Chhatrapati Shivaji Maharaj History हिंदी में

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Chhatrapati Shivaji Maharaj History हिंदी में

Chhatrapati Shivaji Maharaj History हिंदी में
Chhatrapati Shivaji Maharaj History हिंदी में

Chhatrapati Shivaji Maharaj History हिंदी में परिचय

Chhatrapati Shivaji Maharaj उर्फ़ Chhatrapati Shivaji Maharaj  भारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे. Chhatrapati Shivaji Maharaj  एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे. धार्मिक अभ्यासों में उनकी काफी रूचि थी. रामायण और महाभारत का अभ्यास वे बड़े ध्यान से करते थे.

शाहजी भोंसले की प्रथम पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से Chhatrapati Shivaji Maharaj  / Shivaji Maharaj का जन्म 19 फरवरी, 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था | शिवनेरी का दुर्ग पूना (पुणे) से उत्तर की तरफ़ जुन्नार नगर के पास था | उनका बचपन राजा राम, गोपाल, संतों तथा रामायण , महाभारत की कहानियों और सत्संग में बीता | वह सभी कलाओ में माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी | उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे | Chhatrapati Shivaji Maharaj  के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा | 

बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओं को बहली प्रकार समझने लगे थे | शासन वर्ग की करतूतों पर वे झल्लाते थे और बेचैन हो जाते थे | उनके बाल-ह्रदय में स्वाधीनता की लौ प्रज्ज्वलित हो गयी थी | उन्होंने कुछ मावळावो (सभि जाती के लोगो को ऐक ही (मावळा) ऊपाधी दे कर जाती भेद खत्म करके सारि प्रजा को संघटित कीया था) का संगठन किया | विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ फेंकने का उनका संकल्प प्रबलतर होता गया | Chhatrapati Shivaji Maharaj  का विवाह सन 14 मई 1640 में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल, पुना में हुआ था |

Chhatrapati Shivaji Maharaj  शिवराज्याभिषेक

सन 1674 तक Chhatrapati Shivaji Maharaj राजे ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरन्दर की संधि के अंतर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे | पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजीराजे का राज्याभिषेक हुआ.

विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया | Chhatrapati Shivaji Maharaj राजे ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की | काशी के पंडित विश्वेक्ष्वर जी भट्ट को इसमें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था | 

पर उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया | इस कारण से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ | इस समारोह में हिन्द स्वराजकी स्थापना का उद्घोष किया गया था | 

विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था | एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नामका सिक्का चलवाया | इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को Chhatrapati Shivaji Maharaj के विरुध्द भेजा पर वे असफल रहे |

पहला आक्रमण 

Chhatrapati Shivaji Maharaj  ने अपना पहला आक्रमण तोरण किले पर किया, 16-17 वर्ष की आयु में ही लोगों को संगठित करके अपने आस-पास के किलों पर हमले प्रारंभ किए और इस प्रकार एक-एक करके अनेक किले जीत लिये, जिनमें सिंहगढ़, जावली कोकण, राजगढ़, औरंगाबाद और सुरत के किले प्रसिध्द है |

 Chhatrapati Shivaji Maharaj की ताकत को बढ़ता हुआ देख बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता को हिरासत में ले लिए. बीजापुर के सुल्तान से अपने पिता को छुड़ाने के बाद Chhatrapati Shivaji Maharaj राजे ने पुरंदर और जावेली के किलो पर भी जीत हासिल की. इस प्रकार अपने प्रयत्न से काफी बड़े प्रदेश पर कब्जा कर लिया.

दुर्गों पर नियंत्रण

तोरण का दुर्ग पूना के दक्षिण पश्चिम में ३0 किलोमीटर की दूरी पर था। Chhatrapati Shivaji Maharaj ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना दूत भेजकर खबर भिजवाई की वे पहले किलेदार की तुलना में बेहतर रकम देने को तैयार हैं और यह क्षेत्र उन्हें सौंप दिया जाये। उन्होंने आदिलशाह के दरबारियों को पहले ही रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया था और अपने दरबारियों की सलाह के मुताबिक आदिलशाह ने Chhatrapati Shivaji Maharaj  को उस दुर्ग का अधिपति बना दिया। 

उस दुर्ग में मिली सम्पत्ति से Shivaji Maharaj  ने दुर्ग की सुरक्षात्मक कमियों की मरम्मत का काम करवाया। इससे कोई १0 किलोमीटर दूर राजगढ़ का दुर्ग था और Chhatrapati Shivaji Maharaj  ने इस दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया।

Chhatrapati Shivaji Maharaj  की इस साम्राज्य विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली तो वह क्षुब्ध हुआ। उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने को कहा। Chhatrapati Shivaji Maharaj  ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया और नियमित लगान बन्द कर दिया। राजगढ़ के बाद उन्होंने चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और उसके बाद कोंडना के दुर्ग पर। कोंडना (कोन्ढाणा) पर अधिकार करते समय उन्हें घूस देनी पड़ी।

 कोंडना पर अधिकार करने के बाद उसका नाम सिंहगढ़ रखा गया। शाहजी राजे को पूना और सूपा की जागीरदारी दी गई थी और सूपा का दुर्ग उनके सम्बंधी बाजी मोहिते के हाथ में थी। 

Chhatrapati Shivaji Maharaj  ने रात के समय सूपा के दुर्ग पर आक्रमण करके दुर्ग पर अधिकार कर लिया और बाजी मोहिते को शाहजी राजे के पास कर्नाटक भेज दिया। उसकी सेना का कुछ भाग भी Chhatrapati Shivaji Maharaj  की सेवा में आ गया। इसी समय पुरन्दर के किलेदार की मृत्यु हो गई और किले के उत्तराधिकार के लिए उसके तीनों बेटों में लड़ाई छिड़ गई।

 दो भाइयों के निमंत्रण पर Chhatrapati Shivaji Maharaj  पुरन्दर पहुँचे और कूटनीति का सहारा लेते हुए उन्होंने सभी भाइयों को बन्दी बना लिया। इस तरह पुरन्दर के किले पर भी उनका अधिकार स्थापित हो गया।

 अब तक की घटना में Chhatrapati Shivaji Maharaj  को कोई युद्ध या खुनखराबा नहीं करना पड़ा था। १६४७ ईस्वी तक वे चाकन से लेकर नीरा तक के भूभाग के भी अधिपति बन चुके थे। अपनी बढ़ी सैनिक शक्ति के साथ Chhatrapati Shivaji Maharaj  ने मैदानी इलाकों में प्रवेश करने की योजना बनाई।

एक अश्वारोही सेना का गठन कर Chhatrapati Shivaji Maharaj  ने आबाजी सोन्देर के नेतृत्व में कोंकण के विरुद्ध एक सेना भेजी। आबाजी ने कोंकण सहित नौ अन्य दुर्गों पर अधिकार कर लिया। इसके अलावा ताला, मोस्माला और रायटी के दुर्ग भी Chhatrapati Shivaji Maharaj  के अधीन आ गए थे। लूट की सारी सम्पत्ति रायगढ़ में सुरक्षित रखी गई।

 कल्याण के गवर्नर को मुक्त कर Chhatrapati Shivaji Maharaj  ने कोलाबा की ओर रुख किया और यहाँ के प्रमुखों को विदेशियों के खिलाफ़ युद्ध के लिए उकसाया।

शाहजी की बन्दी 

बीजापुर का सुल्तान Shivaji Maharaj  की हरकतों से पहले ही आक्रोश में था। उसने Chhatrapati Shivaji Maharaj  के पिता को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया। शाहजी राजे उस समय कर्नाटक में थे और एक विश्वासघाती सहायक बाजी घोरपड़े द्वारा बन्दी बनाकर बीजापुर लाए गए। 

उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने कुतुबशाह की सेवा प्राप्त करने की कोशिश की थी जो गोलकोंडा का शासक था और इस कारण आदिलशाह का शत्रु। बीजापुर के दो सरदारों की मध्यस्थता के बाद शाहाजी महाराज को इस शर्त पर मुक्त किया गया कि वे Chhatrapati Shivaji Maharaj  पर लगाम कसेंगे। अगले चार वर्षों तक Chhatrapati Shivaji Maharaj ने बीजीपुर के ख़िलाफ कोई आक्रमण नहीं किया। इस दौरान उन्होंने अपनी सेना संगठित की।

शाहजी की मुक्ति की शर्तों के मुताबिक Chhatrapati Shivaji Maharaj ने बीजापुर के क्षेत्रों पर आक्रमण तो नहीं किया पर उन्होंने दक्षिण-पश्चिम में अपनी शक्ति बढ़ाने की चेष्टा की। पर इस क्रम में जावली का राज्य बाधा का काम कर रहा था। यह राज्य सातारा के सुदूर उत्तर पश्चिम में वामा और कृष्णा नदी के बीच में स्थित था।

यहाँ का राजा चन्द्रराव मोरे था जिसने ये जागीर Chhatrapati Shivaji Maharaj से प्राप्त की थी। Chhatrapati Shivaji Maharaj ने मोरे शासक चन्द्रराव को स्वराज मे शमिल होने को कहा पर चन्द्रराव बीजापुर के सुल्तान के साथ मिल गया।

 सन् १६५६ में Shivaji Maharaj ने अपनी सेना लेकर जावली पर आक्रमण कर दिया। चन्द्रराव मोरे और उसके दोनों पुत्रों ने Chhatrapati Shivaji Maharaj के साथ लड़ाई की पर अन्त में वे बन्दी बना लिए गए पर चन्द्रराव भाग गया। स्थानीय लोगों ने Chhatrapati Shivaji Maharaj के इस कृत्य का विरोध किया पर वे विद्रोह को कुचलने में सफल रहे। इससे Chhatrapati Shivaji Maharaj को उस दुर्ग में संग्रहीत आठ वंशों की सम्पत्ति मिल गई। इसके अलावा कई मावल सैनिक मुरारबाजी देशपाडे भी Chhatrapati Shivaji Maharaj की सेना में सम्मिलित हो गए।

मुगलों से पहली मुठभेड़

Chhatrapati Shivaji Maharaj के बीजापुर तथा मुगल दोनों शत्रु थे। उस समय शहज़ादा औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था। इसी समय १ नवम्बर १६५६ को बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की मृत्यु हो गई जिसके बाद बीजापुर में अराजकता का माहौल पैदा हो गया। इस स्थिति का लाभ उठाकर औरंगज़ेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया और Chhatrapati Shivaji Maharaj ने औरंगजेब का साथ देने की बजाय उसपर धावा बोल दिया। 

उनकी सेना ने जुन्नार नगर पर आक्रमण कर ढेर सारी सम्पत्ति के साथ २00 घोड़े लूट लिये। अहमदनगर से ७00 घोड़े, चार हाथी के अलावा उन्होंने गुण्डा तथा रेसिन के दुर्ग पर भी लूटपाट मचाई। इसके परिणामस्वरूप औरंगजेब Chhatrapati Shivaji Maharaj से खफ़ा हो गया और मैत्री वार्ता समाप्त हो गई। शाहजहाँ के आदेश पर औरंगजेब ने बीजापुर के साथ संधि कर ली और इसी समय शाहजहाँ बीमार पड़ गया। उसके व्याधिग्रस्त होते ही औरंगज़ेब उत्तर भारत चला गया और वहाँ शाहजहाँ को कैद करने के बाद मुगल साम्राज्य का शाह बन गया।

बीजापुर से संघर्ष

इधर औरंगजेब के आगरा  लौट जाने के बाद बीजापुर के सुल्तान ने भी राहत की सांस ली। अब Chhatrapati Shivaji Maharaj ही बीजापुर के सबसे प्रबल शत्रु रह गए थे। शाहजी को पहले ही अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने को कहा गया था पर शाहजी ने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर की।

 Chhatrapati Shivaji Maharaj से निपटने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अब्दुल्लाह भटारी (अफ़ज़ल खाँ) को Chhatrapati Shivaji Maharaj के विरूद्ध भेजा। अफ़जल ने 120000 सैनिकों के साथ 1659 में कूच किया। तुलजापुर के मन्दिरों को नष्ट करता हुआ वह सतारा के 30 किलोमीटर उत्तर वाई, शिरवल के नजदीक नामक स्थान तक आ गया। पर Chhatrapati Shivaji Maharaj प्रतापगढ़ के दुर्ग पर ही रहे।

अफजल खाँ ने अपने दूत कृष्णजी भास्कर को सन्धि-वार्ता के लिए भेजा। उसने उसके मार्फत ये संदेश भिजवाया कि अगर Chhatrapati Shivaji Maharaj बीजापुर की अधीनता स्वीकार कर ले तों सुल्तान उसे उन सभी क्षेत्रों का अधिकार दे देंगे जो Chhatrapati Shivaji Maharaj के नियंत्रण में हैं। साथ ही Chhatrapati Shivaji Maharaj को बीजापुर के दरबार में एक सम्मानित पद प्राप्त होगा।

 हालांकि Chhatrapati Shivaji Maharaj के मंत्री और सलाहकार अस संधि के पक्ष मे थे पर Chhatrapati Shivaji Maharaj को ये वार्ता रास नहीं आई। उन्होंने कृष्णजी भास्कर को उचित सम्मान देकर अपने दरबार में रख लिया और अपने दूत गोपीनाथ को वस्तुस्थिति का जायजा लेने अफजल खाँ के पास भेजा।

 गोपीनाथ और कृष्णजी भास्कर से Chhatrapati Shivaji Maharaj को ऐसा लगा कि सन्धि का षडयंत्र रचकर अफजल खाँ Chhatrapati Shivaji Maharaj को बन्दी बनाना चाहता है। अतः उन्होंने युद्ध के बदले अफजल खाँ को एक बहुमूल्य उपहार भेजा और इस तरह अफजल खाँ को सन्धि वार्ता के लिए राजी किया। सन्धि स्थल पर दोनों ने अपने सैनिक घात लगाकर रखे थे मिलने के स्थान पर जब दोनो मिले तब अफजल खाँ ने अपने कट्यार से Chhatrapati Shivaji Maharaj पे वार किया बचाव मे Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अफजल खाँ को अपने वस्त्रों वाघनखो से मार दिया |

अफजल खाँ की मृत्यु के बाद Chhatrapati Shivaji Maharaj ने पन्हाला के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद पवनगढ़ और वसंतगढ़ के दुर्गों पर अधिकार करने के साथ ही साथ उन्होंने रूस्तम खाँ के आक्रमण को विफल भी किया।

 इससे राजापुर तथा दावुल पर भी उनका कब्जा हो गया। अब बीजापुर में आतंक का माहौल पैदा हो गया और वहाँ के सामन्तों ने आपसी मतभेद भुलाकर Chhatrapati Shivaji Maharaj पर आक्रमण करने का निश्चय किया। 2 अक्टूबर 1665 को बीजापुरी सेना ने पन्हाला दुर्ग पर अधिकार कर लिया। Chhatrapati Shivaji Maharaj संकट में फंस चुके थे पर रात्रि के अंधकार का लाभ उठाकर वे भागने में सफल रहे। 

बीजापुर के सुल्तान ने स्वयं कमान सम्हालकर पन्हाला, पवनगढ़ पर अपना अधिकार वापस ले लिया, राजापुर को लूट लिया और श्रृंगारगढ़ के प्रधान को मार डाला। इसी समय कर्नाटक में सिद्दीजौहर के विद्रोह के कारण बीजापुर के सुल्तान ने Chhatrapati Shivaji Maharaj के साथ समझौता कर लिया।

 इस संधि में Chhatrapati Shivaji Maharaj के पिता शाहजी ने मध्यस्थता का काम किया। सन् 1662 में हुई इस सन्धि के अनुसार Chhatrapati Shivaji Maharaj को बीजापुर के सुल्तान द्वारा स्वतंत्र शासक की मान्यता मिली। इसी संधि के अनुसार उत्तर में कल्याण से लेकर दक्षिण में पोण्डा तक (250 किलोमीटर) का और पूर्व में इन्दापुर से लेकर पश्चिम में दावुल तक (150 किलोमीटर) का भूभाग Chhatrapati Shivaji Maharaj के नियंत्रण में आ गया। Chhatrapati Shivaji Maharaj की सेना में इस समय तक 30000 पैदल और 1000 घुड़सवार हो गए थे।

सूरत में लूट

इस जीत से Chhatrapati Shivaji Maharaj की प्रतिष्ठा में इजाफ़ा हुआ। 6 साल शास्ताखान ने अपनी १५०००० फ़ौज लेकर राजा Chhatrapati Shivaji Maharaj का पुरा मुलुख जलाकर तबाह कर दिया था। ईस् लिए उस् का हर्जाना वसूल करने के लिये Chhatrapati Shivaji Maharaj ने मुगल क्षेत्रों में लूटपाट मचाना आरंभ किया। सूरत उस समय पश्चिमी व्यापारियों का गढ़ था और हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिए हज पर जाने का द्वार। यह एक समृद्ध नगर था और इसका बंदरगाह बहुत महत्वपूर्ण था। 

Chhatrapati Shivaji Maharaj ने चार हजार की सेना के साथ छः दिनों तक सूरत को के धनड्य व्यापारि को लूटा आम आदमि को नहि लुटा और फिर लौट गए। इस घटना का जिक्र डच तथा अंग्रेजों ने अपने लेखों में किया है। उस समय तक यूरोपीय व्यापारियों ने भारत तथा अन्य एशियाई देशों में बस गये थे। नादिर शाह के भारत पर आक्रमण करने तक (1739) किसी भी य़ूरोपीय शक्ति ने भारतीय मुगल साम्राज्य पर आक्रमण करने की नहीं सोची थी।

सूरत में Chhatrapati Shivaji Maharaj की लूट से खिन्न होकर औरंगजेब ने इनायत खाँ के स्थान पर गयासुद्दीन खां को सूरत का फौजदार नियुक्त किया। और शहजादा मुअज्जम तथा उपसेनापति राजा जसवंत सिंह की जगह दिलेर खाँ और राजा जयसिंह की नियुक्ति की गई। राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे सामन्तों का सहयोग लेकर Chhatrapati Shivaji Maharaj पर आक्रमण कर दिया। 

इस युद्ध में Chhatrapati Shivaji Maharaj को हानि होने लगी और हार की सम्भावना को देखते हुए Chhatrapati Shivaji Maharaj ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा। जून 1665 में हुई इस सन्धि के मुताबिक Chhatrapati Shivaji Maharaj 23 दुर्ग मुग़लों को दे देंगे और इस तरह उनके पास केवल 12 दुर्ग बच जाएंगे। 

इन 23 दुर्गों से होने वाली आमदनी 4 लाख हूण सालाना थी। बालाघाट और कोंकण के क्षेत्र Chhatrapati Shivaji Maharaj को मिलेंगे पर उन्हें इसके बदले में 13 किस्तों में 40 लाख हूण अदा करने होंगे। इसके अलावा प्रतिवर्ष 5 लाख हूण का राजस्व भी वे देंगे। Chhatrapati Shivaji Maharaj स्वयं औरंगजेब के दरबार में होने से मुक्त रहेंगे पर उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में खिदमत करनी होगी। बीजापुर के खिलाफ Chhatrapati Shivaji Maharaj मुगलों का साथ देंगे।

राज्याभिषेक

सन् १६७४ तक Chhatrapati Shivaji Maharaj ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरन्दर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुग़लों को देने पड़े थे।

पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया। Chhatrapati Shivaji Maharaj के निजी सचिव बालाजी आव जी ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और उन्होंने ने काशी में गंगाभ नमक ब्राह्मण के पास तीन दूतो को भेजा, किन्तु गंगा ने प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योकि Chhatrapati Shivaji Maharaj क्षत्रिय नहीं थे उसने कहा की क्षत्रियता का प्रमाण लाओ तभी वह राज्याभिषेक करेगा | 

बालाजी आव जी ने Chhatrapati Shivaji Maharaj का सम्बन्ध मेवार के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे जिससे संतुष्ट होकर वह रायगढ़ आया | किन्तु यहाँ आने के बाद जब उसने पुन जाँच पड़ताल की तो उसने प्रमाणों को गलत पाया और राज्याभिषेक से मना कर दिया। अंतत: मजबूर होकर उसे एक लाख रुपये के प्रलोभन दिया गया तब उसने राज्याभिषेक किया।

 राज्याभिषेक के बाद भी पूना के ब्राह्मणों ने Chhatrapati Shivaji Maharaj को राजा मानने से मना कर दिया विवश होकर Chhatrapati Shivaji Maharaj को अष्टप्रधान मंडल की स्थापना करनी पड़ी। विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। Chhatrapati Shivaji Maharaj ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की।

 काशी के पण्डित विशेश्वर जी भट्ट को इसमें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। पर उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इस कारण से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ। दो बार हुए इस समारोह में लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए। इस समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था।

 विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को Chhatrapati Shivaji Maharaj के विरुद्ध भेजा पर वे असफल रहे।

दक्षिण में दिग्विजय

सन् 1677-78 में Chhatrapati Shivaji Maharaj का ध्यान कर्नाटक की ओर गया। बम्बई के दक्षिण मे कोंकण, तुंगभद्रा नदी के पश्चिम में बेलगाँव तथा धारवाड़ का क्षेत्र, मैसूर, वैलारी, त्रिचूर तथा जिंजी पर अधिकार करने के बाद 4 अप्रैल, 1680 को Chhatrapati Shivaji Maharaj का देहांत हो गया।

विजय अभियान

Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अपना असली विजय अभियान 1656 में आरम्भ किया, जब उन्होंने मराठा सरदार चंद्रराव मोरे से जावली छीन लिया। जावली का राज्य तथा वहाँ मोरों का ख़ज़ाना बहुत महत्त्वपूर्ण था और Chhatrapati Shivaji Maharaj ने इस पर षड़यंत्र रचकर क़ब्ज़ा कर लिया। जावली की विजय से वह मावल क्षेत्र के शासक हो गये और सतारा तथा कोंकण तक का रास्ता उनके लिए साफ़ हो गया। मावल के पैदल सैनिक Chhatrapati Shivaji Maharaj की सेना के प्रमुख अंग बन गये। उनकी सहायता से Chhatrapati Shivaji Maharaj ने पूना के निकट और भी कई पहाड़ी क़िलों को जीतकर अपनी स्थिति खूब मज़बूत कर ली। 

औरंगज़ेब की नीति 1657 में बीजापुर पर मुग़लों के आक्रमण के कारण Chhatrapati Shivaji Maharaj बीजापुर के जवाबी हमले से बच गये। उन्होंने मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के साथ पहले बातचीत का तरीक़ा अपनाया तथा औरंगज़ेब से उन सभी बीजापुरी क्षेत्रों, जो उनके अधिकार में थे, के अलावा कोंकण में दभौल बंदरगाह तथा अन्य क्षेत्रों की माँग की। लेकिन इसके बाद Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अपना रुख़ बदल लिया और मुग़ल क्षेत्रों पर ही आक्रमण कर बड़ी मात्रा में धन लूटा।

जब औरंगज़ेब का बीजापुर के नये शासक के साथ समझौता हो गया, तब उसने Chhatrapati Shivaji Maharaj को भी क्षमा कर दिया। लेकिन औरंगज़ेब को अभी भी Chhatrapati Shivaji Maharaj पर भरोसा नहीं था और उसने बीजापुर के शासक को सलाह दी कि वह Chhatrapati Shivaji Maharaj को उन सभी बीजापुरी क्षेत्रों से निकाल दे, जिन पर Chhatrapati Shivaji Maharaj ने कब्ज़ा कर रखा था। औरंगज़ेब ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि बीजापुर का शासक Chhatrapati Shivaji Maharaj को अपनी सेवा में रखना चाहे भी तो उसे मुग़ल सीमा के पार कर्नाटक में रखे।

अफ़ज़ल खाँ की हत्या

अपने विजय अभियानों के कारण Chhatrapati Shivaji Maharaj का नाम घर-घर में फैल गया और लोग उनकी जादुई शक्तियों के बारे में चर्चा करने लगे थे। मराठा क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग उनकी सेना में भरती होने के लिए आने लगे। यहाँ तक की पेशेवर अफ़ग़ान सैनिक, जो पहले बीजापुर की सेवा में थे, वे भी Chhatrapati Shivaji Maharaj की सेना में भरती हो गये। उधर मुग़ल सीमा के इतने नज़दीक मराठों की शक्ति को बढ़ता देखकर औरंगज़ेब चिन्चित था। 1636 की संधि के अंतर्गत पूना तथा आसपास के क्षेत्रों, जो पहले अहमदनगर राज्य का हिस्सा थे, को बीजापुर को दे दिया गया था। अब मुग़लों ने इन क्षेत्रों पर अपना दावा किया। 

औरंगज़ेब जैसे ही उत्तर में लौटा, Chhatrapati Shivaji Maharaj ने एक बार फिर बीजापुर के क्षेत्रों के ही विरुद्ध अभियान आरम्भ कर दिया। उन्होंने कोंकण के पहाड़ तथा समुद्र के बीच के तटीय क्षेत्र पर हमला किया तथा उत्तरी भाग पर अपना कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने कई अन्य पहाड़ी क़िले भी जीते। बीजापुर के शासक ने Chhatrapati Shivaji Maharaj के ख़िलाफ़ अब कड़ी कार्यवाई करने की सोची।

 उसने बीजापुर के प्रमुख सरदार अफ़ज़ल ख़ाँ को दस हज़ार सैनिकों के साथ Chhatrapati Shivaji Maharaj के ख़िलाफ़ भेजा। अफ़ज़ल ख़ाँ का आदेश था कि वह किसी भी तरह से Chhatrapati Shivaji Maharaj को बंदी बना ले। उन दिनों षड़यंत्रों तथा धोखाधड़ी से काम लेना एक आम बात थी और अफ़ज़ल ख़ाँ तथा शिवाजी, दोनों ने कई अवसरों पर ऐसे तरीक़े अपनाये थे।

 Chhatrapati Shivaji Maharaj की सेना खुले मैदान में युद्ध करने की आदी नहीं थी और वह इस शक्तिशाली सेना से खुले मैदान में लड़ाई करने से हिचकिचा रही थी। अफ़ज़ल ख़ाँ ने Chhatrapati Shivaji Maharaj को एक व्यक्तिगत भेंट के लिए एक संदेश भेजा और इस बात का वायदा किया कि वह बीजापुर दरबार से उसे क्षमा दिलवा देगा। 

Chhatrapati Shivaji Maharaj को विश्वास था कि यह धोखा है, फिर भी वे उस भेंट के लिए पूरी तरह तैयार होकर गये और चालाकी तथा साहस के साथ 1659 में अफ़ज़ल ख़ाँ की हत्या कर डाली। 

इसके बाद Chhatrapati Shivaji Maharaj ने उसकी नेतृत्वहीन सेना को तितर-बितर कर दिया तथा सारे साज़ो-समान और तोपख़ाने पर कब्ज़ा कर लिया। इस विजय से मराठा सेना की हिम्मत बढ़ गयी और उसने पन्हाला के मज़बूत क़िले पर भी क़ब्ज़ा कर लिया तथा दक्षिण कोंकण और कोल्हापुर के ज़िलों में कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।

आगरा यात्रा

अपनी सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन प्राप्त कर Chhatrapati Shivaji Maharaj आगरा के दरबार में औरंगज़ेब से मिलने के लिए तैयार हो गये। वह 9 मई, 1666 ई को अपने पुत्र शम्भाजी एवं 4000 मराठा सैनिकों के साथ मुग़ल दरबार में उपस्थित हुए, परन्तु औरंगज़ेब द्वारा उचित सम्मान न प्राप्त करने पर Chhatrapati Shivaji Maharaj ने भरे हुए दरबार में औरंगज़ेब को ‘विश्वासघाती’ कहा, जिसके परिणमस्वरूप औरंगज़ेब ने Chhatrapati Shivaji Maharaj एवं उनके पुत्र को ‘जयपुर भवन’ में क़ैद कर दिया। 

वहाँ से Chhatrapati Shivaji Maharaj 13 अगस्त, 1666 ई को फलों की टोकरी में छिपकर फ़रार हो गये और 22 सितम्बर, 1666 ई. को रायगढ़ पहुँचे। कुछ दिन बाद Chhatrapati Shivaji Maharaj ने मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को पत्र लिखकर कहा कि “यदि सम्राट उसे (शिवाजी) को क्षमा कर दें तो वह अपने पुत्र शम्भाजी को पुनः मुग़ल सेवा में भेज सकते हैं।” औरंगज़ेब ने Chhatrapati Shivaji Maharaj की इन शर्तों को स्वीकार कर उसे ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की।

 जसवंत सिंह की मध्यस्थता से 9 मार्च, 1668 ई. को पुनः Chhatrapati Shivaji Maharaj और मुग़लों के बीच सन्धि हुई। इस संधि के बाद औरंगज़ेब ने Chhatrapati Shivaji Maharaj को बरार की जागीर दी तथा उनके पुत्र शम्भाजी को पुनः उसका मनसब 5000 प्रदान कर दिया। 

1667-1669 ई. के बीच के तीन वर्षों का उपयोग Chhatrapati Shivaji Maharaj ने विजित प्रदेशों को सुदृढ़ करने और प्रशासन के कार्यों में बिताया। 1670 ई. में Chhatrapati Shivaji Maharaj ने ‘पुरन्दर की संधि’ का उल्लंघन करते हुए मुग़लों को दिये गये 23 क़िलों में से अधिकांश को पुनः जीत लिया। तानाजी मालसुरे द्वारा जीता गया ‘कोंडाना’, जिसका फ़रवरी, 1670 ई. में Chhatrapati Shivaji Maharaj ने नाम बदलकर ‘सिंहगढ़’ रखा दिया था, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क़िला था। 

13 अक्टूबर, 1670 ई. को Chhatrapati Shivaji Maharaj ने तीव्रगति से सूरत पर आक्रमण कर दूसरी बार इस बन्दरगाह नगर को लूटा। Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अपनी इस महत्त्वपूर्ण सफलता के बाद दक्षिण की मुग़ल रियासतों से हीं नहीं, बल्कि उनके अधीन राज्यों से भी ‘चौथ’ एवं ‘सरदेशमुखी’ लेना आरम्भ कर दिया।

 15 फ़रवरी, 1671 ई. को ‘सलेहर दुर्ग’ पर भी Chhatrapati Shivaji Maharaj ने क़ब्ज़ा कर लिया। Chhatrapati Shivaji Maharaj के विजय अभियान को रोकने के लिए औरंगज़ेब ने महावत ख़ाँ एवं बहादुर ख़ाँ को भेजा। इन दोनों की असफलता के बाद औरंगज़ेब ने बहादुर ख़ाँ एवं दिलेर ख़ाँ को भेजा। 

इस तरह 1670-1674 ई. के मध्य हुए सभी मुग़ल आक्रमणों में Chhatrapati Shivaji Maharaj को ही सफलता मिली और उन्होंने सलेहर, मुलेहर, जवाहर एवं रामनगर आदि क़िलों पर अधिकार कर लिया। 1672 ई. में Chhatrapati Shivaji Maharaj ने पन्हाला दुर्ग को बीजापुर से छीन लिया। मराठों ने पाली और सतारा के दुर्गों को भी जीत लिया। 

Chhatrapati Shivaji Maharaj की ख्याति

अपने विजय अभियानों के कारण Chhatrapati Shivaji Maharaj का नाम घर-घर में फैल गया और लोग उनकी जादुई शक्तियों के बारे में चर्चा करने लगे थे। मराठा क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग उनकी सेना में भरती होने के लिए आने लगे। 

यहाँ तक की पेशेवर अफ़ग़ान सैनिक, जो पहले बीजापुर की सेवा में थे, वे भी Chhatrapati Shivaji Maharaj की सेना में भरती हो गये। उधर मुग़ल सीमा के इतने नज़दीक मराठों की शक्ति को बढ़ता देखकर औरंगज़ेब चिन्चित था। 1636 की संधि के अंतर्गत पूना तथा आसपास के क्षेत्रों, जो पहले अहमदनगर राज्य का हिस्सा थे, को बीजापुर को दे दिया गया था। अब मुग़लों ने इन क्षेत्रों पर अपना दावा किया। 

औरंगज़ेब ने दक्कन के नये मुग़ल प्रशासक शाइस्ता ख़ाँ, जो औरंगज़ेब का सम्बन्धी भी था, को Chhatrapati Shivaji Maharaj के क्षेत्रों पर आक्रमण करने का आदेश दिया। बीजापुर के शासक आदिलशाह से भी सहयोग देने के लिए कहा गया। आदिलशाह ने अबीसीनियाई सरदार सिद्दी जौहर को भेजा। उसने पन्हाला में Chhatrapati Shivaji Maharaj को घेर लिया।

Chhatrapati Shivaji Maharaj यहाँ से भाग निकले। लेकिन पन्हाला पर बीजापुर के सैनिकों का क़ब्ज़ा हो गया। आदिलशाह Chhatrapati Shivaji Maharaj को पूरी तरह नष्ट नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने Chhatrapati Shivaji Maharaj के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

 इसके विपरीत उसने शीघ्र ही Chhatrapati Shivaji Maharaj से एक गुप्त समझौता कर लिया। अब Chhatrapati Shivaji Maharaj मुग़लों का मुक़ाबला करने के लिए स्वतंत्र था। 

मृत्यु और उत्तराधिकार

तीन सप्ताह की बीमारी के बाद Chhatrapati Shivaji Maharaj की मृत्यु अप्रैल 1680 में हुई। उस समय Chhatrapati Shivaji Maharaj के उत्तराधिकार शम्भाजी को मिले। Chhatrapati Shivaji Maharaj के ज्येष्ठ पुत्र शम्भाजी थे और दूसी पत्नी से राजाराम नाम एक दूसरा पुत्र था। उस समय राजाराम की उम्र मात्र 10 वर्ष थी अतः मराठों ने शम्भाजी को राजा मान लिया। 

उस समय औरंगजेब राजा Chhatrapati Shivaji Maharaj का देहान्त देखकर अपनी पूरे भारत पर राज्य करने कि अभिलाशा से अपनी ५,००,००० सेना सागर लेकर दक्षिण भारत जीतने निकला। औरंगजेब ने दक्षिण मे आतेही अदिल्शाहि २ दिनो मे ओर कुतुबशहि १ हि दिनो में खतम कर दी। पर राजा सम्भाजी के नेतृत्व मे मराठाओ ने ९ साल युद्ध करते हुये अपनी स्वतन्त्रता बरकरार रखी। औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह कर दिया।

 शम्भाजी ने उसको अपने यहाँ शरण दी। औरंगजेब ने अब फिर जोरदार तरिकेसे शम्भाजी के खिलाफ आक्रमण करना शुरु किया। उसने अंततः 1689 में संभाजी के बिवी के सगे भाई ने याने गणोजी शिर्के की मुखबरी से शम्बाजी को मुकरव खाँ द्वारा बन्दी बना लिया। औरंगजेब ने राजा सम्भाजी को बदसुलुकि ओउर बुरी हाल कर के मार दिया।

 अपनी राजा को औरंगजेब ने बदसुलुकि ओउर बुरी हाल मारा हुआ देखकर सबी मराठा स्वराज्य क्रोधीत हुआ। उन्होने अपनी पुरी ताकद से तीसरा राजा राम के नेत्रुत्व मे मुगलों से संघर्ष जारी रखा। 1700 इस्वी में राजाराम की मृत्यु हो गई। उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने 4 वर्षीय पुत्र Chhatrapati Shivaji Maharaj द्वितीय की संरक्षिका बनकर राज करती रही। आखिरकार २५ साल मराठा स्वराज्य के यूदध लडके थके हुये औरंगजेब की उसी छ्त्रपती Chhatrapati Shivaji Maharaj के स्वराज्य मे दफन हुये।

शासन और व्यक्तित्व

Chhatrapati Shivaji Maharaj को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाने जाते है हँलांकि उनको अपने बचपन में पारम्परिक शिक्षा कुछ खास नहीं मिली थी। पर वे भारतीय इतिहास और राजनीति से वाकिफ़ थे। उनने शुक्राचार्य तथा कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लेना कई बार उचित समझा था। अपने समकालीन मुगलों की तरह वह् भी निरंकुश शासक थ, अर्थात शासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी। पर उस्के प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था।

 इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहते थे जो राजा के बाद सबसे प्रमुख हस्ती था। अमात्य वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था तो मंत्री राजा की व्यक्तिगत दैनन्दिनी का खयाल रखाता था। सचिव दफ़ातरी काम करते थे जिसमे शाही मुहर लगाना और सन्धि पत्रों का आलेख तैयार करना शामिल होते थे। सुमन्त विदेश मंत्री था। सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे। दान और धार्मिक मामलों के प्रमुख को पण्डितराव कहते थे। न्यायाधीश न्यायिक मामलों का प्रधान था।

मराठा साम्राज्य तीन या चार विभागों में विभक्त था। प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था। हरेक सूबेदार के पास भी एक अष्टप्रधान समिति होती थी। कुछ प्रान्त केवल करदाता थे और प्रसासन के मामले में स्वतंत्र। न्यायव्यवस्था प्राचीन पद्धति पर आधारित थी। शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्म शास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था। गाँव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जाँच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमिकर था पर चौथ और सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। 

चौथ पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिया वसूलेजाने वाला कर था। Chhatrapati Shivaji Maharaj अपने को मराठों का सरदेशमुख कहता थ और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था।

धार्मिक नीति

Chhatrapati Shivaji Maharaj एक समर्पित हिन्दु थे तथा वह् धार्मिक सहिष्णु भी थे। उस्के साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी। कई मस्जिदों के निर्माण के लिए Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अनुदान दिया।

 हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी सम्मान प्राप्त था। उन क़ि सेना में मुसलमान सैिनीक भी थे । Chhatrapati Shivaji Maharaj हिन्दू संकृती को बढ़ावा देते थे। पारम्परिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था। वह् अपने अभियानों का आरंभ भी अक्सर दशहरा के मौके पर करते थे

चरित्र

Chhatrapati Shivaji Maharaj  को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा ही मिली जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की तरह उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को छुड़वा लिया। 

इससे उनके चरित्र में एक उदार अवयव ऩजर आता है। उसेक बाद उन्होंने पिता की हत्या नहीं करवाई जैसा कि अन्य सम्राट किया करते थे। शाहजी राजे के मरने के बाद ही उन्होने अपना राज्याभिषेक करवाया हँलांकि वो उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे।

 उनके नेतृत्व को सब लोग स्वीकार करते थे यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी।

Chhatrapati Shivaji Maharaj Video


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Conclusion:

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