँ से कुछ दूर में राणा Maharana Pratap के घोड़े का शव पड़ा है और पास में ही दो मुग़ल सैनिकों के कटे हुए सर भी पड़े है, यह सुनते ही शहजादा सलीम क्रोध से पागल हो उठा. 

उसने तुरंत ही शक्तिसिंह को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया.  मुग़ल सैनिकों ने शक्तिसिंह को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के समय शक्तिसिंह ने एक बहादुर राजपूत की तरह आगे बढ़ कर मुग़ल सैनिकों के हत्या का अभियोग स्वीकार किया. 

शक्तिसिंह का उत्तर सुनकर सलीम का सिर घूम गया.  वह यह निष्कर्ष में पहुंचा की यदि आज शक्तिसिंह ने घयाल  Maharana Pratap की रक्षा नहीं की होती तो आज Maharana Pratap मुग़लो की गिरफ्त में होता. राणा Maharana Pratap की जीवित बाख जाना मुगलों की हार थी. 

हल्दीघाटी का युद्ध जीत कर भी वो हार गए थे और वे अच्छी तरह से जानते थे की यदि  Maharana Pratap जीवित बाख गए है तो वे चुचाप बैठने वाले नहीं है. इस जीत को मुग़ल अपनी अंतिम जीत नहीं कह सकते थे. शक्तिसिंह का अपराध को संगीर्ण अपराध माना गया. उसे मुग़ल दरबार में विद्रोह की संज्ञा दी गयी तथा अंतिम निर्णय तक कैद में रखने का आदेश दे दिया.

शक्तिसिंह के घोड़े पर सवार राणा Maharana Pratap दूर पहाड़ियों में पहुंचे. वहां उन्हें वफादार भील मिल गए. भीलों ने  Maharana Pratap को एक गुप्त गुफा में ले गए. वहां उनके चिकित्सा और देखभाल की पूरी व्यवस्था कर दी. 

और स्वयं हाथों में बाण लेकर दूर दूर तक बिखर गए और मुग़ल सेना की गतिविधियों पर नजर रखने लगे. कई दिनों की चिकित्सा और देखभाल के बाद  Maharana Pratap के घाव भरने शुरू होने लगे. वे गुफा में बैठे सोच रहे थे –कितना भयानक और विनाशकारी युद्ध था. 

तीन दिन के युद्ध ने 20 हजार सैनिकों में से 14 हज़ार सैनिकों को निगल गया, मेरे सभी महत्वपूर्ण स्तम्भ मेरी रक्षा के लिए अपना प्राण न्योछावर कर दिए. जब उन्होंने चेतक के बारे में सोचा तो वो उसी समय फूट फूट कर रो पड़े , वे सोचने लगे की पता नहीं कौन सा मंत्र झालापति ने चेतक के कानो में फूंका की चेतक अपनी मौत से झूझ कर मेरी रक्षा हेतु वायुवेग से दौड़ पड़ा, उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था की चेतक दौड़ रहा है या वायु में उड़ रहा है, उसकी छलांग देख कर शत्रु के माथे भी पसीने आ जाये. 

अपने युद्ध की समीक्षा करते करते  Maharana Pratap भावुक हो गए. फिर उन्हें शक्तिसिंह का ध्यान आया- वे सोचने लगे की अगर शक्तिसिंह वहां सही समय पर ना पहुंचा होता तो उनका बचना तो लगभग असंभव था. 

शक्तिसिंह को गद्दार कहूँ या मेवाड़ का रक्षक…आज जो मेवाड़ पति राणा Maharana Pratap इस गुफा में बैठा है वो केवल शक्तिसिंह के कारण ही. वो इस बात से बहुत दुखी थे क्योंकि इस युद्ध में राजपूत ही दुसरे राजपूत से लड़ा था. 

यह अकबर की ही निति थी की राजपूतों को राजपूतों के विरुद्ध लडवाया जाए. ये सब सोचते सोचते सोचते राणा Maharana Pratap को एकाएक अपने हार की एक और कारण याद आया वो था तोंपो का प्रहार जिसके कारण राजपूत सैनिकों के पाँव उखड़ गए थे. 

भीलों के विष बुझे तीरों ने मुगलों को पीछे हटने में मजबूर कर तो दिया था पर जब उन्होंने तोंपो का इस्तेमाल किया तब हम कमजोर पड़ गए थे काश अगर हमारे पास भी कुछ तोंपे होती तो आज युद्ध का परिणाम कुछ और ही होता. ये सब सोचते सोचते  Maharana Pratap को गश आ गया,उनके घाव अभी पूरी तरह से भरे नहीं थे. मन में आया तनाव पुरे शारीर में दुष्प्रभाव छोड़ सकता था.

उधर मानसिंह ने अकबर को मुगलों के जीत का समाचार दे दिया.  जब अकबर ने युद्ध से लौटे सैनिकों की समीक्षा की तो उसे ये भरोसा हो गया की वो केवल नाम का ही युद्ध जीता है  Maharana Pratap का आतंक उनके चेहरे में से साफ़ साफ़ नजर आ रहा था. 

उन्हें देख के लग रहा था की मुग़ल सैनिक शत्रु के बंदीगृह से लौटे है और वहां उन्हें खूब पीटा गया है. गुप्तचरों ने अकबर को सूचना दी की युद्ध में चौदह हज़ार सैनिको के मारे जाने के बावजूद राजपूतों में उत्साह भरा पड़ा है, उन्हें इस बात की बेहद ख़ुशी है की उनका  Maharana Pratap सही सलामत जीवित बच गया है.

अकबर को पता था की अब राजपूत तोंपो का इस्तेमाल करेंगे जिनके कारण उन्हें भारी क्षति पहुंची है. इसलिए वह तुरंत ही अजमेर पहुंचा और अजमेर से मोहि पहुंचा. उसने मोही में गाजी खां को तैनात किया, उसके साथ शरीफ अटका मुजाहिद्दीन खां और शुभान अली तुर्क को छोड़ा तथा तीन हज़ार का लश्कर दिया. मोहि से अकबर गोगुदा पहुंचा वहां का दायित्व उसने राजा भगवानदास और कुत्तुब्बुद्दीन मोहम्मद खां को सौंपा. 

शाह फक्रुद्दीन तथा जगन्नाथ कछावा को उदयपुर में तैनात किया . इस प्रकार से अकबर ने स्वयं मेवाड़ क्षेत्र में पहुंचकर लगभग पुरे मेवाड़ को अपने कब्जे में ले लिया. कुछ जंगल और पहाड़ियां ही बचे थे जिनमे  Maharana Pratap छिपे थे. 

अब भी  Maharana Pratap का आतंक मुग़ल सेना में इतना था की उन पहाड़ों व् जंगलों को घेरकर, मुग़ल सेना राणा पर हमला करने को तैयार नहीं थी, जहाँ  Maharana Pratap छुपा था. मुग़ल सेना में ये डर था की कहीं अभी Maharana Pratap गोरिल्ला युद्ध कर उन्हें गाजर मूली की तरह ना काट डाले. 

कुछ दिनों तक स्वयं अकबर अपने विशाल शाही फ़ौज के साथ मेवाड़ पर ही रहा. और उसके जाने के साथ ही  Maharana Pratap ने प्रत्याक्रमण कर धीरे धीरे मेवाड़ का अधिकतर भो भाग को मुगलों से आजाद करवा लिया.

 Maharana Pratap का संघर्षपूर्ण जीवन

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: अकबर लगभग पुरे मेवाड़ पर अपना अधिपत्य जमा चूका था. और राणा Maharana Pratap के पास बहुत बड़ी चुनौती थी. पर राणा Maharana Pratap ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को भी बड़ी ही सरलता के साथ पूरा करते गए, एक एक करके  Maharana Pratap ने अपनी मातृभूमि को मुगलों के चंगुल से स्वतंत्र कराते गए. 

जब ये बात अकबर को पता लगी तो उसे जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हल्दीघाटी के इस विशाल युद्ध में जिस तरह से Maharana Pratap और उनके वीरों ने अपना शोर्य दिखाया था उससे तो ये स्पष्ट ही था की मेवाड़ में मुग़ल सेना ज्यादा दिन तक टिक नहीं सकती है. अतः मेवाड़ को जीतने के स्थान में अकबर ने सदा राणा को पकड़ने के लिए दबदबा बनाये रखा. राणा के बहादुर साथी और भील सदा ही उनकी रक्षा अपने प्राणों पर खेल कर करते रहे. उन दिनों आगरे के किले में नौ रोज का मेला लगा करता था. 

उस मेले की विशेषता यह थी की उसमे केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती थी. भारत के विभिन्न हिस्सों की विशेष चीजे इस मेले बिक्री के लिए आती थी. परन्तु बेचने और खरीदने वाले पुरुष नहीं होते थे, स्त्रियाँ ही इस मेले का सारा दायित्व संभालती थी. 

मुग़ल सम्राट अकबर ही एक मात्र ऐसा पुरुष था, जो इस मेले में घूमने के लिए स्वतंत्र था. इस समय तक अपनी आपसी फूट और कमजोरियों के कारण प्रायः सभी राजपूत राजा अपने छोटे छोटे राज्यों को मुग़ल सामराज्य के अधीन कर चुके थे और अकबर के प्रति दासता के भाव में उनमे हीनता उत्पन्न कर दी थी. 

प्रति वर्ष इस मेले में अनेक राजपूत स्त्रियों का मान हनन होता था. राजपूतों में अनेक बार इस मेले को लेकर चर्चा हो चुकी थी, परन्तु वे इस मेले को लेकर खुल कर आलोचनाएं नहीं कर पाते थे. इसे बंद कराने की इच्छा हर राजपूत को थी पर इसे बोलने का साहस कोई नहीं जुटा पता था. 

एक बार सम्राट अकबर ने दरबार के कवि महाराज पृथ्वीराज की पत्नी जोशाबाई के साथ मेले में अभद्र व्यवहार करने का प्रयत्न किया, वह सतिव्रता स्त्री ये सब सहन ना कर सकी और उसने पूरी घटना अपने पति को बताने के बाद रात में आत्महत्या कर ली. 

जोशीबाई की आत्महत्या का समाचार जंगल की आग की तरह सारे राज्पूतो में फ़ैल गया और देखते ही देखते राजपूत भड़क उठे. राजपूत के आक्रोश को समझकर अकबर चौकन्ना हो गया और उसने तुरंत ही मेले को सदा के लिए बंद करवा दिया. मेले के बंद होने से राजपूतों ने राहत की सांस ली,परन्तु सम्राट अकबर की कूटनीति, राजपूतों की शक्ति से राजपूतों को तबाह करने और मुग़ल साम्राज्य की नींव को मजबूत करने की योजना को वो पूरी तरह से समझ चुके थे. 

उनमे से अनेक ऐसे थे, जो मेवाड़ केसरी  Maharana Pratap के विरुद्ध हल्दीघाटी का युद्ध लड़ चुके थे. अनेक ऐसे थे,जिन्होंने राजपूतों के एकमात्र आशा स्तम्भ  Maharana Pratap को कमजोर करने में अकबर का साथ दिया था. जोशीबाई आत्महत्या काण्ड ने ऐसे राजाओं की आत्मा को झकझोर दिया था और वे अपने आप को अकबर को सहयोग देने और  Maharana Pratap को हानि पहुँचाने के लिए दोषी माननें लगे थे.

उधर  Maharana Pratap हल्दीघाटी की युद्ध में अकबर की नींद को उदा देने के बाद बिठुर की जंगलों में जा छिपे थे. उनके परिवार को उनके पास सुरक्षित बुला लिया गया था. उनकी स्थिति बहुत ही दैन्य हो गयी थी, जंगलों में मुग़ल सैनिकों से बचते बचाते वे अनेक प्रकार का कष्ट झेल रहे थे. 

उन्हें सबसे ज्यादा कष्ट तब होता था जब उनकी जान बचाने के लिए कोई आगे बढ़कर अपनी जान दे देता था. हल्दीघाटी की युद्ध के बाद अकबर की नींद उड़ गयी थी . उसे डर था की समस्त राजपूताने के राजपूत के दिल में कहीं राणा Maharana Pratap के लिए प्यार और इज्जत ना पैदा हो जाये. 

हल्दीघाटी का रण कौशल ने Maharana Pratap का पद ऊँचा कर दिया था, उस समय की स्थिति ऐसी हो गयी थी की राजपूताना ही नहीं बल्कि समस्त भारतवर्ष  में राणा Maharana Pratap और उनके वीर चेतक की गाथा सुने जाने लगी थी, कवि राणा Maharana Pratap की वीरता में कविता लिखने लगे थे, स्त्रियाँ राणा Maharana Pratap की वीरता और शोर्य के गीत गाने लगी थी, देश का माहौल में अजीब सा बदलाव नजर आने लगा था, इस बदलाव में राणा Maharana Pratap की तरह भारतवासी गुलामी की बेड़ियों से आजाद होकर स्वाधीन होने के सपने देखने लगे थे.

बच्चे मेवाड़ के पराक्रम को बड़े ही ध्यान से सुनने लगे थे, जगह जगह नाट्य रूपांतरण के द्वारा  Maharana Pratap की शूरवीरता को दर्शाया जाने लगा और अकबर को धोखे से छलने वाला, कपटी और धूर्त बताने लगे थे. असहाय और साधनहीन  Maharana Pratap अपनी तथा अपने परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए भीलों की मेहरबानी पर दिन काट रहा था और अकबर उसे जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिए भीलों की टोली को जंगल जंगल भेज रहा था. 

मुग़ल सैनिक  Maharana Pratap के नाम से थर्राते थे. परन्तु अकबर के आदेश के आगे विवश थे. अनेक सैन्य टुकड़ियाँ विभिन्न जंगलों में राणा Maharana Pratap की टोह में लगी थी. राणा Maharana Pratap की सुरक्षा के लिए भील अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिए थे. 

अनेक बार ऐसे अवसर भी आये की कई बार मुग़ल सैनिक टोह लेते लेते राणा Maharana Pratap के बिलकुल ही पास आ पहुंचे और छापामार कर बस उन्हें पकड़ने ही वाले थे की सही वक़्त पर भीलों की टोलियाँ ने उन्हें आगे बढ़कर चुनौती दी. 

मुग़ल सैनिक के साथ मुठभेड़ में अनेक भीलों ने अपनी जाने गँवा दी और राणा Maharana Pratap को अपने छिपने के स्थान से भाग जाने का अवसर प्रदान किया.  भीलों की कुर्बानियों के कारण राणा Maharana Pratap का मन बुरी तरह से दुखी हो गया. ऊपर से उनकी पत्नी तथा बच्चों के शारीर भूख का ताप सहते सहते सूख कर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गए थे. 

मन के साथ साथ  Maharana Pratap का शरीर भी टूटने लगा था. उनकी समझ में नहीं आ रहा था की क्या करे. जंगलों में छिप कर रहने से उनकी बहरी दुनिया से संपर्क बिलकुल ही टूट गया था. उनके परिवार के अन्य सदस्यों का भार भीलों ने विभिन्न स्थानों में उठाया हुआ था. 

राणा तक यह समाचार बराबर पहुँच रहे थे की मेवाड़ की जनता अपने राणा पर गर्व करते है, वे अपने राणा पर अपना तन मन धन सब कुछ न्योछावर करने को तैयार है, किन्तु कंदराओं में छिप कर जनत अक सहयोग कैसे लिया जा सकता था. राजपूत जाति के बिखराव और पतन में कोई कमी नहीं रह गयी थी. 

स्वयं  Maharana Pratap के भाई और भतीजे विरोधी खेमे में चले गए थे. अनेक राजपूत आकबर की अधीनता को स्वीकार कर चुके थे. इन्ही राजाओं की शक्ति के कारण अकबर ने राणा को चारों ओर से घेर रखा था. कई राजपूत राजाओं ने मेवाड़ के कई हिस्सों में अपना अधिकार  जमा लिया था. 

लगभग पूरा मेवाड़ फिर से अकबर के अधीन हो चूका था. ऐसे में राणा Maharana Pratap के सब्र का बाँध टूट गया.  Maharana Pratap की पत्नी ने किस तरह घास-पात एकत्रित की, उनसे कुछ रोटियां बनाई और कई दिनों से भूखे दोनों बच्चों के सामने रख दी. इतने में जंगल से एक बिलाव आया और बच्चों के आगे से रोटियां उठा के ले गया. अब किसी भी तरह से रोटियां नहीं बनाई जा सकती थी और बच्चे भूख से बिलख रहे थे. बच्चों को रोता देख पत्नी भी दुखी हो गयी.

पृथ्वीराज द्वारा  Maharana Pratap को प्रोत्साहित करना

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: अपने बच्चों को भूखा देखकर अब राणा Maharana Pratap का धैर्य टूट गया था. उन्होंने सोचा की वो तो भूखा रह सकते है परन्तु अपने बच्चों को भूखा नहीं देख सकते है. इस विचार से उन्होंने तुरंत अकबर को एक संधि पत्र लिख डाला. और अपने अनुचर के हाथों अकबर के पास भेजवा दिया. 

अपनी पत्नी जोशाबाई की मृत्यु के पश्चात् पृथ्वीराज बहुत परेशान रहने लगा था. उसका मन होता था की किस तरह बस  Maharana Pratap के पास पहुँच जाए और एक सच्चे राजपूत की तरह अकबर से बदला लिया जाए,परन्तु स्थितियां इतनी प्रतिकूल थी की राजपूतों को अकबर की दया पर जीना पद रहा था. 

राजपूतों का एकमात्र आशा दीप राणा Maharana Pratap अकबर के प्रकोप से बचने के लिए जंगल जंगल भटक रहा था. ऐसे में अकबर से बदला लेना असंभव था और बदला लिए बगैर पृथ्वीराज का मन उसे चैन से सांस लेने नहीं दे रहा था. 

उसका मन अकबर से विद्रोह के लिए चीत्कार रहा था. मन के चीत्कार को दबाते हुए उसने शाही दरबार में प्रवेश किया. अकबर के सामने झुककर सलाम किया और आसन पर बैठ गया. उसने देखा की मुग़ल सम्राट आज कुछ ज्यादा ही खुश है. 

सब दरबारी जब अपने अपने आसन पर बैठ गए तो अकबर ने ये घोषणा की कि राणा Maharana Pratap ने हमें संधि भेजा है. सारे दरबारी आश्चर्य से देखने लगे, दरबार में कौतुहल का माहौल बन गया, सब कहने लगे असंभव ये नहीं हो सकता….ये तो अनहोनी हो गयी. 

क्षण भर में ही अनेक प्रतिक्रियां दरबार भर में गूँज गया. अकबर को अपने कानो पर विश्वास करना मुस्किल हो रहा था, दरबार में ये पहली बार हुआ था की दरबार की मर्यादा को भूल सभी दरबारी बस अपनी प्रतिक्रिया देते चले गए. कूटनीतिज्ञ अकबर ने संक्षिप सी घोषणा करने के बाद एक एक करके सभी दरबारियों का चेहरा देखा. 

राजपूतों के चेहरे में आये भावों को पढ़कर अकबर दहल गया.अधिकांश राजपूत के चेहरे टन गए, कुछ राजपूत उदास हो गए और उनमें से कुछ झूठी प्रसन्नता के भाव व्यक्त करने लगे, जाहिर सी बात है की यह समाचार सुनकर उन्हें ख़ुशी नहीं हुई थी.  

संधि पत्र की बात सुनकर पृथ्वीराज घम्भीर हो गए थे, राजा पृथ्वीराज के सीने में एक हुक सी उठी जिसे दबाने के लिए वे पूरी शक्ति से प्रयास कर रहे थे. उसी समय अकबर ने राजा पृथ्वीराज को टोक दिया आपका क्या मत है राजा साहब? पृथ्वीराज अपने आसन से उठे और बोले असंभव जहाँपनाह……मुझे तो लगता है संधि पत्र जाली है.. Maharana Pratap संधि पत्र लिख नहीं सकते है. 

क्यों राणा भी आखिर एक इंसान है इतने दिनों तक कष्ट सहते सहते तंग आ गए होंगे. उनके पास मुग़ल सल्तनत से टकराने के लिए बचा ही क्या है. अकबर ने य्दयापी सच बात बोली थी,परन्तु ये बात राजपूतों को अच्छी नहीं लगी. पृथ्वीराज तो अकबर की बात से बौखला गए और बोले – Maharana Pratap कोई साधारण इंसान नहीं है…वे सिर झुकाने की बजाये सिर कटाने में विश्वास रखते है. 

अकबर मुस्कुराया और कहा आपकी बात में दम है राज साहब..हम सब लोग आपसे इत्तेफाक रखते है परन्तु एक बात तो आप मानेगें ना की मुग़ल सल्तनत से हाथ मिलाने का अर्थ सिर झुकाना नहीं बल्कि सिर उठा कर साथ साथ चलना है, ये हम सब का ही तो सल्तनत है. 

राजा पृथ्वीराज का पारा चढ़ा हुआ था वो चुप नहीं रह सके उन्होंने कहा की – Maharana Pratap एक अलग किस्म के इंसान है मुझे नहीं लगता है की ये संधि पत्र उनका है अगर आपकी इजाजत हो तो मैं स्वयं इसकी तहकीकात करना चाहूँगा. “इजाजत है“- आप अपने स्तर से तहकीकात कीजिये और सच्चाई जानकर हमें ज्ञान दीजिये. 

इतना कहकर अकबर उठ गया. जो कुछ भी दरबार में हुआ उससे उसका मन खिन्न हो गया. परन्तु वो इतना घम्भीर व्यक्ति था की अपनी मन की खिन्नता किसी के सामने जाहिर नहीं होने दी. 

राजा पृथ्वीराज सीधे घर पहुंचा और उन्होंने  Maharana Pratap को कवि की मार्मिक छंदबद्ध लम्बा पत्र लिखा और  Maharana Pratap के पास भिजवा दिया. उन दिनों Maharana Pratap के भाई शक्तिसिंह मुगलों के गिरफ्त से भागकर राजपूत बहुल क्षेत्रों में चले गए थे और अकबर के अधीन राजपूत क्षेत्रों में घूम घूम कर  Maharana Pratap के नाम से सेना का गठन कर रहे थे. 

ऐसा जादू था  Maharana Pratap के नाम में की जो सुनता वह उनके लिए आगे बढ़कर सहयोग देने को तैयार हो जाता. गांव गांव घूम कर शक्तिसिंह ने Maharana Pratap के नाम से सेना का संगठन किया. मुगलों के अधीन किन सहारा का दुर्ग जीत लिया.  यद्यपि शक्तिसिंह को अनेक राजपूत बुजुर्गों की नाराजगी झेलनी पड़ी. 

शक्तिसिंह की करतूत के बारे मैं जिन्हें पता था वो पहली मुलाकात में ही शक्तिसिंह से बिगड़ जाता था परन्तु जब शक्तिसिंह अपने पश्चाताप की बातें बताता तब उन्हें विश्वास हो जाता था की जो उनके सामने खड़ा है वो  Maharana Pratap का विरोधी नहीं बल्कि Maharana Pratap के लिए शक्ति अर्जित करने वाला शेर दिल राजपूत है. 

उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए युवक और अधेड़ उम्र के व्यक्ति पुरे जोश और लगन के साथ आने लगे थे. शक्तिसिंह की केवल एक ही इच्छा थी की वे एक बड़ी सेना का गठन कर, अपने भाई राणा Maharana Pratap से मिले और उनसे उस सेना का नेतृत्व करा कर मुगलों से टक्कर लेने का निवेदन करें, परन्तु एक दिन शक्तिसिंह के कानो तक राणा Maharana Pratap की संधि की बात पहुंची शक्तिसिंह को अपने कानो में विश्वास नहीं हुआ वे बिलकुल भी नहीं चाहते थे की  Maharana Pratap अकबर के सामने झुके. 

वे तुरंत बिठुर के जंगलों की ओर चल दिए और पता लगाते लगाते राणा Maharana Pratap के पास जा पहुंचे. राणा Maharana Pratap के पास उस समय अनेक सरदार मिलने को आये हुए थे सभी उनसे यही निवेदन कर रहे थे की मुगलों से संधि कर वो अपने आप को छोटा ना करें. 

राणा के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे. ऐसे समय में शक्तिसिंह ने क्षमायाचना के बाद अपने दुर्ग और अपने सेना का पूरा विवरण Maharana Pratap सिंह को दिया और उनसे निवेदन करने लगे की वे इरादा बदल दे, अन्यथा राजपूतों का सूरज सदा के लिए डूब जायेगा. 

राणा Maharana Pratap भी पुरे मन से संधि के लिए तैयार नहीं थे, परन्तु युद्ध के लिए जितनी तैयारी की आवश्यकता थी, वह सब जुटा पाना असंभव सा लग रहा था. बिना धन के इतनी बड़ी सेना का संगठन कैसे संभव था की मुग़ल सेना से टक्कर ली जा सके. 

उसी समय  Maharana Pratap को पृथ्वीराज का पत्र मिला.  Maharana Pratap ने बड़ी ही गंभीर मुद्रा में उस पत्र को पढ़ा- उस पत्र का आशय था यदि आप अकबर की अधीनता को स्वीकार कर लेंगे तो संसार से वीरता का इतिहास मिट जायेगा. 

सूर्य पश्चिम में उदय होने लगेगा और पूर्व दिशा में अस्त होने लगेगा. सब कुछ उलट पलट हो जायेगा. जिन राजपूतों ने अकबर के सामने घुटने टेक दिए है, सच्चाई तो ये है की वे राजपुत भी नहीं चाहते की Maharana Pratap सिंह अकबर के सामने घुटने टेके. 

अंत में पृथ्वीराज ने लिखा की – अंत में मुझे ये बताये की मैं अपनी मुछे ऊँची रखु या कटवा डालूं, और राजपूतों की विवशता पर अपना माथा ठोक लूँ? पत्र पढ़ते पढ़ते  Maharana Pratap का मुख लाल हो गया. उनकी बाँहें फड़कने लगी उनके मस्तक में एक नई सी चमक आ गयी. 

वे खड़े हो उठे और कहने लगे नहीं नहीं मैं कभी नहीं झुकूँगा, Maharana Pratap सिंह को ये कहते सुन सबके चेहरे में फिर से चमक आ गयी. उसके बाद Maharana Pratap अपने सभी साथियों के साथ एक नई सेना के गठन के मुद्दे पर विचार विमर्श करने में जुट गए. 

विचार विमर्श करने के बाद सभी लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे की नई सेना के गठन के लिए मेवाड़ के पास धन का आभाव है. ये एक बहुत बड़ी समस्या था की आखिर धन कहाँ से जुटाया जाए. धन के आभाव में ही राणा Maharana Pratap के सेना के कई सैनिक उनको छोड़ चुके थे.

भामाशाह का योगदान और  Maharana Pratap का विजय अभियान

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: भामाशाह चितौड़ के बड़े धनपति थे. उनके पास अपार धन सम्पदा थी, मुगलों के आक्रमण के बाद उन्होंने चितौडगढ़ का त्याग कर दिया था. कई वर्षों तक उन्होंने मुगलों से अपनी धन संपत्ति को छुपाये रखा. वे कई दिनों से राणा Maharana Pratap की तलाश में थे क्योंकि उन्हें पता था की राणा को युद्ध के लिए धन की आवश्यकता है. 

उनकी हार्दिक इच्छा थी की  Maharana Pratap उनका धन ले ले और एक मजबूत सेना का गठन कर मुगलों से अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराएँ. जब भामाशाह को राणा Maharana Pratap का पता चला तो वो तुरंत अपना सब कुछ लेकर राणा Maharana Pratap के पास जा पहुंचे, उन्होंने आग्रह किया की ये धन वो ले ले और एक सेना का संगठन कर मुगलों को मुंह तोड़ जवाब दे. 

भामाशाह का निवेदन को  Maharana Pratap ने अति संकोच के साथ स्वीकार किया. यह राशी इतनी बड़ी थी की इससे 5000 हजार सैनिकों को 12 वर्षों तक वेतन दिया जा सकता था. इतनी बड़ी राशी का योगदान देकर भामाशाह इतिहास में अपना नाम अमर करवा गए. 

 Maharana Pratap ने भी उनकी अपने मातृभूमि के लिए योगदान देने पर बहुत प्रसंशा किये. सबने भामाशाह का कृतज्ञता व्यक्त की सबके चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे . शक्तिसिंह के हृदय में युद्धोन्माद लहरे लेने लगा. 

भामाशाह से धन लेने के बाद राणा Maharana Pratap ने अपने सेना को संगठित किया. अनेक राजपूत राजाओं ने आगे बढ़कर राणा Maharana Pratap का सहयोग दिया. शक्तिसिंह ने भी अपने द्वारा संगठित सैन्य शक्ति राणा Maharana Pratap को दे दी. 

और अब वह राणा का वफादार सैनिक बन गया. राजा पृथ्वीराज ने अकबर से प्रतिशोद लेने के लिए अकबर का साथ छोड़ दिया और वे राणा Maharana Pratap से आकर मिल गए. राणा Maharana Pratap ने हमले कर मुगलों को कुमलमेर से खदेड़ दिया. पुरे कुमलमेर क्षेत्र में फिर से  Maharana Pratap ने कब्ज़ा कर लिया. मुग़ल सेना पहले ही राणा Maharana Pratap के गुरिल्ले युद्ध से आतंकित थी. जहाँ जहाँ Maharana Pratap ने दबाव बनाया वहां वहां मुग़ल सेना पीछे हटते चली गयी.

किनसहारा का किला अभी भी शक्तिसिंह के कब्जे में था. अकबर ने राजा मानसिंह को आदेश दे दिया की किनसहारा का किला को शक्तिसिंह से छीन लिया जाए.मानसिंह ने महाबत खान को बुलाकर उसे 10 हजार सैनिक दिए और शक्तिसिंह पर आक्रमण करने को कहा. 

महाबत खान ने किनसहारा किला पहुँच कर शक्तिसिंह को चुनौती दी उस समय शक्तिसिंह केवल 1 हज़ार सैनिको के साथ किले की रक्षा कर रहा था. महाबत खान ने किले की घेराबंदी कर दी और आशा कर रहा था की रसद खत्म होने पर शक्तिसिंह अपनी सेना लेकर किले से बाहर निकलेगा, तब उसे मार गिराया जायेगा. 

परन्तु शक्ति सिंह ने हार नहीं मानी. शक्तिसिंह ने तुरंत ही  Maharana Pratap के पास खबर भिजवा दी. महाबत खान ने दुर्ग के पूर्व की दिवार तोड़ डाली और उसकी सेना किले में घुसने की तयारी करने लगी. 

शक्तिसिंह ने मुकाबला करते हुए मरने का फैसला कर लिया था. परन्तु ठीक उसी समय  Maharana Pratap की जयजयकार शक्तिसिंह के कानो तक पहुंची, शक्तिसिंह बिना समय गंवाए आक्रमण का आदेश दे दिया. उसी समय Maharana Pratap की सेना भी पिछे से पहुँच गई. 

दोनों सेनाओं ने मिल कर महाबत खान की सेना को घेर लिया. मुग़ल सेना दो पाटों के बीच फंस गयी. महबत खान को कैद हो गई. जब उसे  Maharana Pratap के सामने लाया गया तो उन्होंने महबत खान को छोड़ दिया. इस प्रकार से किनसहारा का किला बच गया. इस युद्ध में मुगलों के 10 हजार सैनिकों में से 8 हजार सैनिक मारे गए. राणा के विपुल युद्ध सामग्री हाथ लगी .

राणा Maharana Pratap ने अपनी बहादुरी और जन सहयोग से अकबर द्वारा जीता गया लगभग सारा क्षेत्र फिर से जीत लिया. अपनी सेना को आधूनिक साज सामग्री से युक्तकर,  Maharana Pratap ने कुम्भलगढ़ को अपना केंद्र बना लिया.

अकबर ने अक्टूबर 15,1577 को शाहबाज खां के नेतृत्त्व में एक विशाल सेना कुम्भाल्गढ़ में आक्रमण के लिए भेजा. ऐसा माना जाता है की राजा मानसिंह और भाग्वान्तदास को इस युद्ध से दूर रखा गया था क्योंकि उनके मन में राणा Maharana Pratap के लिए सहानुभूति थी. 

राजपूत के सिरमौर Maharana Pratap को अधिक सताए जाने के कारन ये राजपूत अकबर के विरुद्ध होने लगे थे, परन्तु अकबर की आँखों में Maharana Pratap चुभ रहे थे. अकबर का पक्का विश्वास था की Maharana Pratap के रहते मुग़ल सल्तनत सुरक्षित नहीं था. Maharana Pratap के नेतृत्व में वह जादू है की राजपूत कभी भी उसके पिछे खड़े हो सकते है. 

अतः वह बड़ी ही सावधानी से Maharana Pratap को कमजोर करने में लगा था. कुम्भलगढ़ के युद्ध में Maharana Pratap ने तोंपो का भी इस्तेमाल किया था. ऐसा उल्लेख मिलता है की शाहबाज खां हर कोशिश करके हार गया परन्तु Maharana Pratap के तोंपो का जवाब नहीं दे पाया. 

हर संभव प्रयास के बाद भी वह किले पर कब्जा नहीं कर पाया. अंत में उसने एक चाल चली उसने Maharana Pratap के तोंपो के बारूद में शक्कर मिला दी जिससे की तोंपो के टुकड़े टुकड़े हो गए. और मुग़ल सेन Maharana Pratap के सेना में हावी हो गयी. एक बार फिर Maharana Pratap को करारी हार का मुंह देखना पड़ा. राणा Maharana Pratap किला छोड़ कर,परशुराम महादेव के मार्ग से रणकपुर चले गए और वहां से चावंड जा पहुंचे. 

प्रताप के सुरक्षित पहुँचने तक राजपूतों ने किला का दरवाजा नहीं खोला और फिर फाटक खोल दिया. फाटक के खुलते ही मुग़ल सेना किले में  प्रवेश कर गयी..बचे हुए राजपूत मुग़ल से भीड़ गए..एक एक राजपूत कई कई मुगलों को मारकर वीरगति को प्राप्त किया. 

अप्रैल 1578 को कुम्भलगढ़ का दुर्ग शाहबाज खां ने जीत लिया. किला जीतकर शाहबाज खां ने उसे गाजी खां को दे दिया और स्वयं उसने कई मोर्चे बनाकर उदयपुर, गुगुन्दा, चावंड आदि के क्षेत्र को जीते. शाहबाज खां ने लगभग पूरा मेवाड़ को राणा Maharana Pratap से फिर से छीन लिया और राणा को अपने महत्वपूर्ण पहाड़ियों के क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा. मेवाड़ विजय के बाद मई 1578 में शाहबाज खां वापस चला गया. शाहबाज खां के लौटते ही राणा Maharana Pratap ने तुरंत हमले आरंभ कर दिए और कुंभलगढ़ को छोड़ कर सारा क्षेत्र फिर फिर से मुगलों से छीन लिया. 

11 नवम्बर, 1579 को शाहबाज खां ने फिर से मेवाड़ पर चढ़ाई की, परन्तु इस बार उसका उद्देश्य केवल  Maharana Pratap को कैद करना था. उसने अपनी पूरी फ़ौज Maharana Pratap के पीछे लगा दी. Maharana Pratap ने बड़ी ही चतुराई से अपना बचाव किया. 

जन-सहयोग के कारण शाहबाज खां राणा Maharana Pratap को बंदी नहीं बना पाया. कभी भील उनकी सुरक्षा में अपनी जान अड़ा देते थे तो कभी राणा के चाहने वाले उनके सुरक्षा में मदद करते थे. मुग़ल सेना ने हर पहाड़ी का चप्पा चप्पा छापा मारा परन्तु राणा और उसके परिवार तक पहुँच ना सकी. अंत में निराश होकर उसने वापस लौटने का निश्चय कर लिया. मई 1580 को अकबर ने शाहबाज खां को वापस बुला लिया. 

बाद में शाहबाज खां से अकबर ने अजमेर की सूबेदारी वापस ले ली और अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का सूबेदार बना दिया. अब मेवाड़ में सैनिक करवाई का दायित्व खानखाना पर आ गया. अब  Maharana Pratap फिर सक्रीय हो गए. उन्होंने अनेक हमले कर कुंभलगढ़ सहित सम्पूर्ण पश्चिमी मेवाड़ पर कब्ज़ा कर लिया.

5 दिसम्बर 1584 को एक बार फिर जगन्नाथ कछावा ने राणा Maharana Pratap को घेरा. इस बार का उद्देश्य राणा Maharana Pratap को गिरफ्तार करना था, उसने पुरे पर्वतिये क्षेत्र में  Maharana Pratap का पीछा किया, परन्तु गिरफ्तार करने में असमर्थ रहा. 

इस प्रकार हल्दीघाटी के प्रसिद्ध युद्ध के बाद अकबर ने अनेक आक्रमण किये अनेक चाले चली परन्तु वह  Maharana Pratap के लिए परेशानी पैदा करने के अलावा और कुछ भी नहीं कर सका. न अकबर चैन से बैठा और ना ही उसने  Maharana Pratap को चैन की सांसे लेने दी परन्तु उसने अपनी सारी ताकते झोंक कर भी Maharana Pratap को अंतिम रूप से झुका ना पाया. 

अनेक संघर्षो और युद्धों के बाद बार बार मेवाड़ राज्य कई बार मुगलों के हाथों चला गया पर अंततः  Maharana Pratap ने मंडलगढ़ और चित्तौड़गढ़ को छोड़कर पुरे मेवाड़ में अपना अधिपत्य स्थापित कर ही लिया.

अकबर द्वारा युद्ध विराम की घोषणा

Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास: अब Maharana Pratap ने उदयपुर से 57 मील की दुरी पर स्थित चावंड में अपनी राजधानी स्थापित कर ली.1583 के बाद  Maharana Pratap का केंद्र स्थल चावंड नगर बन गया. 

अकबर जब सारे प्रयत्न कर के हार गया और उसे राणा Maharana Pratap को काबू में करने का कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वह बुरी तरह से बौखला गया. उसने मानसिंह को एकांत में बुलाया और स्थिति की गंभीरता पर विचार किया. 

मानसिंह ने अकबर को सूचित किया की राजपूत  Maharana Pratap पर बार बार आक्रमण करने की निति से प्रसन्न नहीं है.  Maharana Pratap ने बेमिसाल बहादुरी का परिचय देकर मुग़ल शक्ति को हर बार नाकामयाब कर दिया है. 

ऐसे बहादुर व्यक्ति की तबाही से राजपूत क्षुब्ध है. स्वयं मानसिंह ने राणा Maharana Pratap पर और अधिक आक्रमण ना करने की निति से सहमती जताई. अकबर समझ गया था की यदि राणा पर और अधिक हमले किये गए तो राजपूत बगावत पर उतर जायेंगे और जिस मंतव्य से राणा शेर की तरह डटा हुआ युद्धों की विभीषिका को झेलता रहा है उसमे वह कामयाब हो जायेगा. 

एक बार राजपूत उसके हाथ से निकल राणा Maharana Pratap के साथ हो गए, तब सम्पूर्ण मुग़ल सल्तनत ही खतरे में पड़ सकता है. अगले ही दिन उसने एक महत्वपूर्ण घोषणाएं कर डाली, घोषणा यह थी की  Maharana Pratap से मुग़ल सम्राट की अब कोई दुश्मनी नहीं है, जब तक Maharana Pratap जीवित है उनपर मुगलों की ओर से कोई और हमला नहीं किया जायेगा. 

अकबर ने सभी राजपूत से अपने गलतियों के लिए क्षमा याचना की, राजपूतों को और क्या चाहिए था, मुग़ल सम्राट अकबर उनसे क्षमा मांग रहा है इससे प्रतिष्ठा वाली बात और क्या हो सकती है. 

मुग़ल साम्राज्य से कटकर  Maharana Pratap के पीछे एक जुट होने का जो संकल्प उनके मन में जागा था,वो एक कच्चे घड़े की तरह टूट गया था.  Maharana Pratap को जब ये पता लगा की अकबर उनसे संघर्ष का रास्ता छोड़ दिया है तो उन्हें बड़ी निराशा हुई. 

वे उस मिटटी के बने राजपूत थे, जो शत्रु द्वारा उदारता दिखाए जाने पर कभी प्रसन्न नहीं होते थे. फिर अकबर से उनकी शत्रुता तो कई पीढियां पुरानी थी. मुगलों से संघर्ष करना उनकी जीवन शैली में शामिल हो गया था. सम्पूर्ण युद्ध विराम के समाचार से उन्हें ऐसा लगा की जैसे सारे काम एकाएक रुक गए हो. 

वास्तविकता तो ये थी की 25 वर्षो से निरंतर युद्ध करते करते उनका शारीर जर्जर हो चूका था उन्हें आराम की सख्त जरुरत थी. परन्तु राणा Maharana Pratap ने अपने सुख चैन और आराम को कभी भी महत्त्व नहीं दिया. 

उनकी एकमात्र चिंता बस यही थी की देश के राजपूतों में एक ऐसा जूनून पैदा हो की वे एक होना सीखे और बहरी ताकतों के हाथों में न खेलकर अपनी ताकतों को पहचाने और अपने देश में अपने संयुक्त साम्राज्य की स्थापना के लिए कुछ करें.

राणा बीमार पड़ गए उनके मन में एक ही चिंता घर कर गयी थी की उनके बाद मातृभूमि के लिए लड़ने वाले राजपूतों की परम्परा समाप्त हो जाएगी. मेवाड़ का भविष्य भी उनको उज्जवल नहीं दिख रहा था. उन्हें भय था की उनके बाद अमर सिंह मुगलों का दयित्व स्वीकार कर लेगा. 

जिस प्रतिष्ठा के लिए वे आजीवन हर तरह के कष्ट सहते हुए शत्रुओं से जूझते रहे, उनकी मृत्यु के बाद वह धुल में मिल जाएगी. राणा Maharana Pratap से मिलने प्रतिदिन अनेक लोग आते थे. राणा बीमार है और मृत्यु की शय्या पर है ऐसी खबर दूर दूर तक फ़ैल गयी थी. 

अनेक राजपूत राजा उनका हाल चाल जानने और उनके दर्शन के लिए आने लगे थे. राजपूत ही नहीं अनेक बहादुर मुसलमान और मुस्लिम सरदार भी राणा के दर्शन करने में अपना अहोभाग्य समझते थे.

अब तो अंतिम दिन निकट आ पहुंचा था.  Maharana Pratap की दशा बिगड़ गयी थी. उन्होंने अपने विश्वस्त साथियों गोविन्दसिंह,पृथ्वीराज, शक्तिसिंह अमरसिंह आदि को बुलाया और कहने लगे-“अब मुझे केवल एक बात बताओ मेरे बाद इस मातृभूमि की लड़ाई कौन लडेगा आप सब थक चुके है और अमरसिंह इस काबिल नहीं लगता है. 

“आप शांत रहिये भैया” शक्तिसिंह ने आगे बढ़कर कहा-“जब तक हम चितौड़ का किला जीत नहीं लेते है, मुगलों से कोई समझौता नहीं करेंगे. हम मुगलों के आगे कभी नहीं झुकेंगे, आपके द्वारा स्थापित वीरता की परंपरा को धक्का नहीं लगने देंगे, चाहे हमारे प्राण ही क्यों ना चले जाए.” 

बाबा रावत को साक्षी मानकर सभी राजपूतों ने प्रतिज्ञा की. राणा आश्वस्त हो गए और बोले-“मुझे आप लोगो पर पूरा भरोसा है अब मैं चैन से मर सकूँगा”.कहते हुए  Maharana Pratap ने शून्य में देखा और फिर गर्दन झुकाकर कहने लगे –“मेरा अंत समय निकट आ गया है. 

प्राण के निकलते समय मैं चित्तौडगढ के दर्शन करना चाहूँगा आप सब मुझे ऐसी जगह लिटा दीजिये जहाँ से मैं चितौड़गढ़ का किला स्पष्ट रूप से देख सकूँ. चितौड़गढ़ का किला जब राणा जी को दिखने लगा तो वो उठ बैठे और बोले –“हे मुग़ल पददलित चितौडगढ़ मैं तुझे अपने जीवन में प्राप्त ना कर सका. 

अकबर ने उसपर अन्याय से कब्ज़ा कर रखा है, मैं तुझे जीते बिना ही जा रहा हूँ, परन्तु विश्वास रख मेवाड़ की युवा पीढ़ी तुझे शीघ्र ही मुक्त करा लेगी. मैंने प्राण पण से तेरे उद्धार की कोशिश की थी मगर……”कहते कहते  Maharana Pratap का गला रुंध गया, दृष्टी किले के बुर्ज पर ही ठहर गयी थी. तभी वैद्य ने उनकी नाड़ी देखी और बोले- “ Maharana Pratap की इहलीला समाप्त हो गयी”.

यह शब्द सुनते ही अमरसिंह, गोविन्दसिंह, शक्तिसिंह आदि  राणा के गले से लिपटकर फूट फूट कर रोने लगे. मेवाड़ के जाज्वल्यमान सूर्य का अन्त हो गया. पूरा मेवाड़ शोक में डूब गया.

Maharana Pratap Video

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Conclusion:

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