Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ

नमस्ते दोस्तों आज हम Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ के बारे में बात करने वाले हैं, तो दोस्तों हम आपके लिए Dadimaa Ki Kahaniya in Hindi पोस्ट लाए हैं, चले Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ जाने हिंदी में। जानते हैं आपको बहुत सारी नॉलेज देगी, हमारी HindiYouth.com वेबसाइट का एक ही मकसद है कि हिंदुस्तान के युवाओं को सही जानकारी मिल सके.

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ
Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ

आत्मा की आवाज़ (1 Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : किसी गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था | ब्राह्मण गरीब होते हुए भी सच्चा और इमानदार था|परमात्मा में आस्था रखने वाला था | वह रोज सवेरे उठ कर गंगा में नहाने जाया करता था| नहा धो कर पूजा पाठ किया करता था| रोज की तरह वह एक दिन गंगा में नहाने गया नहा कर जब वापस आ रहा था तो उसने देखा रास्ते में एक लिफाफा पड़ा हुआ हैउसने लिफाफा उठा लिया| लिफाफे को खोल कर देखा तो वह ब्राह्मण हक्का बक्का रह गया लिफाफे मे काफी सारे नोट थे|

रास्ते में नोटों को गिनना ठीक न समझ कर उसने लिफाफा बंद कर दिया और घर की तरफ चल दिया| घर जाकर उसने पूजा पाठ करके लिफाफे को खोला | नोट गिनने पर पता चला की लिफाफे मे पूरे बीस हजार रूपये थे| पहले तो ब्रह्मण ने सोचा कि भगवान ने उस की सुन ली है| उसे माला माल कर दिया है | ब्राह्मण की ख़ुशी जादा देर रुक नहीं सकी| अगले ही पल उसके दिमाग में आया कि हो सकता है यह पैसे मेरे जैसे किसी गरीब के गिरे हों|

सायद किसी ने अपनी बेटी की शादी के लिए जोड़ कर रख्खे हों| उसकी आत्मा ने आवाज दी कि वह इन पैसों को ग्राम प्रधान को दे आये| वह उठा और ग्राम प्रधान के घर की तरफ को चल दिया| अभी वह ग्राम प्रधान के आँगन मे ही गया था उसे लगा कोई गरीब आदमी पहले से ही ग्राम प्रधान के घर आया हुआ है | वह भी उन के पास पहुँच गया| गरीब आदमी रो-रोकर प्रधान को बता रहा था की कैसे कैसे यत्नों से उसने पैसे जोड़े थे पर कहीं रास्ते में गिर गए थे| सारी कहानी सुन ने पर गरीब ब्रह्मण ने जेब से पैसे निकले और उस गरीब आदमी को देते हुए कहा कि मुझे ये पैसे रास्ते में मिले हैं|

आप की कहानी सुन ने के बाद अब यकीन हो गया है कि ये पैसे आप के ही है| पैसे देखते ही गरीब के चेहरे पर रौनक आ गई | गरीब ब्राह्मण ने कहा पैसे गिन लीजिये| गरीब आदमी ने ब्राह्मण का धन्यवाद करते हुए कहाकि पैसे तो पूरे ही हैं इसमे से में आप को कुछ इनाम देना चाहता हूँ | गरीब ब्रह्मण ने कुछ भी लेने से इंकार कर दिया| ब्राह्मण अपने घर को वापस आ गया उस को इस बात की ख़ुशी थी कि उसकी आत्मा की आवाज की जीत हुई है |

बड़ा कौन (2 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : भूख, प्यास, नींद और आशा चार बहनें थीं, एक बार उनमें लड़ाई हो गई, लड़ती-झगड़ती वे राजा के पास पहुंचीं, एक ने कहा, मैं बड़ी हूं, दूसरी ने कहा मैं बड़ी हूं, तीसरी ने कहा, मैं बड़ी हूं, चौथी ने कहा, मैं बड़ी हूं, सबसे पहले राजा ने भूख से पूछा, क्यों बहन, तुम कैसे बड़ी हो ? भूख बोली, मैं इसलिए बड़ी हूं, क्योंकि मेरे कारण ही घर में चूल्हे जलते हैं, पांचों पकवान बनते हैं और वे जब मुझे थाल सजाकर देते हैं, तब मैं खाती हूं, नहीं तो खाऊं ही नहीं, राजा ने अपने कर्मचारियों से कहा, जाओ, राज्य भर में मुनादी करा दो कि कोई अपने घर में चूल्हे न जलाये, पांचों पकवान न बनाये, थाल न सजाये, भूख लगेगी तो भूख कहां जायगी ? सारा दिन बीता, आधी रात बीती, भूख को भूख लगी, उसने यहां खोजा, वहां खोजा; लेकिन खाने को कहीं नहीं मिला,

लाचार होकर वह घर में पड़े बासी टुकड़े खाने लगी, प्यास ने यह देखा, तो वह दौड़ी-दौड़ी राजा के पास पहुंची, बोली, राजा! राजा ! भूख हार गई, वह बासी टुकड़े खा रही है, देखिए, बड़ी तो मैं हूं, राजा ने पूछा, तुम कैसे बड़ी हो ? प्यास बोली, मैं बड़ी हूं क्योंकि मेरे कारण ही लोग कुएं, तालाब बनवाते हैं, बढ़िया बर्तानों में भरकर पानी रखते हैं और वे जब मुझे गिलास भरकर देते हैं, तब मैं उसे पीती हूं, नहीं तो पीऊं ही नहीं, राजा ने अपने कर्मचारियों से कहा, जाओ, राज्य में मुनादी करा दो कि कोई भीअपने घर में पानी भरकर नहीं रखे, किसी का गिलास भरकर पानी न दे,

कुएं-तालाबों पर पहरे बैठा दो, प्यास को प्यास लगेगी तो जायगी कहां ? सारा दिन बीता, आधी रात बीती, प्यास को प्यास लगी, वह यहां दौड़ी, वहां दौड़, लेकिन पानी की कहां एक बूंद न मिली, लाचार वह एक डबरे पर झुककर पानी पीने लगी, नींद नेदेखा तो वह दौड़ी-दौड़ी राजा के पास पहुंची बोली, राजा !

राजा ! प्यास हार गई, वह डबरे का पानी पी रही है, सच, बड़ी तो मैं हूं, राजा ने पूछा, तुम कैसे बड़ी हो? नींद बोली, मैं ऐसे बड़ी हूं कि लोग मेरे लिए पलंग बिछवाते हैं, उस पर बिस्तर डलवाते हैं और जब मुझे बिस्तर बिछाकर देते हैं तब मैं सोती हूं, नहीं तो सोऊं ही नहीं, राजा ने अपने कर्मचारियों से कहा, जाओ, राज्य भर में यह मुनादी करा दो कोई पलंग न बनवाये, उस पर गद्दे न डलवाये ओर न बिस्तर बिछा कर रखे, नींद को नींद आयेगी तो वह जायगी कहां ? सारा दिन बीता, आधी रात बीती, नींद को नींद आने लगी.

उसने यहां ढूंढा, वहां ढूंढा, लेकिन बिस्तर कहीं नहीं मिला, लाचार वह ऊबड़-खाबड़ धरती पर सो गई, आशा ने देखा तो वह दौड़ी-दौड़ी राजा के पा पहुंची, बोली, राजा ! राजा ! नींद हार गयी, वह ऊबड़-खाबड़ धरती पर सोई है, वास्तव में भूख, प्यास और नींद, इन तीनों में मैं बड़ी हूं, राजा नेपूछा, तुम कैसे बड़ी हो ? आशा बोली, मैं ऐसे बड़ी हूं कि लोग मेरी खातिर ही काम करते हैं, नौकरी-धन्धा, मेहनत और मजदूरी करते हैं, परेशानियां उठाते हैं, लेकिन आशाके दीप को बुझने नहीं देते, राजा ने अपने कर्मचारियों से कहा, जाओ, राज्य में मुनादी करा दो, कोई काम न करे, नौकरी न करे.

धंधा, मेहनत और मजदूरी न करे और आशा का दीप न जलाये, आशा को आश जागेगी तो वह जायेगी कहां? सारा दिन बीता, आधी रात बीती, आशा को आश जगी, वह यहां गयी, वहां गयी, लेकिन चारों ओर अंधेरा छाया हुआ था, सिर्फ एक कुम्हार टिमटिमाते दीपक के प्रकाश में काम कर रहा था, वह वहां जाकर टिक गयी, और राजा ने देखा, उसका सोने का दिया, रुपये की बाती तथा कंचन का महल बन गया, जैसे उसकी आशा पूरी हुई, वैसे सबकी हो.

बाघ और बगुला (3 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : एक बार एक बाघके गले में हड्डी अटक गयी| बाघ ने उसे निकलने की बड़ी चेष्टा की, पर उसे सफलता नहीं मिली| पीड़ा से परेशान हो कर वह इधर उधर दौड़ भाग करने लगा| किसी भी जानवर को सामने देखते ही वह कहता-भाई!यदि तुम मेरे गले से हड्डी को बाहर निकाल दो तो मै तुम्हें विशेष पुरस्कार दूंगा और आजीवन तुम्हारा ऋणी रहूँगा| परन्तु कोई भी जीव भय के कारण उस की सहायता करने को राजी नहीं हुआ |

पुरस्कार के लोभ में आख़िरकार एक बगला तैयार हुआ| उसने बाघ के मुंह में अपनी लम्बी चौंच डाल कर अथक प्रयास के बाद उस हड्डी को बाहर निकाल दिया| बाघ को बड़ी राहत मिली| बगले ने जब अपना पुरस्कार माँगा तो बाघ आग बबूला होकर दांत पीसते हुए बोला- अरे मूर्ख! तूने बाघ के मुंह में अपनी चौंच डाल दी थी, उसे तू सुरक्षितरूप से बाहर निकाल सका, इसको अपना भाग्य न मान कर ऊपर से पुरस्कार मांग रहा है? यदि तुझे अपनी जान प्यारी है तो मेरे सामने से दूर हो जा, नहीं तो अभी तेरी गर्दन मरोड़ दूंगा| यह सुनकर बगला स्तब्ध रह गाया| और तत्काल वहां से चल दिया| इसी लिए कहते हैं कि- दुष्टों के साथ जादा मेलजोल अच्छा नहीं|

ढोल की पोले (4 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ :एक बार एक जंगल के निकटदो राजाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। एक जीता दूसरा हारा। सेनाएं अपने नगरों को लौट गई। बस, सेना का एक ढोल पीछे रह गया। उस ढोल को बजा-बजाकर सेना के साथ गए भांड व चारण रात को वीरता की कहानियां सुनाते थे। युद्ध के बाद एक दिन आंधी आई। आंधी के जोर में वह ढोल लुढकता-पुढकता एक सूखे पेड के पास जाकर टिक गया। उस पेड की सूखी टहनियां ढोल से इस तरह से सट गई थी कि तेज हवा चलते ही ढोल पर टकरा जाती थी और ढमाढम ढमाढम की गुंजायमान आवाज होती।

एक सियार उस क्षेत्र में घूमता था। उसने ढोल की आवाज सुनी। वह बडा भयभीत हुआ। ऐसी अजीब आवाज बोलते पहले उसने किसी जानवर को नहीं सुना था। वह सोचने लगा कि यह कैसा जानवर हैं, जो ऐसी जोरदार बोली बोलता हैं’ढमाढम’। सियार छिपकर ढोल को देखता रहता, यह जानने के लिए कि यह जीव उडने वाला हैं या चार टांगो पर दौडने वाला। एक दिन सियार झाडी के पीछे छुप कर ढोल पर नजर रखे था। तभी पेड से नीचे उतरती हुई एक गिलहरी कूदकर ढोल पर उतरी। हलकी-सी ढम की आवाज भी हुई। गिलहरी ढोल पर बैठी दाना कुतरती रही।

सियार बडबडाया “ओह! तो यह कोई हिंसक जीव नहीं हैं। मुझे भी डरना नहीं चाहिए।” सियार फूंक-फूंककर कदम रखता ढोल के निकट गया। उसे सूंघा। ढोल का उसे न कहीं सिर नजर आया और न पैर। तभी हवा के झुंके से टहनियां ढोल से टकराईं। ढम की आवाज हुई और सियार उछलकर पीछे जा गिरा। “अब समझ आया।” सियार उढने की कोशिश करता हुआ बोला “यह तो बाहर का खोल हैं।जीव इस खोल के अंदर हैं।

आवाज बता रही हैं कि जो कोई जीव इस खोल के भीतर रहता हैं, वह मोटा-ताजा होना चाहिए। चर्बी से भरा शरीर। तभी ये ढम=ढम की जोरदार बोली बोलता हैं।” अपनी मांद में घुसते ही सियार बोला “ओ सियारी! दावत खाने के लिए तैयार हो जा। एक मोटे-ताजे शिकार का पता लगाकर आया हूं।” सियारी पूछने लगी “तुम उसे मारकर क्यों नहीं लाए?” सियार ने उसे झिडकी दी “क्योंकि मैं तेरी तरह मूर्ख नहीं हूं। वह एक खोल के भीतर छिपा बैठा हैं। खोल ऐसा हैं कि उसमें दो तरफ सूखी चमडी के दरवाजे हैं।मैं एक तरफ से हाथ डाल उसे पकडने की कोशिश करता तो वह दूसरे दरवाजे से न भाग जाता?” चांद निकलने पर दोनों ढोल की ओर गए।

जब वह् निकट पहुंच ही रहे थे कि फिर हवा से टहनियां ढोल पर टकराईं और ढम-ढम की आवाज निकली। सियार सियारी के कान में बोला “सुनी उसकी आवाज्? जरा सोच जिसकी आवाज ऐसी गहरी हैं, वह खुद कितना मोटा ताजा होगा।” दोनों ढोल को सीधा कर उसके दोनों ओर बैठे और लगे दांतो से ढोल के दोनों चमडी वाले भाग के किनारे फाडने। जैसे ही चमडियां कटने लगी, सियार बोला “होशियार रहना। एक साथ हाथ अंदर डाल शिकार को दबोचना हैं।” दोनों ने ‘हूं’ की आवाज के साथ हाथ ढोल के भीतर डाले और अंदर टटोलने लगे। अदंर कुछ नहीं था। एक दूसरे के हाथ ही पकड में आए। दोंनो चिल्लाए “हैं! यहां तो कुछ नहीं हैं।” और वे माथा पीटकर रह गए।

ज्ञान की प्यास (5 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : उन दिनों महादेव गोविंद रानडे हाई कोर्ट के जज थे। उन्हें भाषाएँ सीखने का बड़ा शौक था। अपने इस शौक के कारण उन्होंने अनेक भाषाएँ सीख ली थीं; किंतु बँगला भाषा अभी तक नहीं सीख पाए थे। अंत में उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने एक बंगाली नाई से हजामत बनवानी शुरू कर दी। नाई जितनी देर तक उनकी हजामत बनाता, वे उससे बँगला भाषा सीखते रहते। रानडे की पत्नी को यह बुरा लगा।

उन्होंने अपने पति से कहा, आप हाई कोर्ट के जज होकर एक नाई से भाषा सीखते हैं। कोई देखेगा तो क्या इज्जत रह जाएगी आपको बँगला सीखनी ही है तो किसी विद्वान से सीखिए। रानडे ने हँसते हुए उत्तर दिया, मैं तो ज्ञान का प्यासा हूँ। मुझे जाति-पाँत से क्या लेना-देना ? यह उत्तर सुन पत्नी फिर कुछ न बोलीं। ज्ञान ऊँच-नीच की किसी पिटारी में बंद नहीं रहता।

घंटी की कीमत (6 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ :रामदास एक ग्वाले का बेटा था। रोज सुबह वह अपनी गायों को चराने जंगल में ले जाता। हर गाय के गले में एकएक घंटी बँधी थी। जो गाय सबसे अधिक सुंदर थी उसके गले में घंटी भी अधिक कीमती बँधी थी। एक दिन एक अजनबी जंगल से गुजर रहा था। वह उस गाय को देखकर रामदास के पास आया, यह घंटी बड़ी प्यारी है क्या कीमत है इसकी ? बीस रुपये। रामदास ने उत्तर दिया। बस, सिर्फ बीस रुपये मैं तुम्हें इस घंटी के चालीस रुपये दे सकता हूँ। सुनकर रामदास प्रसन्न हो उठा। झट से उसने घंटी उतारकर उस अजनबी के हाथ में थमा दी और पैसे अपनी जेब में रख लिये। अब गाय के गले में कोई घंटी नहीं थी।

घंटी की टुनक से उसे अन्दाजा हो जाया करता था। अतः अब इसका अन्दाजा लगाना रामदास के लिए मुश्किल हो गया कि गाय इस वक्त कहाँ चर रही है। जब चरतेचरते गाय दूर निकल आई तो अजनबी को मौका मिल गया। वह गाय को अपने साथ लेकर चल पड़ा। तभी रामदास ने उसे देखा। वह रोता हुआ घर पहुँचा और सारी घटना अपने पिता को सुनाई। उसने कहा, मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि वह अजनबी मुझे घंटी के इतने अच्छे पैसे देकर ठग ले जाएगा। पिता ने, ठगी का सुख बड़ा खतरनाक होता है। पहले वह हमें प्रसन्नता देता है, फिर दुःख। अतः हमें पहले ही से उसका सुख नहीं उठाना चाहिए। लालच से कभी सुख नहीं मिलता।

ईश्वर देता हैं (7 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : बहुत समय पहले की बात है| एक शहर में एक दयालु राजा रहता था| उस के यहाँ रोज दो भिखारी भीख मांगने आया करते थे| उन में एक भिखारी जवान था और एक भिखारी बूढ़ा था| राजा उनको रोज रोटी और पैसा दिया करता था| भीख लेने के बाद बूढ़ा भिखारी कहता था ईश्वर देता है| जवान भिखारी कहता था हमारे महाराज की देन है| एक दिन राजा ने उन्हे आम दिनों से जादा धन दिया| छोटे भिखारी ने कहा हमारे महाराज की देन है|

बूढ़े भिखारी ने कहा ईश्वर की देन है| यह सुन कर राजा को बहुत गुस्सा आया उसने सोचा इन का भरण पोषण तो मैं करता हूँ और यह भिखारी कहता है की ईश्वर की देन है| राजा ने छोटे भिखारी की और सहायता करने की सोची और अगले दिन राजा ने कहा आज तुम इस नए रस्ते से जाओगे लेकिन पहले छोटा भिखारी जाएगा बाद में बूढ़ा भिखारी जाएगा| यह कहते हुए राजा ने नए रस्ते में एक सोने से भरी थैली रखवा दी ताकि छोटे भिखारी को मिल सके| जब छोटा भिखारी इस नए रस्ते से जा रहा था तो उसने देखा की यह रास्ता काफी चौड़ा और समतल है|

उसने सोचा इस रस्ते से में आँखें बंद कर के जा सकता हूँ| जहाँ पर राजा ने सोने की थैली रखी थी छोटा भिखारी वहां से आँखें बंद करके आगे निकल गया और सोने की थैली वहीँ रह गई| कुछ देर बाद जब बूढ़ा भिखारी पीछे से गया तो उसे यह थैली मिल गई| उसने उठाई और भगवान का धन्यवाद किया| अगले दिन जब भिखारी फिर राजा के पास गए तो राजा ने छोटे भिखारी को देखते हुए बोला आप को मेरे भेजे हुए रस्ते में कुछ मिला कि नहीं|

छोटे भिखरी ने कहा रास्ता तो बहुत अच्छा था पर मुझे वहां कुछ नहीं मिला| बूढ़े भखारी ने कहा मुझे एक सोने से भरी थैली मिली जो ईश्वर की देन थी| राजा ने अब निश्चय कर लिया की वह बूढ़े वाले भिखारी को ये दिखा के रहेगा की वह उसका असली पालन करता है| जैसे ही दोनों भिखारी जाने लगे राजा ने छोटे भिखारी को बुलाकर उसे एक कद्दू दिया जो सोने चाँदी से भरा हुआ था| पर ऊपर से बंद था| भिखरी यह नहीं जानता था कि यह कद्दू सोने चाँदी से भरा है| रास्ते में एक दुकान में उसने यह कद्दू बेच दिया| अगले दिन राजा ने उन भिखारियों से पूछा कि बताओ पिछले दिन कोई महत्वपूर्ण घटना घटी हो|

छोटे भिखारी ने कहा महाराज जो कद्दू आपने मुझे दिया था वह मेंने एक ब्यापारी को बेच दिया जिस से मुझे थोडा सा धन मिल गया| राजा को बहुत गुस्सा आया पर राजा ने अपने गुस्से को ब्यक्त नहीं किया| बूढ़े भिखारी से कहा क्या तुने भी पहले से जादा कमाया? बूढ़े भिखारी ने कहा, निश्चय ही कमाया है जैसे ही में जा रहा था एक ब्यापारी ने मुझे एक कद्दू दिया| जब घर जाकर मेंने कद्दू को चीरा तो उसमें से सोने चाँदी के सिक्के निकले| उसने कहा ईश्वर देता है| इसी लिए कहते हैं कि इश्वर की मर्जी के बगैर कुछ भी नहीं होता है|

जिसका काम उसी को साजे (8 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ :किसी गांव मे एक गरीब घोबी रहता था| धोबी के पास एक गधा था और एक कुत्ता था| दोनों धोबी के साथ रोज सुबह धोबी घाट जाया करते थे| शाम को घर आया करते थे| धोबी का गधा शांत स्वभाव का था और स्वामी भक्त भी था| लेकिन धोबी का कुत्ता आलसी और कृत्घन था | गधा अपना काम पूरी लगन के साथ करता था| जब सुबह धोबी धोबीघाट को जाता था तो सारे कपडे गधे पर लाद के लेजाता था और शाम को गधे पर ही कपडे लाद कर लाया करता था | कभी कभी तो धोबी जब थका होता था तो खुद भी गधे पर बैठ जाया करता था| दिन भर गधा धोबी घाट के नजदीक हरी हरी घास चारा करता था |

धोबी का कुत्ता सारा दिन धोबी घाट मे सोया ही रहता था | एक दिन गधे ने कुत्ते से पूछा की तुम भी मालिक के लिए कोई काम क्यूँ नहीं करते? कुत्ते ने जवाब दिया कि मालिक कौन सा हमें पेट भर के खाना देता है | अपना बचा खुचा खाना हमें डाल देता है| इतना कह कर कुत्ता फिर से सोगया | एक दिन धोबी के घर मे कोई चोर घुस आया| चोर को आते हुए कुत्ते ने देख लिया था पर कुत्ता भौका नहीं | उधर गधे ने भी चोर को देख लिया था | गधे ने कुत्ते से कहा की इस समय तुम्हारा फर्ज बनाता है कि तुम भौक कर मालिक को जगाओ ताकि मालिक को पता चल सके कि चोर आया है|

कुत्ते ने कहा मालिक सो रहा है जगाने पर मारेगा | गधे ने कहा कि क्यूँ मारेगा हम तो उसका फ़ायदा कर रहे है| कुत्ता इस बात के लिए नहीं माना| गधे से रहा नहीं गया और खुद रैकना शुरू कर दिया| आधी रात को गधे के रेकने पर धोबी को गुस्सा आ गया | धोबी उठा उसने डंडा उठा कर तीन चार डंडे गधे को जड़ दिए और सो गया| धोबी के सो जाने के बाद कुत्ते ने गधे से कहा देखा मे कहता था न कि मालिक मारेगा | फिर उसने बताया कि जिस का काम उसी को साजे और करे तो डंडा बाजे इस पर गधे ने कहा भाई तुम ठीक थे मे ही गलत था |

कछुआ और हंस (9 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ :एक तालाब में एक कछुआ रहता था। उसी तलाब में दो हंस तैरने के लिए उतरते थे। हंस बहुत हंसमुख और मिलनसार थे। कछुए और उनमें दोस्ती हते देर न लगी। हंसो को कछुए का धीमे-धीमे चलना और उसका भोलापन बहुत अच्छा लगा। हंस बहुत ज्ञानी भी थे। वे कछुए को अदभुत बातें बताते। ॠषि-मुनियों की कहानियां सुनाते। हंस तो दूर-दूर तक घूमकर आते थे, इसलिए दूसरी जगहों की अनोखी बातें कछुए को बताते। कछुआ मंत्रमुग्ध होकर उनकी बातें सुनता। बाकी तो सब ठीक था, पर कछुए को बीच में टोका-टाकी करने की बहुत आदत थी। अपने सज्जन स्वभाव के कारण हंस उसकी इस आदत का बुरा नहीं मानते थे। उन तीनों की घनिष्टता बढती गई। दिन गुजरते गए।

एक बार बडे जोर का सुखा पडा। बरसात के मौसम में भी एक बूंद पानी नहीं बरसा। उस तालाब का पानी सूखने लगा। प्राणी मरने लगे, मछलियां तो तडप-तडपकर मर गईं। तालाब का पानी और तेजी से सूखने लगा। एक समय ऐसा भी आया कि तालाब में खाली कीचड रह गया। कछुआ बडे संकट में पड गया। जीवन-मरण का प्रश्न खडा हो गया। वहीं पडा रहता तो कछुए का अंत निश्चित था। हंस अपने मित्र पर आए संकट को दूर करने का उपाय सोचने लगे। वे अपने मित्र कछुए को ढाडस बंधाने का प्रयत्न करते और हिम्म्त न हारने की सलाह देते। हंस केवल झूठा दिलासा नहीं दे रहे थे। वे दूर-दूर तक उडकर समस्या का हल ढूढते।

एक दिन लौटकर हंसो ने कहा “मित्र, यहां से पचास कोस दूर एक झील हैं।उसमें काफी पानी हैं तुम वहां मजे से रहोगे।” कछुआ रोनी आवाज में बोला “पचास कोस? इतनी दूर जाने में मुझे महीनों लगेंगे। तब तक तो मैं मर जाऊंगा।” कछुए की बात भी ठीक थी। हंसो ने अक्ल लडाई और एक तरीका सोच निकाला। वे एक लकडी उठाकर लाए और बोले “मित्र, हम दोनों अपनी चोंच में इस लकडी के सिरे पकडकर एक साथ उडेंगे। तुम इस लकडी को बीच में से मुंह से थामे रहना। इस प्रकार हम उस झील तक तुम्हें पहुंचा देंगे उसके बाद तुम्हें कोई चिन्ता नहीं रहेगी।” उन्होंने चेतावनी दी “पर याद रखना, उडान के दौरान अपना मुंह न खोलना। वरना गिर पडोगे।” कछुए ने हामी में सिर हिलाया। बस, लकडी पकडकर हंस उड चले।

उनके बीच में लकडी मुंह दाबे कछुआ। वे एक कस्बे के ऊपर से उड रहे थे कि नीचे खडे लोगों ने आकाश में अदभुत नजारा देखा। सब एक दूसरे को ऊपर आकाश का दॄश्य दिखाने लगे। लोग दौड-दौडकर अपने चज्जों पर निकल आए। कुछ अपने मकानों की छतों की ओर दौडे। बच्चे बूडे, औरतें व जवान सब ऊपर देखने लगे। खूब शोर मचा। कछुए की नजर नीचे उन लोगों पर पडी। उसे आश्चर्य हुआ कि उन्हें इतने लोग देख रहे हैं। वह अपने मित्रों की चेतावनी भूल गया और चिल्लाया “देखो, कितने लोग हमें देख रहे है!” मुंह के खुलते ही वह नीचे गिर पडा। नीचे उसकी हड्डी-पसली का भी पता नहीं लगा।

लोभ से विनाश (10 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : बहुत समय पहले की बात है, किसी गांव में एक किसान रहता था, गांव में ही खेती का काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पलता था, किसान अपने खेतों में बहुत मेहनत से काम करता था, परन्तु इसमें उसे कभी लाभ नहीं होता था, एक दिन दोपहर में धूप से पीड़ित होकर वह अपने खेत के पास एक पेड़ की छाया में आराम कर रहा था, सहसा उस ने देखा कि एक एक सर्प उसके पास ही बाल्मिक (बांबी) से निकल कर फेन फैलाए बैठा है, किसान आस्तिक और धर्मात्मा प्रकृति का सज्जन व्यक्ति था, उसने विचार किया कि ये नागदेव अवश्य ही मेरे खेत के देवता हैं,.

मैंने कभी इनकी पूजा नहीं की, लगता है इसी लिए मुझे खेती से लाभ नहीं मिला, यह सोचकर वह बाल्मिक के पास जाकर बोला-हे क्षेत्ररक्षक नागदेव! मुझे अब तक मालूम नहीं था कि आप यहाँ रहते हैं, इसलिए मैंने कभी आपकी पूजा नहीं की, अब आप मेरी रक्षा करें, ऐसा कहकर एक कसोरे में दूध लाकर नागदेवता के लिए रखकर वह घर चला गया, प्रात:काल खेत में आने पर उसने देखा कि कसोरे में एक स्वर्ण मुद्रा रखी हुई है,

अब किसान प्रतिदिन नागदेवता को दूध पिलाता और बदले में उसे एक स्वर्ण मुद्रा प्राप्त होती, यह क्रम बहुत समय तक चलता रहा, किसान की सामाजिक और आर्थिक हालत बदल गई थी, अब वह धनाड्य हो गया था, एक दिन किसान को किसी काम से दूसरे गांव जाना था, अत: उसने नित्यप्रति का यह कार्य अपने बेटे को सौंप दिया, किसान का बेटा किसान के बिपरीत लालची और क्रूर स्वभाव का था, वह दूध लेकर गया और सर्प के बाल्मिक के पास रख कर लौट आया, दूसरे दिन जब कसोरालेने गया तो उसने देखाकि उसमें एक स्वर्ण मुद्रा रखी है.

उसे देखकर उसके मन में लालच आ गया, उसने सोचा कि इस बाल्मिक में बहुत सी स्वर्णमुद्राएँ हैं और यह सर्प उसका रक्षक है, यदि में इस सर्प को मार कर बाल्मिक खोदूं तो मुझे सारी स्वर्णमुद्राएँ एकसाथ मिल जाएंगी, यह सोचकर उसने सर्प पर प्रहार किया, परन्तु भाग्यवस सर्प बच गया एवं क्रोधित हो अपने विषैले दांतों से उसने उसे काट लिया, इस प्रकार किसान बेटे की लोभवस मृतु हो गई, इसी लिए कहते हैं कि लोभ करना ठीक नहीं है,

पानी की कमाई पानी में (11 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : बहुत समय पहले की बात है, एक जंगल के किनारे कुछ ग्वाले रहते थे| वे अपने गाय भैसों का दूध बेचने के लिए शहर में जाया करते थे| उन ग्वालों में एक ग्वाला बहुत लालची था| वह रोज दूध बेचने जाते समय रास्ते में पड़ती नदी में से दूध में पानी मिला दिया करता था| एक दिन जब ग्वाले बाज़ार से अपनी बिक्री का हिसाब करके पैसे ले कर घर को आ रहे थे तो दोपहर की गर्मी से तंग आकर उन्हों ने नदी में नहाने का मन बनाया| सभी ग्वालो ने अपने अपने कपडे उतार कर एक पेड़ के नीचे रख दिए और नहाने के लिए नदी के बीच में चले गए|

कुछ ही देर में पेड़ से एक बन्दर उतरा और उस लालची ग्वाले के कपड़े उठाकर पेड़ पर ले गया | उसने उसकी जेब से रुपये के सिक्कों वाली थैली निकाली और एक एक करके नदी में फैंकने लग गया| ग्वाला चिल्लाया और अपने कपडे और पैसे छुड़ाने के लिए बन्दर के पीछे भागा| इतनी देर में वह बन्दर बहुत सारे सिक्के नदी में गिरा चुका था| लालची ग्वाला अपने भाग्य को कोसने लगा और कहने लगा कि देखो मेरी महीने की कमाई के आधे पैसे बन्दर ने पानी में मिला दिए|

इसपर उसके साथी ग्वालों ने कहा तुमने जितने पैसे पानी मिलाकर कमाए थे उतने पैसे पानी में ही चले गए हैं| पानी की कमाई पानी में| उस दिन से उस ग्वाले ने दूध में पानी मिलाना छोड़ दिया और ईमानदारी से दूध बेचने लगा| इसी लिए कहते हैं कि पाप की कमाई कभी फलती नहीं है|

शेर और खरगोश (12 Dadimaa Ki Kahaniya)

Dadimaa Ki Kahaniya 10+ दादी माँ की कहानियाँ : किसी जंगल में एक शेर रहता था| शेर कई दिनों से भूखा था| जब वह अपनी मांद से शिकार करने निकल रहा था तो उसने देखा कि एक खरगोश उसकी मांद के करीब ही खेल रहा है| शेर जैसे ही उस पर झपटने वाला था, सामने एक हिरन दिखाई दिया| शेर ने सोचा खरगोश तो बहुत छोटा है,नाश्ता भी पूरा नहीं होगा हिरन काफी बड़ा है उसी को मारना चाहिए| अत वह शेर खरगोश को छोड़ कर उस हिरन के पीछे दौड़ पड़ा| लेकिन वह हिरन शेर को देख कर, बहुत तेज दौड़ने लगा और जल्दी ही वह शेर की आँखों से ओझल हो गया|

शेर ने हिरन को तेज दौड़ते हुए देखा तो वह सोचने लगा कि वह अब हिरन को नहीं पकड़ सकेगा| हिरन के आँखों से ओझल होते ही शेर पूरा भोजन पाने की आशा छोड़ बैठा| उसने मन ही मन निश्चय किया कि हिरन का पीछा करना अब बेकार है| मुझे खरगोश के पास ही लौट जाना चाहिए| उसको खाने से मेरा कुछ तो पेट भरेगा| किन्तु वह जब लौट कर वापस अपनी मांद के पास पहुंचा तो वहां खरगोश को न पाकर वह आश्चर्य में पड़ गया| वह सोचने लगा मैं तो खरगोश को यहीं छोड़ गया था? फिर यह खरगोश कहाँ चला गया? जरुर यही कहीं छिपा होगा| मैं अभी उसको तलाश करता हूँ|

वह मुझसे बच कर कहाँ जा सकता है? यह सोच कर वह शेर उस खगोश को तलाश करने लगा| उसने मांद के अन्दर देखा, मांद के बाहर देखा मगर उसे कहीं भी वह खरगोश नज़र नहीं आया| खरगोश तो शेर के वहां से जाते ही रफूचक्कर हो गया था| खरगोश को वहां न पाकर शेर बड़ा हताश हुआ| हिरन और खरगोश दोनों ही उसका भोजन बनने से बच गए थे| शेर हिरन का ध्यान कर सोचने लगा जब मैंने उसे देखा था तो सोचा था, हिरन खरगोश से बड़ा है इसलिए उसको खाकर मेरा पेट भर जाएगा| खरगोश तो बहुत छोटा है-उसको खाकर मेरा पेट भी नहीं भर सकता|

अत मैं खरगोश को छोड़ कर हिरन का शिकार करने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ा| लेकिन दुर्भाग्य कि वह हिरन मेरे हाथ नहीं आया और तेजी से भाग गया| अपने दोनों शिकार हाथ से निकल जाने के कारन शेर बड़ा पछताया और बोला,मैंने थोडा छोड़ कर ज्यादा पाने के लालच में अपना सबकुछ खो दिया| मैं न थोडा पा सका न ज्यादा| इस लिए कहते हैं कि ज्यादा पाने के लालच में थोड़े से भी हाथ धोना पड़ जाता है|

Dadimaa Ki Kahaniya Video

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Conclusion:

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