Akbar Birbal ki Kahaniyan | 27 अकबर बीरबल की कहानियाँ

नमस्ते दोस्तों आज हम Akbar Birbal ki Kahaniyan के बारे में बात करने वाले हैं, तो दोस्तों हम आपके लिए 27 अकबर बीरबल की कहानियां लाए हैं, चले Akbar Birbal ki Kahaniyan जानते हैं जो आपको बहुत ही पसंद आएगी जो बहुत ही मजेदार और रोचक आपको हमने बताई है.

Akbar Birbal ki Kahaniyan | 27 अकबर बीरबल की कहानियाँ

Akbar Birbal ki Kahaniyan
Akbar Birbal ki Kahaniyan | 27 अकबर बीरबल की कहानियाँ

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बीरबल ने चोर को पकड़ा

Akbar Birbal ki Kahaniyan 1: एक बार राजा अकबर के प्रदेश में चोरी हई। इस चोरी में एक चोर नें एक व्यापारी के घर से बहुत ही कीमती सामान चुरा लिया था। उस व्यापारी को इस बात पर तो पूरा विश्वास था कि चोर उसी के 10 नौकरों में से कोई एक था पर वह यह नहीं जानता था की वह कौन है।

यह जानने के लिए की चोर कौन है ! वह व्यापारी बीरबल के पास गया और उसने बीरबल से मदद मांगी। बीरबल नें भी इस बात पर हाँ कर दिया और अपने सिपाहियों से कहा कि सभी 10 नौकरों को कारागार/जेल में डाल दिया जाये। यह सुनते ही उसी दिन सिपाहियों द्वारा सभी नौकरों को पकड़ लिया गया। बीरबल नें सबसे पुछा कि चोरी किसने किया है परन्तु किसी नें भी यह मानने को इंकार कर दिया की चोरी उसने किया है।

बीरबल नें थोड़ी देर सोचा, और कुछ देर बाद वह दस समान लम्बाई की छड़ी ले कर आये और सभी चुने हुए लोगों को एक-एक छड़ी पकड़ा दिया। पर छड़ी पकडाते हुए बीरबल नें एक बात कहा ! उस इंसान की छड़ी 2 इंच बड़ी हो जाएगी जिस व्यक्ति नें यह चोरी की है।

यह कह कर बीरबल चले गए और अपने सिपाहियों को निर्देश दिया की सुबह तक उनमें से किसी भी व्यक्ति को छोड़ा ना जाये।
जब बीरबल नें सुबह सभी नौकरों की छड़ी को ध्यान से देखा तो पता चला उनमें से एक नौकर की छड़ी 2 इंच छोटी थी। यह देकते ही बीरबल ने कहा ! यही है चोर।

बाद में यह देख-कर उस व्यापारी नें बीरबल से प्रश् किया कि कैसे उन्हें पता चला की चोर वही है। बीरबल नें कहा कि चोर नें अपने छड़ी के 2 इंच बड़े हो जाने के डर से रात के समय ही अपने छड़ी को 2 इंच छोटा कर दिया था।

दोस्तों Akbar Birbal ki Kahaniyan हमें क्या शिक्षा मिली:

सत्य कभी नहीं छुपता इसलिए जीवन में कभी भी झूट मत बोलो।

( अकबर बीरबल की कहानियाँ ) बख्तर की परीक्षा

Akbar Birbal ki Kahaniyan 2: एक बार अकबर बादशाह ने एक कारीगर को बख्तर बंद लोहे का वस्त्र, जिसे फौजी युद्ध के अवसर पर धारण करते हैं बनाने का आदेश दिया। राजा के आदेशनुसार कुछ दिन के बाद कारीगर ने बख्तर बंद तैयार करके बादशाह के सामने हाजिर कर दिया।

इसे बनाने में कारीगर ने कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। अकबर बादशाह को वह लोहे का वस्त्र बहुत पंसद आया, लेकिन दूसरे ही क्षण उन्हें उसकी मजबूती पर शक होने लगा। उन्होेन वह वस्त्र एक टाट के पुतले को पहनाने की आज्ञा दी और तलवार लेकर स्वयं उसकी मजबूती की परीक्षा के लिए आगे बडे। जैसे ही अकबर ने उस बखतर बंद पर वार किया वह एक वार में ही फट गया।

यह देख बादशाह क्रोधित हो उठे और बोले इतना कमजोर बख्तर….. अरे मूर्ख इसे हम बिना परखे किसी युद्ध में ले जाते तो इससे क्या बचाव होता ? जाओं दूसरा मजबूत बख्तर बनाकर लाओं मगर याद रहे वह भी इसकी तरह कमजोर हुआ तो तुम्हारी गरदन उडा दी जायेगीं |

अकबर बादशाह का क्रोध पूर्ण हुक्म सुनकर कारीगर भयभीत हो गया लेकिन वह करता भी क्या, वह अकबर बादशाह को अदब से सलाम करके अपने घर वापस लौट आया। उसका उतरा चेहरा देखकर उसकी पत्नी ने कारण पूछा,

तब कारीगर ने अकबर बादशाह की आज्ञा की बात बताते हुए कहा अब मेरी जान बचनी कठिन है। उसकी पत्नी बहुत चतुर थी, कहने लगी क्यो जरा सी बात पर भयभीत होते हो, बीरबल के पास जाकर बचने का कोई उपाय क्यों नही पूछते ? पत्नी की बात से प्रोत्साहित होकर कारीगर बीरबल के पास गया और सारी बातें बताकर प्राणदान की प्रार्थना की।

बीरबल ने उसे ढांढस बनाते हुए कहा तुम अकबर बादशाह के यहाँ वह लोहे का बख्तर बनाकर ले जाना जब अकबर बादशाह काठ के पुतले को बख्तर पहनाने की आज्ञा दे तो उनसे कहना इसकी परीक्षा काठ के पुतले पर नहीं हो सकती मैं स्वयं इसको धारण कर लेता हूं, तब अकबर बादशाह अवश्य तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे किन्तु ध्यान रखना जैसे ही बख्तर पर तलवार चलाने के लिए वे या कोई और झपटे वैसे ही तुम एकाएक चिल्लाकर बडी भंयकर स्थिति उत्पन्न कर देना।

ताकि उसका हाथ कांप जायें और वह व्याकुल होकर दूर खडा हो जाए, यदि उपयुक्त कार्य भली भांति कर सके तो निष्चित ही तुमहारे प्राण बच जायेंगे। अकबर बादशाह के पूछने पर कारण यह बताना कि मेरे इस बख्तर को पहनने वाला काठ का पुतला तो होगा नहीं कुछ न कुछ शक्ति तो अवष्य रखता होगा फिर वह अपने प्रतिद्वंदी को अपने आस-पास ही क्यो फटकने देगा?

और यदि कोई दुश्मन पास आ भी जाये तो बख्तरबंद पहनने वाले की शकी का कुछ न कुछ खौफ तो होगा ही और वह इस तरह आसानी से बख्तर तोड नही पायेगा। बीरबल की बताई हुई युक्ति कारीगर को समझ में आ गई। दो-तीन दिन बाद लोहे का दूसरा बख्तर बनाकर वह अकबर बादशाह के दरबार में गया। अकबर बादशाह ने बख्तर पुनः काठ के पुतले को पहनाने की आज्ञा दी।

कारीगर ने बीरबल की बताई बात को देाहराकर अकबर से प्रार्थना की कि उसी के शारीर पर बख्तर की परीक्षा हो अकबर बादशाह ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और एक चतुर सिपाही को होशियारी से लतवार चलाकर बख्तर की परीक्षा लेने की आज्ञा दी।

सिपाही ने जैसे ही तलवार चलाने को उठाई वैसे ही बडे जोर से कडक कर कारीगर सिपाही की तरफ लपका सिपाही की तलवार उठी की उठी रह गई और वह भयभीत होकर दूर जाकर खडा हुआं

अकबर बादशाह ने कारीगर से ऐसा करने का कारण पूछा कारीगर ने बीरबल के सिखाये अनुसार अकबर को जवाब दे दिया। अकबर बादशाह यह सुनकर बोले, कारीगर तुम्हारी बात तो ठीक हैं परन्तु सच सच बताओं तुम्हें यह सलाह किसने दी ? करीगर ने सच्ची बात भरे दरबार मे कह दी। बीरबल की चतुराई से अकबर बादशाह ओर सभी दरबारी अत्यधिक प्रसन्न हुए।( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

प्रश्न के बदले प्रश्न ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 3: एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा, बीरबल, क्या तुम बता सकते हो कि मेरी पत्नी के हाथों में कितनी चुडीयाँ हैं? बीरबल ने कहा, हुज़ूर, माफ किजीये मुझे नहीं मालूम. क्यों, तुम तो रोज़ ही मेरी पत्नी के हाथों को देखते हो तुम्हें पता होना चाहिये, अकबर ने गुस्से से कहा.

बीरबल ने कहा, महाराज चलिये जरा बाग की तरफ चलते हैं. वहाँ मैं आपको बताउँगा कि इस प्रश्न का उत्तर मुझे क्यों नहीं पता. और दोनो बाग की तरफ चल दिये. चलते-चलते वे बाग कि सीढीयों की तरफ बढे. अचानक बीरबल ने कहा, महारज, आप दिन में कई बार इन सिढीयों से चढते उतरते हैं, क्या आप बता सकते हैं कि ये कितनी सिढीयाँ हैं.

सुनकर अकबर केवल मुसकुराये और विषय बदल दिया.( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) सबसे बड़ी चीज

Akbar Birbal ki Kahaniyan 4: एक दिन बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं थे। ऐसे में बीरबल से जलने वाले सभी सभासद बीरबल के खिलाफ अकबर के कान भर रहे थे। अकसर ऐसा ही होता था, जब भी बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं होते थे, तभी दरबारियों को मौका मिल जाता था। आज भी ऐसा ही मौका था।

बादशाह के साले मुल्ला दो प्याजा की शह पाए कुछ सभासदों ने कहा-जहांपनाह ! आप वास्तव में बीरबल को आवश्यकता से अधिक मान देते हैं, हम लोगों से ज्यादा उन्हें चाहते हैं। आपने उन्हें बहुत सिर चढ़ा रखा है। जबकि जो काम वे करते हैं, वह हम भी कर सकते हैं। मगर आप हमें मौका ही नहीं देते।

बादशाह को बीरबल की बुराई अच्छी नहीं लगती थी, अतः उन्होंने उन चारों की परीक्षा ली-देखो, आज बीरबल तो यहाँ हैं नहीं और मुझे अपने एक सवाल का जवाब चाहिए। यदि तुम लोगों ने मेरे प्रश्न का सही-सही जवाब नहीं दिया तो मैं तुम चारों को फांसी पर चढ़वा दूंगा। बादशाह की बात सुनकर वे चारों घबरा गए।

उनमें से एक ने हिम्मत करके कहा-प्रश्न बताइए बादशाह सलामत ? संसार में सबसे बड़ी चीज क्या है ? और अच्छी तरह सोच-समझ कर जवाब देना वरना मैं कह चुका हूं कि तुम लोगों को फांसी पर चढ़वा दिया जाएगा। बादशाह अकबर ने कहा- अटपटे जवाब हरगिज नहीं चलेंगे। जवाब एक हो और बिलकुल सही हो। बादशाह सलामत ? हमें कुछ दिनों की मोहलत दी जाए। उन्होंने सलाह करके कहा।

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ठीक है, तुम लोगों को एक सप्ताह का समय देता हूं। बादशाह ने कहा।

चारों दरबारी चले गए और दरबार से बाहर आकर सोचने लगे कि सबसे बड़ी चीज क्या हो सकती है ?

एक दरबारी बोला-मेरी राय में तो अल्लाह से बड़ा कोई नहीं।

अल्लाह कोई चीज नहीं है। कोई दूसरा उत्तर सोचो। दूसरा बोला।

सबसे बड़ी चीज है भूख जो आदमी से कुछ भी करवा देती है। तीसरे ने कहा।

नहीं…नहीं, भूख भी बरदाश्त की जा सकती है।

फिर क्या है सबसे बड़ी चीज ? छः दिन बीत गए लेकिन उन्हें कोई उत्तर नहीं सूझा। हार कर वे चारों बीरबल के पास पहुँचे और उसे पूरी घटना कह सुनाई, साथ ही हाथ जोड़कर विनती की कि प्रश्न का उत्तर बता दें।

बीरबल ने मुस्कराकर कहा-मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। हमें आपकी हजार शर्तें मंजूर हैं। चारों ने एक स्वर में कहा-बस आप हमें इस प्रश्न का उत्तर बताकर हमारी जान बख्शी करवाएं। बताइए आपकी क्या शर्त है ? तुम में से दो अपने कन्धों पर मेरी चारपाई रखकर दरबार तक ले चलोगे। एक मेरा हुक्का पकड़ेगा, एक मेरे जूते लेकर चलेगा। बीरबल ने अपनी शर्त बताते हुए कहा।

यह सुनते ही वे चारों सन्नाटे में आ गए। उन्हें लगा मानो बीरबल ने उनके गाल पर कसकर तमाचा मार दिया हो। मगर वे कुछ बोले नहीं। अगर मौत का खौफ न होता तो वे बीरबल को मुंहतोड़ जवाब देते, मगर इस समय मजबूर थे, अतः तुरन्त राजी हो गए।

दो ने अपने कन्धों पर बीरबल की चारपाई उठाई, तीसरे ने उनका हुक्का और चौथा जूते लेकर चल दिया। रास्ते में लोग आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे। दरबार में बादशाह ने भी यह मंजर देखा और वह मौजूद दरबारियों ने भी। कोई कुछ न समझ सका।

तभी बीरबल बोले-महाराज ? दुनिया में सबसे बड़ी चीज है-गरज। अपनी गरज से ये पालकी यहां तक उठाकर लाए हैं। बादशाह मुस्कराकर रह गए। वे चारों सिर झुकाकर एक ओर खड़े हो गए।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) बीरबल और तानसेन का विवाद

Akbar Birbal ki Kahaniyan 5: तानसेन और बीरबल में किसी बात को लेकर विवाद हो गया। दोनों ही अपनी-अपनी बात पर अटल थे। हल निकलता न देख दोनों बादशाह की शरण में गए। बादशाह अकबर को अपने दोनों रत्न प्रिय थे। वे किसी को भी नाराज नहीं करना चाहते थे, अतः उन्होंने स्वयं फैसला न देकर किसी और से फैसला कराने की सलाह दी।

हुजूर, जब आपने किसी और से फैसला कराने को कहा है तो यह भी बता दें कि हम किस गणमान्य व्यक्ति से अपना फैसला करवाएं ? बीरबल ने पूछा।

तुम लोग महाराणा प्रताप से मिलो, मुझे यकीन है कि वे इस मामले में तुम्हारी मदद जरूर करेंगे। बादशाह अकबर ने जवाब दिया।

अकबर की सलाह पर तानसेन और बीरबल महाराणा प्रताप से मिले और अपना-अपना पक्ष रखा। दोनों की बातें सुनकर महाराणा प्रताप कुछ सोचने लगे, तभी तानसेन ने मधुर रागिनी सुनानी शुरू कर दी। महाराणा मदहोश होने लगे। जब बीरबल ने देखा कि तानसेन अपनी रागिनी से महाराणा को अपने पक्ष में कर रहा है.

तो उससे रहा न गया, तुरन्त बोला—महाराणाजी, अब मैं आपको एक सच्ची बात बताने जा रहा हूं, जब हम दोनों आपके पास आ रहे थे तो मैंने पुष्कर जी में जाकर प्रार्थना की थी कि मेरा पक्ष सही होगा तो सौ गाय दान करूंगा; और मियां तानसेन जी ने प्रार्थना कर यह मन्नत मांगी कि यदि वह सही होंगे तो सौ गायों की कुर्बानी देंगे। महाराणा जी अब सौ गायों की जिंदगी आपके हाथों में है।

बीरबल की यह बात सुनकर महाराणा चौंक गए। भला एक हिंदू शासक होकर गो हत्या के बारे में सोच कैसे सकते थे। उन्होंने तुरन्त बीरबल के पक्ष को सही बताया।

जब बादशाह अकबर को यह बात पता चली तो वह बहुत हंसे।( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

बीरबल और लालची दुकानदार ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 6: एक बार बीरबल को शहर के लोगों ने आकर एक लालची बर्तनों के दूकानदार के बारे में शिकायत की कि वह बहुत लालची है | उसे सबक सिखाओ | यह सुनकर बीरबल दुकानदार के पास गए और वहां से तीन बड़े-बड़े पतीले खरीद लाए | कुछ दिन के बाद वह एक बहुत छोटी-सी पतीली लेकर लालची दुकानदार के पास पहुंचे और बोले,

यह आपके बड़े पतीले ने बच्चा दिया, कृपया इसे रख लें | दूकानदार बहुत खुश हुआ और ख़ुशी-ख़ुशी छोटी पतीली ले ली | कुछ दिन के बाद बीरबल एक बड़ा पतीला लेकर दूकानदार के पास गए और बोले, मुझे यह पतीली पसंद नहीं आई, आप मेरे पैसे मुझे वापस कर दीजिये |

दुकानदार बोला, लेकिन यह तो सिर्फ एक ही है, जबकि मैंने तुम्हें तीन पतीले दिए थे |

बीरबल ने कहा, जी, असल में दो पतिलों कि मृत्यु हो गई है  दुकानदार ने जवाब दिया, जाओ-जाओ क्यों बेवक़ूफ़ बनाते हो ? क्या पतिलों कि मृत्यु होती हैं ? बीरबल ने जवाब दिया,  क्यों नहीं, जब पतिलों के बच्चे पैदा हो सकते हैं, तो मृत्यु भी हो सकती है |

दुकानदार को बीरबल के पैसे वापस करने पड़े | और दुकानदार को सेर का सवा सैर भी मिल गया | बीरबल कि होशियारी का कोई जवाब नहीं |( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) मूर्खों की सूची

Akbar Birbal ki Kahaniyan 7: बादशाह अकबर घुड़सवारी के इतने शौकीन थे कि पसंद आने पर घोड़े का मुंहमांगा दाम देने को तैयार रहते थे। दूर-दराज के मुल्कों, जैसे अरब, पर्शिया आदि से घोड़ों के विक्रेता मजबूत व आकर्षक घोड़े लेकर दरबार में आया करते थे।

बादशाह अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए चुने गए घोड़े की अच्छी कीमत दिया करते थे। जो घोड़े बादशाह की रुचि के नहीं होते थे उन्हें सेना के लिए खरीद लिया जाता था।

अकबर के दरबार में घोड़े के विक्रेताओं का अच्छा व्यापार होता था।

एक दिन घोड़ों का एक नया विक्रेता दरबार में आया। अन्य व्यापारी भी उसे नहीं जानते थे। उसने दो बेहद आकर्षक घोड़े बादशाह को बेचे और कहा कि वह ठीक ऐसे ही सौ घोड़े और लाकर दे सकता है, बशर्ते उसे आधी कीमत पेशगी दे दी जाए।

बादशाह को चूंकि घोड़े बहुत पसंद आए थे, सो वैसे ही सौ और घोड़े लेने का तुरंत मन बना लिया।

बादशाह ने अपने खजांची को बुलाकर व्यापारी को आधी रकम अदा करने को कहा। खजांची उस व्यापारी को लेकर खजाने की ओर चल दिया। लेकिन किसी को भी यह उचित नहीं लगा कि बादशाह ने एक अनजान व्यापारी को इतनी बड़ी रकम बतौर पेशगी दे दी। लेकिन विरोध जताने की हिम्मत किसी के पास न थी।

सभी चाहते थे कि बीरबल यह मामला उठाए।

बीरबल भी इस सौदे से खुश न था। वह बोला, हुजूर ! कल मुझे आपने शहर भर के मूर्खों की सूची बनाने को कहा था। मुझे खेद है कि उस सूची में आपका नाम सबसे ऊपर है।

बादशाह अकबर का चेहरा मारे गुस्से के सुर्ख हो गया। उन्हें लगा कि बीरबल ने भरे दरबार में विदेशी मेहमानों के सामने उनका अपमान किया है।

गुस्से से भरे बादशाह चिल्लाए, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमें मूर्ख बताने की ?

क्षमा करें बादशाह सलामत। बीरबल अपना सिर झुकाते हुए सम्मानित लहजे में बोला आप चाहें तो मेरा सर कलम करवा दें, यदि आप के कहने पर तैयार की गई मूर्खों की फेहरिस्त में आपका नाम सबसे ऊपर रखना आपको गलत लगे।

दरबार में ऐसा सन्नाटा छा गया कि सुई गिरे तो आवाज सुनाई दे जाए।

अब बादशाह अकबर अपना सीधा हाथ उठाए, तर्जनी को बीरबल की ओर ताने आगे बढ़े। दरबार में मौजूद सभी लोगों की सांस जैसे थम सी गई थी। उत्सुक्ता व उत्तेजना सभी के चेहरों पर नृत्य कर रही थी। उन्हें लगा कि बादशाह सलामत बीरबल का सिर धड़ से अलग कर देंगे। इससे पहले किसी की इतनी हिम्मत न हुई थी कि बादशाह को मूर्ख कहे।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

लेकिन बादशाह ने अपना हाथ बीरबल के कंधे पर रख दिया। वह कारण जानना चाहते थे। बीरबल समझ गया कि बादशाह क्या चाहते हैं। वह बोला, आपने घोड़ों के ऐसे व्यापारी को बिना सोचे-समझे एक मोटी रकम पेशगी दे दी, जिसका अता-पता भी कोई नहीं जानता। वह आपको धोखा भी दे सकता है। इसलिए मूर्खों की सूची में आपका नाम सबसे ऊपर है।

हो सकता है कि अब वह व्यापारी वापस ही न लौटे। वह किसी अन्य देश में जाकर बस जाएगा और आपको ढूढ़े नहीं मिलेगा। किसी से कोई भी सौदा करने के पूर्व उसके बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिए। उस व्यापारी ने आपको मात्र दो घोड़े बेचे और आप इतने मोहित हो गए कि मोटी रकम बिना उसको जाने-पहचाने ही दे दी। यही कारण है बस।( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

तुरंत खजाने में जाओ और रकम की अदायगी रुकवा दो। अकबर ने तुरंत अपने एक सेवक को दौड़ाया।

बीरबल बोला, अब आपका नाम उस सूची में नहीं रहेगा।

बादशाह अकबर कुछ क्षण तो बीरबल को घूरते रहे, फिर अपनी दृष्टि दरबारियों पर केन्द्रित कर ठहाका लगाकर हंस पड़े। सभी लोगों ने राहत की सांस ली कि बादशाह को अपनी गलती का अहसास हो गया था। हंसी में दरबारियों ने भी साथ दिया और बीरबल की चतुराई की एक स्वर से प्रशंसा की।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) बीरबल तीन प्रश्न का उतर दो

Akbar Birbal ki Kahaniyan 8: बीरबल, राजा अकबर के बहुत प्रिय थे। वह अपने बहुत सारे निर्णय बीरबल की चालाकी और बुद्धिमानी के बल पर सभा में लेते थे। यह देख कर कुछ दरबारीयों के मन में बीरबल के प्रति घृणा जागृत हो गयी। उन दरबारियों नें मिल कर बीरबल को बादशाह अकबर के सामने निचा दिखने के लिए एक योजना बनाया।

एक दिन भरी सभा में उन दरबारियों नें अकबर के समक्ष कहा कि अगर बीरबल हमारे 3 प्रश्नों का उत्तर दे देंगे तो हम मान जायेंगे की बीरबल से बुद्धिमान कोई नहीं। बीरबल की बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए बादशाह अकबर हमेशा तईयार खड़े रहते थे। यह बात सुनते ही राजा अकबर नें हाँ कर दिया।

3 प्रश्न कुछ इस प्रकार के थे –

प्रश्न 1: असमान में कितने तारे हैं?

प्रश्न 2: इस धरती का केंद्र कहाँ है?

प्रश्न 3: इस पृथ्वी में कितने पुरुष और महिला हैं?

यह सुनते ही अकबर ने तुरंत बीरबल से कहा! अगर तुम इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाओगे तो तुम्हे अपने मुख्यमंत्री के पद को त्यागना पड़ेगा।

पहले प्रश्न के उत्तर के लिए, बीरबल एक घने बालों वाले भेड़ को कर आये और कहने लगे की जितने बाल इस भेड़ के शरीर में हैं उतने ही तारे आसमान में हैं। अगर मेरे दरबारी मित्र इस भेड़ के सभी बाल गिनना चाहें तो गिन सकते हैं।

दुसरे प्रश्न के उत्तर के लिए, बीरबल जमीन पर कुछ रेखाएं खीचने लगे और कुछ देर बाद उन्होंने एक लोहे की छड़ी को गाड़ दिया और कहा यह है धरती का केंद्र बिंदु। अगर मेरे दरबारी दोस्त मापना चाहते हैं तो स्वयं माप सकते हैं।

तीसरे सवाल के उत्तर में बीरबल बोले, वैसे तो यह बताना बहुत ही मुश्किल है कि इस दुनिया में पुरुष कितने हैं और महिलाएं कितनी हैं क्योंकि इस दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनको उस गणना में नहीं जोड़ा जा सकता जैसे की हमारे यह दरबारी मित्र। अगर इस प्रकार के लोगों को हम मार डालें तो हमें गणना करने में भी आसानी होगी।

यह सुनते ही सभी दरबारियों नें सर निचे कर लिया और कहा ! बीरबल, तुमसे चालक और बुद्धिमान कोई नहीं

दोस्तों Akbar Birbal ki Kahaniyan सह हमें क्या शिक्षा मिली:

सफलता प्राप्त करने का कोई न कोई रास्ता जरूर होता है बस अपनी बातों पर दृढ़ संकल्प रखना जरूरी है।

( अकबर बीरबल की कहानियाँ ) बीरबल का जन्म

Akbar Birbal ki Kahaniyan 9: जब महेश दास जवान हुआ तो वह अपना भाग्य आजमाने राजा बीरबल के पास गया. उसके पास राजा द्वारा दी गई अंगूठी भी थी जो उसने कुछ समय पहले राजा से प्राप्त की थी. वह अपनी माँ का आशीर्वाद लेकर भारत की नई राजधानी – फतैपुर सीकरी की तरफ़ चल दिया.

भारत की नई राजधानी को देख कर महेश दास हतप्रभ था. वह भीड़-भाड़ से बचते हुए लाल दीवारों वाले महल की तरफ़ चल दिया. महल का द्वार बहुत बड़ा और कीमती पत्थरों से सजा हुआ था, ऐसा दरवाजा महेश दास ने कभी सपनों में भी नहीं देखा था. उसने जैसे ही महल में प्रवेश करना चाहा तभी रौबदार मूछों वाले दरबान ने अपना भाला हवा में लहराया.

तुम्हें क्या लगता है, कि तुम कहाँ प्रवेश कर रहे हो? पहरेदार ने कड़कती आवाज़ में पूछा. महाशय, मैं महाराज से मिलने आया हूँ, नम्रता से महेश ने उत्तर दिया.  अच्छा! तो महाराज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, कि तुम कब आओगे? दरबान ने हँसते हुए पूछा. महेश मुस्कुराया और बोला, बिल्कुल महाशय, और देखो मैं आ गया हूँ. और हाँ,  तुम बेशक बहुत बहादुर और वीर होंगे किंतु तुम मुझे महल में जाने से रोक कर अपनी जान को खतरे में दाल रहे हो.

सुनकर दरबान सहम गया पर फ़िर भी हिम्मत कर के बोला, तुम ऐसा क्यों कहा रहे हो? तुम्हें पता है इस बात के लिए मैं तुम्हारा सिर कलम कर सकता हूँ. लेकिन महेश हार माने वालों में से नहीं था, उसने झट से महाराज कि अंगूठी दरबान को दिखाई.( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

अब महाराज कि अंगूठी को न पहचानने कि हिम्मत दरबान में नहीं थी. और ना चाहते हुए भी उसे महेश अंदर आने कि इजाज़त देनी पड़ी. हालांकि वह उसे नहीं जाने देना चाहता था इसलिए वह महेश से बोला ठीक है तुम अन्दर जा सकते हो लेकिन मेरी एक शर्त है.

वो क्या, महेश ने आश्चर्य से पूछा. दरबान बोला, तुम्हें महाराज जो भी ईनाम देंगे उसका आधा हिस्सा तुम मुझे दोगे. महेश ने एक पल सोचा और फ़िर मुस्कुराकर बोला ठीक है, मुझे मंजूर है.

और इस प्रकार महेश ने महल के अन्दर प्रवेश किया, अन्दर उसने देखा महाराजा अकबर सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं. धीरे-धीरे महेश अकबर के बिल्कुल करीब पहुँच गया और अकबर को झुक कर सलाम किया और कहा – आपकी कीर्ति सारे संसार में फैले.

अकबर मुस्कुराया और कहा, तुम्हे क्या चाहिए, कौन हो तुम? महेश अपने पंजों पर उचकते हुए कहा महाराज मैं यहाँ आपकी सेवा में आया हूँ. और यह कहते हुए महेश ने राजा कि दी हुई अंगूठी राजा के सामने रख दी. ओहो! यादा आया, तुम महेश दास हो है ना. जी महाराज मैं वही महेश हूँ.

बोलो महेश तुम्हें क्या चाहिए? महाराज मैं चाहता हूँ कि आप मुझे सौ कोडे मारिये. यह क्या कहा रहे हो महेश? रजा ने चौंकते हुए कहा. मैं ऐसा आदेश कैसे दे सकता हूँ जब तुमने कोई अपराध ही नहीं किया. महेश ने नम्रता से उत्तर दिया, नहीं महाराज, मुझे तो सौ कोडे ही मारिये. अब ना चाहते हुए भी अकबर को सौ कोडे मारने का आदेश देना ही पड़ा.

जल्लाद ने कोडे मारने शुरू किए – एक, दो, तीन, चार, . . . . . . . . . . . पचास. बस महाराज बस, महेश ने दर्द से करते हुए कहा. क्यों क्या हुआ महेश दर्द हो रहा है क्या? नहीं महाराज ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो केवल अपना वादा पूरा करना चाहता हूँ. कैसा वादा महेश?

महाराज जब मैं महल में प्रवेश कर रहा था तो दरबान ने मुझे इस शर्त पर अन्दर आने दिया कि मुझे जो भी उपहार प्राप्त होगा उसका आधा हिस्सा मैं दरबान को दूँगा. अपने हिस्से के पचास कोडे तो मैं खा चुका अब उस दरबान को भी उसका हिस्सा मिलना चाहिए. यह सुन कर सभी दरबारी हंसने लगे.

दरबान को बुलाया गया और उसको पचास कोडे लगाये गए. रजा ने महेश से कहा,तुम बिल्कुल ही वेसे ही बहादुर और निडर हो जैसे बचपन में थे. मैं अपने दरबार में से भ्रष्ट कर्मचारियों को पकड़ना चाहता था जिसके लिए मैंने बहुत से उपाय किए किंतु कोई भी काम नहीं आया. लेकिन यह काम तुमने जरा सी देर में ही कर दिया. तुम्हारी इसी बुद्धिमानी कि वजह से आज से तुम बीरबल कहालोगे. और तुम मेरे मुख्य सलाहकार नियुक्त किए जाते हो.

और इस तरह बीरबल का जन्म हुआ. ( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) अकबर बीरबल का प्यार

Akbar Birbal ki Kahaniyan 10: एक बार बादशाह अकबर और बीरबल के बीच मतभेद हो गया । बादशाह ने उन्हें दीवानीे से निकाल दिया। बीबरल चले गये कुछ दिनों बाद बादशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने बीरबल को बुलाया तब पता चला कि बीरबल तो घर-बार छोड कर कही चले गये है।

बादशाह ने उनकी खोज करायी मगर वे नही मिले अंत में बादशाह ने ऐलान कराया कि जो व्यक्ति पांच सवालों के सही जवाब देगा उसे दिवान बनाया जाएगा। बहुत से लेाग आये मगर कोई भी दरबार की ओर से पूछे गये सवालों के जवाब न दे सका आखरी में एक मसखरा सा बुढा आया, उसकी परीक्षा शुरू हुई-

पहला सवाल, शरीर का पहला गुण क्या है ? उत्तर में उसने कहा – आरोग्यता

दुसरा सवाल सबसे बडकर शस्त्र क्या है ? उत्तर – बुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ शस्त्र है।

तीसरा सवाल अगर चीनी और रेत मिल जाये तो जल में डालने के अलावा उनको अलग-अलग करने का क्या उपाया है? उत्तर – उनको प्रथ्वी पर फैला दिया जाये, चीनी को चीटियां उठा ले जायेगी और रेत पड़ी रह जायेगी।

चौथ सवाल क्या तुम समुद्र का पानी पी सकोगे ? उत्तर – आप समुद्र में जाने वाली सब नदियों का पानी उसमे जाना बंद कर दें तो मैं पी सकता हूं

पांचवा सवाल, बिना आग के आदमी और किससे जलता है ? उत्तर – चिंता से

ऐसे उत्तर सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गये और उसकी प्रशंसा करने लगे ,

अब एक सवाल का जवाब और दो बादशाह ने कहा- बीरबल कहां है ? उत्तर – आपके सामने, कहकर बीरबल ने अपना मस्करा वेश उतार दिया।

उसे देखकर बादशाह बेंहद खुश हुए और सिहासन से उठकर उसे गले से लगा लिया। ओह बीरबल तुम कहां चले गये थे, अब मुझसे कभी मत रूठना। उनका मिलन देखकर सभी दरबारी भावुक हो उठें। ऐसा था अकबर बीरबल का प्यार।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) गधा कौन?

Akbar Birbal ki Kahaniyan 11: एक बार अकबर अपने दो बेटों के साथ नदी के किनारे गये. साथ में बीरबल भी थे. दोनों बटों ने अपने कपडे उतारे और नदी मे नहाने उतर गये. बीरबल को उन्होंने अपने कपडों की रखवाली करने के लिये कहा.

बीरबल नदी किनारे बैठ कर उन दोनों के आने का इंतज़ार करने लगे. कपडे उन्होंने अपने कन्धों पर रखे हुए थे. बीरबल को इस अवस्था में खडे देख अकबर के मन में शरारत सूझी. उन्होंने बीरबल को कहा, बीरबल तुम्हे देख कर ऐसा लग रह है जैसे धोबी का गधा कपडे लाद कर खडा हो.

बीरबल ने झट से जवाब दिया,  महराज धोबी के गधे के पास केवल एक गधे का ही बोझ होता है किंतु मेरे पास तो तीन-तीन गधों का बोझ है.

महाराजा अकबर निरूत्तर हो गए.

( अकबर बीरबल की कहानियाँ ) राखपत और रखापत

Akbar Birbal ki Kahaniyan 12: एक बार दिल्ली दरबार में बैठे हुए बादशाह अकबर ने अपने नवरत्नों से पूछा भई, यह बताओ सबसे बडा पट यानी शहर कौनसा हैं। पहले नवरत्न ने कहा सोनीपत। दूसरा नवरत्न -हुजूर, पानीपत सबसे बडा पत हैं। तीसरे नवरत्न ने लम्बी हांकी नहीं जनाब, दलपत से बडा पत और कोई दूसरा नहीं हैं।

चौथे नवरत्न ने अपना राग अलापा सबसे बडा पत तो दिल्लीपत यानी दिल्ली शहर हैं। बीरबल चुपचाप बैठे हुए सारी बातें सुन रहे थे। अकबर ने बीरबल से कहा तुम भी कुछ बोलो। बीरबल ने कहा सबसे बडा पत हैं राखपत और दूसरा बडा पत हैं रखापत।

अकबर ने पूछा बीरबल हमने सोनीपत, पानीपत दलपत और दिल्लीपत सब पत सुन रखे हैं। पर राखपत, रखापत किस शहर के नाम हैं।

बीरबल बोले हुजूर राखपत का मतलब हैं मैं आपके रखूं और राकह्पत का मतलब हैं आप मेरी बात रखो। यह मेलजोल और प्रेमभाव जिस पत में नहीं है उस पत का क्या मतलब हैं। प्रेमभाव हैं तो जंगल में भी मंगल हैं और प्रेमभाव नहीं तो नगर भी नरक का द्वार हैं।

अकबर बीरबल की बातों को सुनकर बहुत खुश हुए और उन्हें कई इनामों से नवाजा।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

ऊँट की गर्दन क्यों मुडी है? ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 13: अकबर बीरबल की हाज़िर जवाबी के बडे कायल थे. एक दिन दरबार में खुश होकर उन्होंने बीरबल को कुछ पुरस्कार देने की घोषणा की. लेकिन बहुत दिन गुजरने के बाद भी बीरबल को धनराशि (पुरस्कार) प्राप्त नहीं हुई. बीरबल बडी ही उलझन में थे कि महारज को याद दिलायें तो कैसे?

एक दिन महारजा अकबर यमुना नदी के किनारे शाम की सैर पर निकले. बीरबल उनके साथ था. अकबर ने वहाँ एक ऊँट को घुमते देखा. अकबर ने बीरबल से पूछा, बीरबल बताओ, ऊँट की गर्दन मुडी क्यों होती है?

बीरबल ने सोचा महाराज को उनका वादा याद दिलाने का यह सही समय है. उन्होंने जवाब दिया – महाराज यह ऊँट किसी से वादा करके भूल गया है, जिसके कारण ऊँट की गर्दन मुड गयी है. महाराज, कहते हैं कि जो भी अपना वादा भूल जाता है तो भगवान उनकी गर्दन ऊँट की तरह मोड देता है. यह एक तरह की सजा है.

तभी अकबर को ध्यान आता है कि वो भी तो बीरबल से किया अपना एक वादा भूल गये हैं. उन्होंने बीरबल से जल्दी से महल में चलने के लिये कहा. और महल में पहुँचते ही सबसे पहले बीरबल को पुरस्कार की धनराशी उसे सौंप दी, और बोले मेरी गर्दन तो ऊँट की तरह नहीं मुडेगी बीरबल. और यह कहकर अकबर अपनी हँसी नहीं रोक पाए.( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

और इस तरह बीरबल ने अपनी चतुराई से बिना माँगे अपना पुरस्कार राजा से प्राप्त किया.

किसकी दाढ़ी की आग ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 14: बादशाह अकबर की यह आदत थी कि वह अपने दरबारियों से तरह-तरह के प्रश्न किया करते थे। एक दिन बादशाह ने दरबारियों से प्रश्न किया- अगर सबकी दाढी में आग लग जाए, जिसमें मैं भी शामिल हूं तो पहले आप किसकी दाढी की आग बुझायेंगे?

हुजूर की दाढी की। सभी सभासद एक साथ बोल पड़े।

मगर बीरबल ने कहा – हुजूर, ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )सबसे पहले मैं अपनी दाढी की आग बुझाऊंगा, फिर किसी और की दाढी की ओर देखूंगा।

बीरबल के उत्तर से बादशाह बहुत खुश हुए और बोले- मुझे खुश करने के उद्देश्य से आप सब लोग झूठ बोल रहे थे। सच बात तो यह है कि हर आदमी पहले अपने बारे में सोचता है।

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) मूर्खों से मिली बुद्धि

Akbar Birbal ki Kahaniyan 15: सम्राट अकबर कभी जरूरत से, कभी मनोरंजन के लिए बीरबल से कठिन प्रश्न करता।
एक दिन बादशाह ने पूछा- तुम्हें तीक्ष्ण बुद्धि कहां से मिली?

बीरबल- जहांपनाह, यह मुझे मूर्खों से मिली है!

प्रश्न जितना सरल, उत्तर उतना ही ज्यादा उलझन और चक्कर में डालने वाला, हैरान करने वाला! मूर्ख के पास तो बुद्धि होती ही नहीं, बुद्धि होती तो वे मूर्ख क्यों कहलाते। और जो चीज जिसके पास में नहीं है, उसे वे कैसे दूसरे को दे सकते हैं? अत: अकबर से रहा नहीं गया।

बादशाह अकबर ने पूछा- मूर्खों से?

बीरबल- हां! मूर्खों से। जिस आचरण और व्यवहार के कारण आदमी मूर्ख कहलाता है, मैं उनसे बचता रहा।इससे मेरा बुद्धिमान बनने का रास्ता साफ होता गया।( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

तेली और कसाई ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 16: एक दिन अकबर बादशाह दरबार में बैठे हुए थे। उस वक्त एक तेली और कसाई आपस में लड़ते-लड़ते वहां आए। बीरबल ने पूछा-तुम दोनों में से शिकायत लेकर कौन आया है?

तेली ने कहा-मैं प्रतिवादी हूँ।

बीरबल ने उन दोनों से लड़ाई का कारण पूछा।

तेली बोला-महाराज! मैं अपनी दुकान पर बैठा हुआ हिसाब लिख रहा था कि इतने में कसाई ने मरे पास आकर तेल मांगा। मैंने अपना काम छोड़कर इसको तेल दे दिया और फिर अपना काम करने लगा। थोड़ी देर में आंख उठाकर देखता हूँ कि मेरी पैसों की थैली गायब है।

मुझको इस कसाई पर संदेह हुआ। मैं उसी समय दौड़ता हुआ इसके पास गया और इसके पास वह थैली देखी। परन्तु जब मैंने वह थैली मांगी तो इसने देने से इंकार कर दिया और कहा कि यह तो मेरी है। सच-सच कहता हूँ, इसमें कुछ भी झूठा नहीं है और परमेश्वर साक्षी है। अब आप न्याय करके मेरी थैली मुझको दिलवाएं।

जब तेली अपना हाल सुना चुका, तब कसाई कहने लगा-हुजूर! मैं अपनी दुकान पर बैठा हुआ बिक्री के पैसे गिन रहा था कि इतने में ही यह तेली रोज की तरह तेल बेचने आया। इसकी दुकान मेरे घर से चार-पांच घरों के फासले पर है।

जिस समय यह मेरे पास आया, उस वक्त पैसों की थैली मेरे सामने रखी हुई थी। इसके जाने के बाद मैंने देखा तो थैली नहीं मिली। मैंने दौड़कर इसे पकड़ लिया और अपनी थैली इससे छीन ली। मैंने अपना हाल सच-सच कहा है। इसमें कुछ भी झूठ हो तो खुदा साक्षी है, सरकार हमारा न्याय कीजिए।

बीरबल ने दोनों की बातें सुनकर उनको दूसरे दिन आने का हुक्म दिया और पैसों की थैली अपने पास रख ली। उनके चले जाने के पश्चात् बीरबल ने उस थैली में से पैसे निकाल कर धुलवाए तो उनमें तेल का अंश बिल्कुल न दिखाई दिया बल्कि एक प्रकार की गंध आई, जिससे उसको निश्चय हो गया कि यह पैसे कसाई के हैं।

दूसरे दिन ठीक वक्त पर वादी और प्रतिवादी दोनों आ पहुंचे। बीरबल ने उन्हें अपना फैसला बता दिया तो तेली चीखने-चिल्लाने लगा। पर जब बीरबल ने उसे कोड़े लगाने की आज्ञा दी तो वह अपना कसूर मान गया। बीरबल ने थैली कसाई को दे दी और तेली को उचित दंड देकर विदा किया।

किसकी नेमत

Akbar Birbal ki Kahaniyan 17: बादशाह अकबर प्राय: भेष बदलकर सैर के लिए निकला करते थे। एक दिन वह बीरबल के साथ भेष बदलकर शहर से बाहर एक गांव में पहुंचे। वहां बादशाह ने. देखा कि एक कुत्ता रोटी के टुकड़े को, जो कई दिनों की हो जाने की वजह से सूख कर काली पड़ गई थी,

चबा-चबाकर खा रहा था। अचानक बादशाह को दिल्लगी करने की सूझी। वह बोले- बीरबल! देखा, वह कुत्ता काली को खा रहा है।

काली बीरबल की मां का नाम था। वह समझ गये कि आलमपनाह दिल्लगी कर रहे हैं। किन्तु इस भावना को दबाकर वे तुरन्त बोले- आलमपनाह, उनके लिए वही जिन्दगी और नेमत हैं।

नेमत बादशाह की मां का नाम था। बीरबल के जवाब को सुनकर बादशाह को चुप हो जाना पड़ा।

( Akbar Birbal ki Kahaniyan ) ईश्वर अच्छा ही करता है

Akbar Birbal ki Kahaniyan 18: बीरबल एक ईमानदार तथा धर्म-प्रिय व्यक्ति था। वह प्रतिदिन ईश्वर की आराधना बिना नागा किया करता था। इससे उसे नैतिक व मानसिक बल प्राप्त होता था। वह अक्सर कहा करता था कि ईश्वर जो कुछ भी करता है मनुष्य के भले के लिए ही करता है।

कभी-कभी हमें ऐसा लगता है कि ईश्वर हम पर कृपादृष्टि नहीं रखता, लेकिन ऐसा होता नहीं। कभी-कभी तो उसके वरदान को भी लोग शाप समझने की भूल कर बैठते हैं। वह हमको थोड़ी पीड़ा इसलिए देता है ताकि बड़ी पीड़ा से बच सकें।

एक दरबारी को बीरबल की ऐसी बातें पसंद न आती थीं। एक दिन वही दरबारी दरबार में बीरबल को संबोधित करता हुआ बोला, देखो, ईश्वर ने मेरे साथ क्या किया-कल-शाम को जब मैं जानवरों के लिए चारा काट रहा था तो अचानक मेरी छोटी उंगली कट गई। क्या अब भी तुम यही कहोगे कि ईश्वर ने मेरे लिए यह अच्छा किया है ?

कुछ देर चुप रहने के बाद बोला बीरबल, मेरा अब भी यही विश्वास है क्योंकि ईश्वर जो कुछ भी करता है मनुष्य के भले के लिए ही करता है।

सुनकर वह दरबारी नाराज हो गया कि मेरी तो उंगली कट गई और बीरबल को इसमें भी अच्छाई नजर आ रही है। मेरी पीड़ा तो जैसे कुछ भी नहीं। कुछ अन्य दरबारियों ने भी उसके सुर में सुर मिलाया।

तभी बीच में हस्तक्षेप करते हुए बादशाह अकबर बोले, बीरबल हम भी अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, लेकिन यहां तुम्हारी बात से सहमत नहीं। इस दरबारी के मामले में ऐसी कोई बात नहीं दिखाई देती जिसके लिए उसकी तारीफ की जाए।

बीरबल मुस्कराता हुआ बोला, ठीक है जहांपनाह, समय ही बताएगा अब।

तीन महीने बीत चुके थे। वह दरबारी, जिसकी उंगली कट गई थी, घने जंगल में शिकार खेलने निकला हुआ था। एक हिरन का पीछा करते वह भटककर आदिवासियों के हाथों में जा पड़ा। वे आदिवासी अपने देवता को प्रसन्न करने के लिए मानव बलि में विश्वास रखते थे।

अतः वे उस दरबारी को पकड़कर मंदिर में ले गए, बलि चढ़ाने के लिए। लेकिन जब पुजारी ने उसके शरीर का निरीक्षण किया तो हाथ की एक उंगली कम पाई।

नहीं, इस आदमी की बलि नहीं दी जा सकती। मंदिर का पुजारी बोला, यदि नौ उंगलियों वाले इस आदमी को बलि चढ़ा दिया गया तो हमारे देवता बजाय प्रसन्न होने के क्रोधित हो जाएंगे, अधूरी बलि उन्हें पसंद नहीं। हमें महामारियों, बाढ़ या सूखे का प्रकोप झेलना पड़ सकता है। इसलिए इसे छोड़ देना ही ठीक होगा।

और उस दरबारी को मुक्त कर दिया गया।

अगले दिन वह दरबारी दरबार में बीरबल के पास आकर रोने लगा।

तभी बादशाह भी दरबार में आ पहुंचे और उस दरबारी को बीरबल के सामने रोता देखकर हैरान रह गए।

तुम्हें क्या हुआ, रो क्यों रहे हो ? अकबर ने सवाल किया।

जवाब में उस दरबारी ने अपनी आपबीती विस्तार से कह सुनाई। वह बोला, अब मुझे विश्वास हो गया है कि ईश्वर जो कुछ भी करता है, मनुष्य के भले के लिए ही करता है। यदि मेरी उंगली न कटी होती तो निश्चित ही आदिवासी मेरी बलि चढ़ा देते। इसीलिए मैं रो रहा हूं, लेकिन ये आंसू खुशी के हैं। मैं खुश हूं क्योंकि मैं जिन्दा हूं। बीरबल के ईश्वर पर विश्वास को संदेह की दृष्टि से देखना मेरी भूल थी।

अकबर ने मंद-मंद मुस्कराते हुए दरबारियों की ओर देखा, जो सिर झुकाए चुपचाप खड़े थे। अकबर को गर्व महसूस हो रहा था कि बीरबल जैसा बुद्धिमान उसके दरबारियों में से एक है।( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

अब तो आन पड़ी है

Akbar Birbal ki Kahaniyan 19: अकबर बादशाह को मजाक करने की आदत थी। एक दिन उन्होंने नगर के सेठों से कहा-आज से तुम लोगों को पहरेदारी करनी पड़ेगी।

सुनकर सेठ घबरा गए और बीरबल के पास पहुँचकर अपनी फरियाद रखी।

बीरबल ने उन्हें हिम्मत बँधायी-तुम सब अपनी पगड़ियों को पैर में और पायजामों को सिर पर लपेटकर रात्रि के समय में नगर में चिल्ला-चिल्लाकर कहते फिरो, अब तो आन पड़ी है।

उधर बादशाह भी भेष बदलकर नगर में गश्त लगाने निकले। सेठों का यह निराला स्वांग देखकर बादशाह पहले तो हँसे, फिर बोले-यह सब क्या है ?

सेठों के मुखिया ने कहा-जहाँपनाह, हम सेठ जन्म से गुड़ और तेल बेचने का काम सीखकर आए हैं, भला पहरेदीर क्या कर पाएँगे, अगर इतना ही जानते होते तो लोग हमें बनिया कहकर क्यों पुकारते ?

बादशाह अकबर बीरबल की चाल समझ गए और अपना हुक्म वापस ले लिया।

अकबर बीरबल की नोकझोंक ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 20: एक बार बीरबल को दरबार में आने में देर हो गई | जब वह आए तो अकबर ने उनसे पूछा बीरबल ! आज आने में तुम्हें देर कैसे हुई ? हम कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं | हमें तुमसे एक खास सवाल करना है |

बीरबल ने कहा, जहाँपनाह ! रोज-रोज आप ही मुझसे सवाल पूछते हैं, यह तो बड़ा ही अन्याय है | आज मुझे आपसे एक सवाल पूछना है | यदि आप अनुमति दें, तो में आपसे प्रश्न पूंछू ?

ठीक है, आज तुम हमसे प्रश्न पूछो | हम तुम्हें जवाब देंगे |

जहाँपनाह ! सूर्य रोज पूर्व दिशा में ही क्यों उगता हैं ? बीरबल ने पुछा |

अरे यह भी कोई प्रश्न है ? किसी मुर्ख को भी इस प्रश्न का जवाब मालूम होगा ?

बीरबल को उनसे ऐसे ही जवाब की अपेक्षा थी | तुरंत ही उन्होंने सर झुकाकर कहा, श्रीमान, इसीलिए तो मेंने आपसे यह प्रश्न पुछा |

बादशाह पहले तो कुछ समझे नहीं, पर दरबारियों को खामोश बैठे देख वह सब समझ गए | वह ठठाकर हंस पड़े | फिर दरबारी भी खिलखिलाकर हंसने लगे | बीरबल के जाल में बादशाह पूरी तरह फंस गए थे | बात को हंसकर टालने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था |( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

बादशाह की पहेली ( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 21: बादशाह अकबर को पहेली सुनाने और सुनने का काफी शौक था। कहने का मतलब यह कि पक्के पहेलीबाज थे। वे दूसरो से पहेली सुनते और समय-समय पर अपनी पहेली भी लोगो को सुनाया करते थे। एक दिन अकबर ने बीरबल को एक नई पहेली सुनायी, ऊपर ढक्कन नीचे ढक्कन, मध्य-मध्य खरबूजा। मौं छुरी से काटे आपहिं, अर्थ तासु नाहिं दूजा।

बीरबल ने ऐसी पहेली कभी नहीं सुनी थी। इसलिए वह चकरा गया। उस पहेली का अर्थ उसकी समझ में नहीं आ रहा था। अत प्रार्थना करते हुए बादशाह से बोला, जहांपनाह! अगर मुझे कुछ दिनों की मोहलत दी जाये तो मैं इसका अर्थ अच्छी तरह समझकर आपको बता सकूँगा। बादशाह ने उसका प्रस्ताव मंजूर कर लिया।

बीरबल अर्थ समझने के लिए वहां से चल पड़ा। वह एक गाँव में पहुँचा। एक तो गर्मी के दिन, दूसरे रास्ते की थकन से परेशान व विवश होकर वह एक घर में घुस गया। घर के भीतर एक लड़की भोजन बना रही थी।

बेटी! क्या कर रही हो? उसने पूछा। लडकी ने उत्तर दिया, आप देख नहीं रहे हैं। मैं बेटी को पकाती और माँ को जलाती हूँ।

अच्छा, दो का हाल तो तुमने बता दिया, तीसरा तेरा बापू क्या कर रहा है और कहाँ है? बीरबल ने पूछा।

वह मिट्टी में मिट्टी मिला रहे हैं। लडकी ने जवाब दिया। इस जवाब को सुनकर बीरबल ने फिर पूछा, तेरी माँ क्या कर रही है? एक को दो कर रही है। लडकी ने कहा।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

बीरबल को लडकी से ऐसी आशा नहीं थी। परन्तु वह ऐसी पण्डित निकली कि उसके उत्तर से वह एकदम आश्चर्यचकित रह गया। इसी बीच उसके माता-पिता भी आ पहुँचे। बीरबल ने उनसे सारा समाचार कह सुनाया। लडकी का पिता बोला, मेरी लड़की ने आपको ठीक उत्तर दिया है।

अरहर की दाल अरहर की सूखी लकड़ी से पक रही है। मैं अपनी बिरादरी का एक मुर्दा जलाने गया था और मेरी पत्नी पडोस में मसूर की दाल दल रही थी। बीरबल लडकी की पहेली-भरी बातों से बड़ा खुश हुआ। उसने सोचा, शायद यहां बादशाह की पहेली का भेद खुल जाये, इसलिए लडकी के पिता से उपरोक्त पहेली का अर्थ पूछा।

यह तो बड़ी ही सरल पहेली है। इसका अर्थ मैं आपको बतलाता हूँ – धरती और आकाश दो ढक्कन हैं। उनके अन्दर निवास करने वाला मनुष्य खरबूजा है। वह उसी प्रकार मृत्यु आने पर मर जाता है, जैसे गर्मी से मोम पिघल जाती है। उस किसान ने कहा।

बीरबल उसकी ऐसी बुध्दिमानी देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे पुरस्कार देकर दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर बीरबल ने सभी के सामने बादशाह की पहेली का अर्थ बताया। बादशाह ने प्रसन्न होकर बीरबल को ढेर सारे इनाम दिये।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

जीत किसकी ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 22: बादशाह अकबर जंग में जाने की तैयारी कर रहे थे। फौज पूरी तरह तैयार थी। बादशाह भी अपने घोड़े पर सवार होकर आ गए। साथ में बीरबल भी था। बादशाह ने फौज को जंग के मैदान में कूच करने का निर्देश दिया।

बादशाह आगे-आगे थे, पीछे-पीछे उनकी विशाल फौज चली आ रही थी। रास्ते में बादशाह को जिज्ञासा हुई और उन्होंने बीरबल से पूछा—क्या तुम बता सकते हो कि जंग में जीत किसकी होगी ?

हुजूर, इस सवाल का जवाब तो मैं जंग के बाद ही दूँगा। बीरबल ने कहा।

कुछ देर बाद फौज जंग के मैदान में पहुंच गई। वहां पहुंचकर बीरबल ने कहा—हुजूर, अब मैं आपके सवाल का जवाब देता हूं और जवाब यह है कि जीत आपकी ही होगी।

यह तुम अभी कैसे कह सकते हो, जबकि दुश्मन की फौज भी बहुत विशाल है। बादशाह ने शंका जाहिर की।

हुजूर, दुश्मन हाथी पर सवार हैं और हाथी तो सूंड से मिट्टी अपने ऊपर ही फेंकता है तथा अपनी ही मस्ती में रहता है, जबकि आप घोड़े पर सवार है और घोड़ों को तो गाजी मर्द कहा जाता है। घोड़ा आपको कभी धोखा नहीं देगा। बीरबल ने कहा।

उस जंग में जीत बादशाह अकबर की ही हुई।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

बादशाह का सपना ( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 23: एक रात सोते समय बादशाह अकबर ने यह अजीब सपना देखा कि केवल एक छोड़कर उनके बाकी सभी दांत गिर गए हैं।

फिर अगले दिन उन्होंने देश भर के विख्यात ज्योतिषियों व नुजूमियों को बुला भेजा और और उन्हें अपने सपने के बारे में बताकर उसका मतलब जानना चाहा।

सभी ने आपस में विचार-विमर्श किया और एक मत होकर बादशाह से कहा, जहांपनाह, इसका अर्थ यह है कि आपके सारे नाते-रिश्तेदार आपसे पहले ही मर जाएंगे।

यह सुनकर अकबर को बेहद क्रोध हो आया और उन्होंने सभी ज्योतिषियों को दरबार से चले जाने को कहा। उनके जाने के बाद बादशाह ने बीरबल से अपने सपने का मतलब बताने को कहा।

कुछ देर तक तो बीरबल सोच में डूबा रहा, फिर बोला, हुजूर, आपके सपने का मतलब तो बहुत ही शुभ है। इसका अर्थ है कि अपने नाते-रिश्तेदारों के बीच आप ही सबसे अधिक समय तक जीवित रहेंगे।

बीरबल की बात सुनकर बादशाह बेहद प्रसन्न हुए। बीरबल ने भी वही कहा था जो ज्योतिषियों ने, लेकिन कहने में अंतर था। बादशाह ने बीरबल को ईनाम देकर विदा किया

पैसे की थैली किसकी ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 24: दरबार लगा हुआ था। बादशाह अकबर राज-काज देख रहे थे। तभी दरबान ने सूचना दी कि दो व्यक्ति अपने झगड़े का निपटारा करवाने के लिए आना चाहते हैं।

बादशाह ने दोनों को बुलवा लिया। दोनों दरबार में आ गए और बादशाह के सामने झुककर खड़े हो गए।

कहो क्या समस्या है तुम्हारी ? बादशाह ने पूछा।

हुजूर मेरा नाम काशी है, मैं तेली हूं और तेल बेचने का धंधा करता हूं; और हुजूर यह कसाई है। इसने मेरी दुकान पर आकर तेल खरीदा और साथ में मेरी पैसों की भरी थैली भी ले गया। जब मैंने इसे पकड़ा और अपनी थैली मांगी तो यह उसे अपनी बताने लगा, हुजूर अब आप ही न्याय करें।

जरूर न्याय होगा, अब तुम कहो तुम्हें क्या कहना है ? बादशाह ने कसाई से कहा। हुजूर मेरा नाम रमजान है और मैं कसाई हूँ, हुजूर, जब मैंने अपनी दुकान पर आज मांस की बिक्री के पैसे गिनकर थैली जैसे ही उठाई, यह तेली आ गया और मुझसे यह थैली छीन ली। अब उस पर अपना हक जमा रहा है, हुजूर, मुझ गरीब के पैसे वापस दिला दीजिए।

दोनों की बातें सुनकर बादशाह सोच में पड़ गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वह किसके हाथ फैसला दें। उन्होंने बीरबल से फैसला करने को कहा। बीरबल ने उससे पैसों की थैली ले ली और दोनों को कुछ देर के लिए बाहर भेज दिया।

बीरबल ने सेवक से एक कटोरे में पानी मंगवाया और उस थैली में से कुछ सिक्के निकालकर पानी में डाले और पानी को गौर से देखा। फिर बादशाह से कहा—हुजूर, इस पानी में सिक्के डालने से तेल जरा-सा भी अंश पानी में नहीं उभार रहा है। यदि यह सिक्के तेली के होते तो यकीनन उन पर सिक्कों पर तेल लगा होता और वह तेल पानी में भी दिखाई देता।

बादशाह ने भी पानी में सिक्के डाले, पानी को गौर से देखा और फिर बीरबल की बात से सहमत हो गए। बीरबल ने उन दोनों को दरबार में बुलाया और कहा—मुझे पता चल गया है कि यह थैली किसकी है। काशी, तुम झूठ बोल रहे हो, यह थैली रमजान कसाई की है।

हुजूर यह थैली मेरी है। काशी एक बार फिर बोला।

बीरबल ने सिक्के डले पानी वाला कटोरा उसे दिखाते हुए कहा—यदि यह थैली तुम्हारी है तो इन सिक्कों पर कुछ-न-कुछ तेल अवश्य होना चाहिए, पर तुम भी देख लो…तेल तो अंश मात्र भी नजर नहीं आ रहा है।

काशी चुप हो गया।

बीरबल ने रमजान कसाई को उसकी थैली दे दी और काशी को कारागार में डलवा दिया।

सबसे मुश्किल काम ( Akbar Birbal ki Kahaniyan )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 25: एक दिन बीरबल दरबार में देर से पहुँचे। अकबर ने पूछा क्या बात है ? बीरबल आज देर से क्यों आये? बीरबल ने कहा- जहांपनाह, आज मुझे बच्चों को संभालना पडा।

बादशाह को यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ, बोले यह भी कोई काम हुआ? जहांपनाह बच्चों को संभालने का काम सबसे कठिन है। जब यह काम सिर पर आ पडता है तो कोई भी काम समय पर नहीं हो पाता।

बादशाह बाले- बीरबल बच्चों को बहलाना तो सबसे आसान काम है, उनके हाथ में कोई खाने की चीज दे दो, या कोई खिलोना थमा दो बस काम बन गया।

बीरबल ने कहा- बादशाह सलामत आपको इसका अनुभव नहीं है इसलिए आपको यह काम आसान लगता है। जब आप यह साफ-साफ़ अनुभव करेंगे तो आपको मेरी बात समझ में आ जायेगी। चलिए मैं छोटे बच्चे का अभिनय करता हूं और आप मुझे बहला कर देखिए।

बादशाह तुरन्त राजी हो गये। बीरबल छोटे बच्चे की तरह रोने लगे। अब्बा मुझे दुध चाहिए, बादशाह ने फोरन दुध मंगवा लिया । दुध पीने के बाद बीरबल ने कहा अब मुझे गन्ना चुसना है। Tales of akbar birbal( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

बादशाह ने गन्ना मंगवाया और उसके छोटे-छोटे टुकडे करवा लिये, मगर बीरबल ने उसे छुआ तक नहीं वह रोता ही रहा।

रोते-रोते वह बोला अब्बा मुझे पूरा गन्न चाहिए। बीरबल का रोना जारी रहा। बादशाह ने हारकर दुसरा गन्ना मंगवाया। मगर बच्चा बने बीरबल रोते-रोते बोले यह गन्ना मुझे नहीं चाहिए, मुझे तो पहले वाला ही पूरा गन्ना चाहिए।

यह सुनकर बादशाह झल्ला उठे, उन्होनें कहा बकवास मत कर चुपचाप चुस ले। कटा हुआ गन्ना अब पुरा कैसे हो सकता है ?

[ही मैं तो पहले वाला गन्ना हीे लूंगा। बादशाह यह सुनकर क्रोधित हो उठे। अरे है कोई यहां ? इस बच्चे को यहां से ले जाओ। बीरबल हंस पडे। बादशाह को स्वीकार करना पडा कि बच्चों को संभालना वास्तव में बहुत मुष्किल काम है।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

जितनी लम्बी चादर उतने ही पैर पसारो

Akbar Birbal ki Kahaniyan 26: बादशाह अकबर के दरबारियों को अक्सर यह शिकायत रहती थी कि बादशाह हमेशा बीरबल को ही बुद्धिमान बताते हैं, औरों को नहीं।

एक दिन बादशाह ने अपने सभी दरबारियों को दरबार में बुलाया और दो हाथ लम्बी दो हाथ चौड़ी चादर देते हुए कहा—इस चादर से तुम लोग मुझे सर से लेकर पैर तक ढंक दो तो मैं तुम्हें बुद्धिमान मान लूंगा।

सभी दरबारियों ने कोशिश की किंतु उस चादर से बादशाह को पूरा न ढंक सके, सिर छिपाते तो पैर निकल आते, पैर छिपाते तो सिर चादर से बाहर आ जाता। आड़ा-तिरछा लम्बा-चौड़ा हर तरह से सभी ने कोशिश की किंतु सफल न हो सके।

अब बादशाह ने बीरबल को बुलाया और वही चादर देते हुए उन्हें ढंकने को कहा। जब बादशाह लेटे तो बीरबल ने बादशाह के फैले हुए पैरों को सिकोड़ लेने को कहा। बादशाह ने पैर सिकोड़े और बीरबल ने सिर से पांव तक चादर से ढंक दिया। अन्य दरबारी आश्चर्य से बीरबल की ओर देख रहे थे। तब बीरबल ने कहा—जितनी लम्बी चादर उतने ही पैर पसारो।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

बीरबल और अंगूठी चोर ( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

Akbar Birbal ki Kahaniyan 27: एक दिन भरे दरबार में राजा अकबर नें अपना अंगूठी खो दिया। जैसे ही राजा को यह बात पता चली उन्होंने सिपाहियों से ढूँढने को कहा पर वह नहीं मिला।

राजा अकबर नें बीरबल से दुखी मन से बताया कि वह अंगूठी उनके पिता की अमानत थी जिससे वह बहुत ही प्यार करते थे। बीरबल नें जवाब में कहा! आप चिंता ना करें महाराज, मैं अंगूठी ढून्ढ लूँगा।

बीरबल नें दरबार में बैठे लोगों की तरफ देखा और राजा अकबर से कहा ! महाराज चोरी इन्हीं दर्बर्यों में से ही किसी ने किया है। जिसके दाढ़ी में तिनका फसा है उसी के पास आपका अंगूठी हैा।

जिस दरबारी के पास महाराज का अंगूठी था वह चौंक गया और अचानक से घबराहट के मारे अपनी दाढ़ी को धयान से देखने लगा। बीरबल नें उसकी हरकत को देख लिया और उसी वक्त सैनिकों को आदेश दिया और कहा! इस आदमी की जांच किया जाए।

बीरबल सही था अंगूठी उसी के पास थी। उसको पकड़ लिया गया और कारागार में कैद कर लिया गया। राजा अकबर बहुत खुश हुए।

दोस्तों Akbar Birbal ki Kahaniyan सह हमें क्या शिक्षा मिली:

एक दोषी व्यक्ति हमेशा डरता रहता है।( अकबर बीरबल की कहानियाँ )

VIDEO ZAROOR DEKHE DOSTO

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Conclusion:

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